परवरिश – मंगला श्रीवास्तव

दिवाकर जी अपने दोस्त अनिल जी के साथ शहर की नामी वकील सुनन्दा के आलीशान घर के वेटिंग रूम में बैठे थे उनको सुबह आठ बजे बुलाया था सुनन्दा जी ने,वह अपने इकलौते बेटे को जो कि शराब पीकर नशे में मारपीट और लड़कियों  को छेड़ने के इल्जाम में जेल में बन्द था ।

वह उसको छुड़ाने रायगड़ से दिल्ली आये थे। शौर्य दिवाकर जी का इकलौता बेटा था , बचपन से ही दादी दादा व उनके लाड़ प्यार ने उसको बहुत बिगाड़ दिया था।रायगड़ में भी स्कूल से लेकर घर के बहार से तक रोज उसकी शिकायतें आती रहती थी। इस कारण उन्होंने उसको स्कूल की पढ़ाई  खत्म हुई तो दिल्ली में कॉलेज में एडमिशन करा दिया था सोच कर की शायद वहाँ रहकर सबसे दूर रहने पर वह सुधर जायेगा ,पर यहां आकर तो वह और भी एकदम बेफ़िक्र हो गया थाI बुरी संगत में रहकर एकदम आवारा व नशाखोर अय्यास हो चुका था।

अनिलजी उनके पुराने दोस्त थे  और वह काफी समय से दिल्ली में ही रहते थे वही उनका खुद का व्यापार था ,इस कारण उनको दिल्ली की काफी जानकारी थी। उन्होंने ही अनिल जी एडवोकेट सुनन्दा का नाम बताया था क्योंकि उनके बहुत अच्छे सम्बन्ध थे सुनन्दा के परिवार से  वह उसको बेटी ही मानते थे अपनी ।

शौर्य का केस हल करने के लिये।

 आठ बजे नौकर उनको बड़े से ऑफिस में बिठा गया था। वह बहुत सुंदर और व्यवस्थित था।


 वह लोग बैठ कर सुनन्दा जी का इंतजार करने लगे थे कि अचानक   दिवाकर जी की निगाहें दीवार पर लगी एक बड़ी सी तस्वीरपर गया जिसे देखकर वह चौक गये।

उस तस्वीर में  एक सुंदर सी महिला कुर्सी पर बैठी थी, और उसके आसपास तीन लड़कियां खड़ी थी। “अरे यह तो मानसी है ; ! वह मन ही मन बुदबुदाये।

 तभी अनिलजी उनको इस तरह तस्वीर देखते हुए बताने लगे यह तीनो बहनें है व बीच में बैठी महिला इनकी माँ है दिवाकर ।

  सुनन्दा के अलावा इनकी  दोनों बेटियां भी बहुत कामयाब  है।

 उसमे से एक डॉक्टरी व दूसरी  इंजीनियरिंग की पढ़ाई रही है।

तभी सुनन्दा आ जाती है  और अनिल जी के पास आकर उनके पैर छुटी है साथ मे ही वह दिवाकर जी के भी पैर छू लेती है यह सोचकर कि वह अनिलजी के बहुत अच्छे दोस्त है दिवाकर जी का मन एक पल के लिए उसको अपने ह्र्दय से लगाने के लिये व्याकुल हो जाता है पर किसी तरह वह अपने आप को रोक लेते है और उसको  प्यार भरी निगाह से देख मन ही मन आशीर्वाद देने लगते है . !

ओहो वही नैन नक्श वही चेहरा रूप सब कुछ तो मानसी जैसा है।

 तभी अनिलजी उनसे कहते है शौर्य की फाइल दो दिवाकर वह चौक कर हड़बड़ा कर फाइल निकाल कर टेबल पर रख देते है। सुनन्दा ने फाइल को पढ़ा व फिर दिवाकर जी से शौर्य के बारे में सब कुछ पूछने लगी साथ ही अपने असिस्टेंट से डायरी पर खास खास पॉइंट लिखवाने लगी।

फिर दिवाकर जी व अनिलजी को बोली यहाँ बहुत मुश्किल केस है एक तो मारपीट छेड़छाड़ साथ मे ही नशा   इस केस को सुलझाना थोड़ा कठिन होगा मेरे लिये पर मैं जो केस हाथ मे लेती हूँ उसको पूरा करके ही छोड़ती हूँ ।

 आप जाइये मैं आपको बुलाऊंगी व एक बार आपके बेटे से मिलने के बाद ही बता पाऊँगी की इस केस में क्या करना है मुझको आगे ,क्योंकि मैं ऐसे लड़को से सख्त नफरत करती हूँ जो नशा करते है लड़कियों को छेड़ते व परेशान करते है।


वह तो अंकल जी से हमारे बहुत अच्छे सम्बन्ध है आज इन्ही की बदौलत हम इस मुकाम पर पहुँचे है । हमारे उस वक्त में जब हमारे साथ कोई नही था कोई आसरा नही था तब  इन्होंने ही हमारी  मम्मी को अपनी दुकान में जॉब दी रहने के लिए घर दिया था ,इनका  वह कर्ज  आज भी हम पर बाकी है इसी कारण व आपकी इस उम्र व परेशानी को देखकर ही मैं यह केस हाथ मे ले रही हूँ ।

अनिलजी व दिवाकर जी घर आ जाते है रास्ते भर अनिल जी सुनन्दा व उसके परिवार के बारे में सबकुछ दिवाकर जी बताते है वह इस बात से अनजान थे कि उनका दोस्त दिवाकर ही सुनन्दा के पिता है। क्योंकि जब दिवाकर जी की शादी हुई थी वह लन्दन में थे और जब आये तब तक दिवाकर जी दूसरी शादी कर चुके थे । उन्होंने अनिल जी को अपनी बीती जिंदगी के बारे में कुछ नही बताया था। 

दोपहर को खाना खाने के बाद दिवाकर जी जब लेटे तो बस पुराने दिनों की याद में खो गये।

छोटू देख अबकी बार भी इसको लड़की हो गयी है ,मैंने कहा था कि जांच करवा लें पर तूने व मानसी ने बात नही मानी। अब इस घर का वंश कैसे चलेगा इन लड़कियों से ! 

इतनी मंहगाई है ऊपर से तीन लड़कियों का बोझ कैसे उठायेंगे इस महंगाई में । देख छोटू अब बस बहुत हो गया अब मैं कुछ नही सुनने वाली हूँ।

मैंने तुम्हारें लिए मेरी सहेली की बेटी दिव्या को चुन रखा था।

पर तुम ही इसके प्यार में पागल थे ।और इससे शादी की रट लगायें बैठे थे,ना इसके भिखमंगे माँ बाप ने कुछ दिया और अब इसको देखो लड़की पर लड़की जने जा रही है यह मनहूस ।

दिव्या तुमको पसन्द भी करती थी और इकलौती बेटी थी मेरी सहेली आरती की सब कुछ तुम्हारें नाम करने वाली थी वह,पर पता नही कहाँ से मनहूस तुम्हारें जीवन मे आ गयी ,देख छोटे मुझको और तुम्हारे पिताजी को तो वंश का नाम चलाने वाला लड़का चाहिये।

और दिव्या अब भी तुमसें शादी करने को तैयार है। तुमको इसको तलाक देना होगा वरना मेरा मरा मुहँ देखोगे बस ।

दिवाकर ने माँ को बहुत समझाया पर पुराने ख्यालात वाली रुक्मणि देवी मानो अड़ ही गई थी। मानसी अपनी दुधमुंही बच्ची को गोद मे लिए सारी बात सुन चुकी थी।

दिवाकर के कमरे में आते ही वह

दिवाकर के पैरों पर गिरकर रो

पड़ी थी कि वह ऐसा कोई निर्णय न ले जिससे उसको बाद में पछतावा हो ।

अपनी नन्हीं बेटियों के भविष्य का तो सोचें !उसने अपने प्यार की भी दुहाई दी ,पर दिवाकर वह अपनी माँ की कसम नही तोड़ सके।तुम भी रहो मानसी यही मैं तुम्हारा भी ध्यान रखूंगा,पर मैं माँ की कसम नही तोड़ सकूँगा।

 मानसी रोती बिलखती रही पर रुक्मणि देवी को ना उस पर तरस आया ना ही उन नन्हीं सी बच्चियों पर। 


उन्होंने कहा दिया मानसी को वो दिव्या के साथ नही रखेंगी क्योंकि उनकी सहेली इसी शर्त पर ही शादी करने को तैयार हुई है कि वह मानसी को तलाक दे व कुछ भी रुपया पैसा देकर उसको बेटियों सहित  घर से रुखसत कर दे। अब वह कुछ नही कर पाये माँ की जिद्द के कारण उन्होंने भी मानसी की तरफ से मुहँ मोड़ लिया ।बेचारी मानसी वह अपनी तीनों मासूम बच्चियों को लेकर अपने गरीब माता पिता के पास चली गई।

इसके बाद आज पच्चीस साल हो गए थे ,उनको मानसी को देखे । इस बीच उन्होंने कभी ये जानने की कोशिश तक नही की

मानसी व उनकी मासूम बच्चियां  किस हालत में है व कहाँ पर है।

   दिव्या से शादी के बाद बस वो उसके ही होकर रह गए ।क्योंकि दिव्या के यहां से मिले दहेज ने व धन दौलत ने उनको बिल्कुल दबा दिया ।और फिर एक साल बाद ही दिव्या बेटे को जन्म दे  माँ पिताजी की चहेती बहू बन गयी थी। वही शौर्य  बड़े होते होते  सभी के लाड़ प्यार में इतना बिगड़ गया कि वह उसको

सम्भाल ही नही पाये ।

और उन्होंने उसको रायगड़ से दिल्ली भेज दिया था।

पर यहां आकर वो और भी बुरी संगत में पड़ गया था,और आज जेल में बन्द था। आज वो सोच रहे थे कि बेटे के मोह और माँ की कसम ने उनको कितना मजबूर कर दिया था कि वह अपनी बच्चियों पर जिन्होंने तो दुनियां में आकर चलना भी ना सीखा था ,उनको अपने प्यार से वंचित कर दिया।आज अपने

बिगड़ हुए अय्यास बेटे को छुड़ाने वह अपनी उसी बेटी के दरवाजे जा खड़े हुए थे ,जिसने तो शायद उनको पहचाना भी नही होगा ।

आज उनको समझ मे आ गया था कि वह कभी एक अच्छे पति व पिता नही बन सके थे।

और ना ही यह समझ पाये की बेटियां किसी से भी कमतर नही होती है ,अगर उनको भी अच्छी परवरिश मिले तो ,जो कि मानसी ने अपनी बेटियों को बहुत अच्छी तरह से दी थी। आज उनकी आँखों से बहते आँसू तकिया भिगोते जा रहे थे जिनको पोछने वाला आज कोई नही था।

#बेटी_हमारा_स्वाभिमान_है

 

मंगला श्रीवास्तव इंदौर

स्वरचित मौलिक कहानी

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