ना मैं गाय हूं ना ससुराल मेरा खूंटा – सविता गोयल 

” तेरा दिमाग खराब हो गया है छोरी जो ऐसी बहकी बहकी बातें कर रही है!!! पता भी है एक तलाकशुदा औरत का समाज में रहना कितना मुश्किल होता है।  अपना नहीं तो कम से कम अपने मां बाप का तो ख्याल कर …..  बेटी और गाय खूंटे से बंधी हीं अच्छी लगती है  । ,,

  ” बस दादी…. ना मैं कोई गाय हूं और ना ससुराल मेरा खूंटा….  जानवर को भी ज्यादा परेशान करो तो वो भी खूंटा तोड़ कर भाग जाता है फिर मैं तो इंसान हूं …. सहन करने की एक सीमा होती है जो अब टूट चुकी है।  ना मुझे इस समाज की कोई परवाह है और ना आप जैसे अपनों की जो बेटी को पशु भी नहीं मानते। अरे अपनापन और प्यार के बिना तो जानवर भी किसी घर में नहीं टिकता फिर मैं तो इंसान हूं …  ,,

   

    मानवी की शादी एक साल पहले उसके पिता ने सुनील से कर दी थी। शादी से पहले जो लड़के और उसके परिवार के बारे में बताया और दिखाया गया था सबकुछ उसके विपरित था।

  ना तो सुनील कुछ काम धंधा करता था और ना हीं उसका चरित्र अच्छा था। रोज नशा करना,  मानवी को मारना पीटना, उसका एक एक जेवर भी बिक चुका था।  कई बार उसने अपने मायके में आकर सारी बातें बताई लेकिन ” बेटा तेरी किस्मत में यही था तो हम क्या कर सकते हैं ” जैसी बातों से हर बार उसे बहला फुसलाकर ससुराल भेज दिया जाता।  




 इस बार भी मानवी की दादी कुछ ऐसा हीं कर रही थी। ” अरे करमजली , औरतों को घर बसाने के लिए सबकुछ सहन करना पड़ता है।,, दादी ने फिर दलील दी।

  ”  क्यूं?? औरत हीं क्यों सहन करे सबकुछ?? इंसान को एक बार जीवन मिलता है और एक बार मौत .. लेकिन मैं रोज तिल तिल नहीं मरना चाहती …. 

   आज मानवी ठान कर आई थी कि किसी की दलील का अब उसपर कोई असर नहीं पड़ेगा । मानवी के अडिग फैसले को बदलना अब दादी के लिए मुश्किल हो रहा था।  इस बार मानवी को वापस भेजने के सारे दाव खाली जा रहे थे। 

   मानवी ने अपनी अटैची उठाई और दरवाजे से हीं वापस मुड़ गई क्योंकि उसे पता था इस बार भी हर बार की तरह कोई उसकी बात नहीं समझेगा। समाज का तो सिर्फ बहाना है असल में मेरे अपने हीं खुद की बेटी को बोझ समझते हैं। जब कोई सहारा नहीं देता तो इंसान को खुद ही अपना सहारा बनना पड़ता है ।

    मानवी ज्यादा पढ़ी लिखी नही थी लेकिन घर के कामों में बहुत होशियार थी वो । खाना भी अच्छा बना लेती थी  ..  इसलिए उसने अपने हुनर को हीं अपनी आजीविका बनाने का निश्चय किया। पूंजी तो थी नहीं इसलिए एक ढाबे पर खाना बनाने का काम पकड़ लिया। वो ढाबा एक वृद्ध दंपति का था जो अपने बेटों के द्वारा ठुकराने के बाद उन्होंने अपनी मेहनत और दम पर खड़ा किया था।  मानवी उन्हें अपने जैसी हीं लगी क्योंकि वो भी परिवार की ठुकराई हुई थी।

    वहां काम करके उसे दो वक्त की रोटी और इज्जत की ज़िंदगी मिल गई थी और बुजुर्ग दंपति को एक सहारा। मानवी की मेहनत से वो ढाबा और बढ़िया चल पड़ा। मानवी  खुश थी क्योंकी उसे नरक जैसे जीवन से मुक्ति  मिल गई थी

#सहारा 

सविता गोयल 

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