मेरा क्या कसूर  – रीता खरे

 यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही अनु भी सुन्दर सुन्दर सपने सजाने लगीं थी, वह भी किसी सुन्दर राजकुमार के आने की प्रतीक्षा करती, पर वह जानती थी कि मध्यम परिवार एवं साधारण रूप के आगे असाधारण गुण विफल हो जाते हैं ।

      ग्रेजुएट होते होते उसकी कई सहेलियां प्रणय बंधन में बंधने लगी  और कुछ प्रणय के चक्कर में पड़ परिवार से बगावत् और कुछ प्रणय में धोखा खा चुकी थीं। इन सब बातों से अनु सोचती, क्या प्यार कभी सफल नहीं होता, यदि प्यार करने के बाद वह जीवन साथी न बन सका तो क्या जिंदगी बर्बाद न हो जायेगी । वह यही सोचती कि मां बाप तो अपने बच्चों का हित ही चाहते हैं, फिर क्यों लड़कियां गलत कदम उठा लेती हैं और जिंदगी भर रोती हैं।

        यही विचार उसके मन में तूफान उठाता रहता, पर वह भी दिल के हाथों मजबूर थी ।

        कुछ दिनों से वह देख रही थी कि जब भी वह छत पर या बाहर दरवाजे से निकलती दो आखें उसका पीछा करतीं, पहले तो वह अनदेखा कर देती , पर धीरे धीरे और चोरी चोरी वह भी देखने लगी थी, वह शायद सामने वाली बिल्डिंग में जो ऑफिस हैं, उसी में काम करता था, देखने में भी अच्छा भले घर का ही लगता था , और चाय पीने के बहाने नीचे कैंटीन में उसी के घर के सामने बैठता था, और आखें शायद उसी को तलाशती थीं , अनु भी किसी न किसी बहाने छत पर निकल आती, वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या यही प्यार है? अगर प्यार नहीं तो यह आकर्षण क्यों?


      धीरे धीरे वही आखें उसका पीछा करती हुईं उसके दिल में समा गई, अब वह भी उसे देखने के . लिये बेताब हो जाती थी। अनु की एक सहेली बसुधा जो किं बगल में ही रहती थी । वह एक दिन अचानक आकर बोली-

” क्या हुआ अनु, तुम कुछ दिनों से खोई खोई सी रहती हो, क्या बात है ?

   ” अरे, कुछ नहीं , कोई बात नहीं !”

“मुझसे छुपा रही हो, मेंने देखा है उसे तु

म्हें देखते हुये, अब बता दो क्या आग दोनों तरफ लगी है।”

” नहीं, नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं ।

तुम तो जानती हो, मैं प्यार व्यार के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती, अभी तो आगे पढ़ाई कर कैरियर बनाना है, फिर तुम्हें तो पता है?”

” क्या ?”

“मैं तो उसी से प्यार करूंगीं, जिससे शादी हो सके, कहीं जाति, दहेज का चक्कर आड़े न आये नहीं तो जिंदगीं भर प्यार के लिये तड़फते रहो ।” कहते हुये अनु जोर से हंस पड़ी ।


” नहीं मैं जाति का पता करूंगी, तभी तुम प्यार का चक्कर बढ़ाना, नहीं तो उसे भूल जाना ।” कहते हुये बसुधा भी हंसने लगी।

   अनु रोज उसे आते जाते देखती नजरें मिलती बस एक अलग प्रकार का अहसास महसूस करती । इसके अतिरिक्त कभी कोई बात नहीं हुई ।

   बसुधा का कोई परिचित भी उसी ऑफिस में काम करता था , जिसके द्वारा यह पता लग गया था कि अनु और वह एक ही जाति के हैं ।

   “अरे अनु, आज मैं अंकल को बता दूंगी वैसे अंकल तुम्हारे लिये लड़का ढूंढ़ हीं रहे हैं , फिर अगर शादी उसके साथ हो जाये तो तेरे मन की मुराद भी पूरी हो जायेगी । ” कहते हुये बसुधा अनु के गले लग गयी ।

      ” नहीं नहीं बसुधा, तुम बाबूजी से कुछ मत कहना, मुझे डर लगता है, कहीं वो कुछ गलत न समझ लें ।”

 ” अरे जब प्यार किया तो डरना क्या? ऐसे डरती रहोगी तो कहीं बनी बनाई बात न बिगड़ जाये, कभी कभी चुप्पी और अनकही बातें  जिंदगी भर रुलाती हैं, पता नहीं किसके साथ बंध जाओ, फिर पछताती रहोगी।” बसुधा ऐसा बोल बहुत समझदारी का परिचय दे रही थी।

” अभी शादी थोड़े हो रही है, जब होगी देखा जायेगा”

कहते हुये अनु उदास हो गई , अच्छा हटाओ ये सब बातें ,चलो चाय पीते हैं और अनु चाय बनाने लगी , पर उसका दिल और दिमाग बैचेन थे, ये क्या हो गया मुझे क्यों उसकी सूरत हर समय आखों में आती है. जबकि मैं तो उसका नाम भी नहीं जानती ,कौन  है ?


“. सुन मेरी बात, तू उससे खुद बात करले, यह नजरों का अहसास कब तक चलता रहेगा, प्यार की सम्पूर्णता तो उसे पाने में ही है। तू उसके सामने अपना दिल खोल कर रख दे ।” बसुधा कहती

  पर अनु तैयार नहीं होती, उससे बात करने को, वह तो दार्शनिको की भांति बोलती –

” सब कुछ पा लिया तो चाहत कैसी, कुछ अधूरी

चाहतें जिंदगी जीने का मजा देतीं हैं।”

” गलत, अधूरी चाहतें मजा नहीं, दर्द देती हैं । अभी समझ जाओ, उस अजनबी को अपना बनालो, प्यार में मन का समपर्ण जरूरी है।” बसुधा कह कर शांत होगई ।

 ” तेरी याद को दिल से लगाये हुये,

    होके तनहां ओ दूर चली जाऊंगी।

 मेरे दिल को बांधने वाले ऐ अजनबी,

क्या कभी तुमको भी याद आऊंगी।”

   कहती हुई अनु गंभीर हो गई।


शायरी करती रह जाओगी, और बंध जाओगी किसी के साथ ।

      समय परवाज की भांति उड़ चला, पर अनु समय के आगे मजबूर हो गईं , और बंध गई एक अनचाहे, अनजाने बंधन में, और चली गई अंजानी डगर पर ।

     अनु जब भी मायके आती,  उसका मन  उस अजनबी के पास पहुंच जाता, यह जानते हुये भी यह गलत है।

क्या उसे उसको याद करने का अब अधिकार है, ? फिर क्यों वह उसके मन मस्तिष्क पर छाया रहता है।

   वह हर बार अपने दिमाग को झटकती रहती पर दिल को काबू नहीं कर पाती, और शायद जिंदगी भर नहीं कर पायेगी।

       कहते हैं समय धीरे धीरे घाव को भरता है, पर घाव अपना निशां छोड़ जाता है, यही हाल अनु का था, वह अपने परिवार की जिम्मेवारी और पति के प्यार में रम गई थी, और वह घाव के निशान कोभी मिटाने की कोशिश करती थी, जो शायद उसके वश की बात नहीं थी,क्योंकि उम्र के इस पड़ाव पर इन निशानों की अहमियत नहीं रहती, शायद यही जिंदगी का सच है, और होना भी चाहिये ।


     पर अब इस सोशल मीडिया को दोष दे या शुक्रिया कहे, जिसने फिर उसके घाव को उभरने का अवसर दिया, जब फैशबुक पर जिंदगी के इस मोड़ पर मुलाकात हो गई, और वह बीता समय बार बार उसके मस्तिष्क को झकझोरने के साथ दिल पर भी हावी होने लगा । लाख कोशिस करने के बाद भी वह उस रात सो न सकी, क्या यह प्यार का अहसास है? क्या उसके दिल में अभी भी वह जीवित है? वह समझ नहीं पा रही थी, उसने दिमाग को झटक कर उससे छुटकारा पा लिया, पर दिल बेचारा बोल उठा, प्रेम तो शाश्वत सत्य है,वह तो एक अहसास के रुप  में जिंदगी भर दिल के एक कोने में छुपा बैठा रहता है, जैसे पुरानी यादें दिल के झरोंखें से कभी कभी बाहर निकल कर किसी भी उम्र में ताजी हो जाती है ऐसे ही यह अहसास है, तो इसमें मेरा कसूर?”

सच ही तो है, प्रेम तो शाश्वत सत्य है, उसमें दिल का क्या कसूर? अनु सोचते हुये बैचेन हो उठी।

रीता खरे

मौलिक रचना

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