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मायका – गीतांजलि गुप्ता

रवीना ने छोटी सी उम्र में ही अपने माता पिता को खो दिया था। दादा दादी ने पूरे लाड़ प्यार से पाला था। चाचा चाची और  बच्चों को वो फूटी आँख नहीं भाती थी, इसलिए दादा जी  चाचा जी से अलग़ रहने लगे थे।

रवीना की शादी के बाद दादा दादी को चाचा जी अपने घर भले ही वापिस ले गए मग़र उनकी देखभाल के लिए बार बार रवीना को ही आना जाना पड़ता। अपनी गृहस्थी  के साथ साथ रवीना पूरी जिम्मेदारी से उनका ख़याल रखती थी। कुछ समय पहले पति की बदली दूसरे शहर में हो गई।

रवीना का दादा दादी के पास आना बहुत कम हो पाता। दादी की अचानक मृत्य हो गई। पता लगते ही भागी चली आई थी, परन्तु दादा जी के परलोक सिधारने की ख़बर चाचा जी ने दी ही नहीं। अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाई दुःखी मन से चाचा चाची से मिलने आई दादा जी के चित्र के सामने बिलख बिलख कर रोई।

चाचा चाची से स्नेह की कोई उम्मीद उसे नहीं थी। हरेक लड़की के लिए पिता का घर बहुत मायने रखता है और रवीना के तो पिता दादा जी ही थे। उदास, निढ़ाल रवीना अपने चाचा जी के घर से अपने घर हमेशा के लिए जाने  की तैयारी कर रही थी। सोच रही थी कि बस अब ये ही उसका आख़िरी फेरा है तभी चाची जी ने गले लगा लिया बोली, “दादा जी नहीं रहे तो क्या अब से ये ही तेरा मायका है, तेरे दादा जी ने मुझे तेरी जिम्मेदारी दी है। आँसू पोछ ले बिटिया, अब से मैं अपनी बेटी की आँख में आँसू नहीं आने दूँगी। ये बात तेरे दादा जी के जीते जी मैं समझ नहीं पाई। पीछे खड़े चाचा जी की आँखों में ममता देख रवीना ने चाची को गले लगा लिया।

उन दोनों के व्यवहार में अचानक आये परिवर्तन पर विश्वास तो रवीना को भी नहीं हो रहा था क्या राज है यह जानकर होगा भी क्या। झूठी सांत्वना ही सही पर कुछ तो अपने साथ ले ही जाएगी कहते हैं न कि बेटी मायके से ख़ाली नहीं जाती।

गीतांजलि गुप्ता

नई दिल्ली©®

 

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