मनमानी – मीनाक्षी चौहान

चार दिन नहीं हुए इस नई नवेली बहुरिया को घर में आए कि अपनी मनमानी करनी शुरू कर दी। कैसे ना कैसे मुझ से अपनी बातें मनवा ही लेती है और मैं भी उसकी प्यारी-प्यारी, मीठी-मीठी बातों में आकर हाँ में हाँ मिला ही देती हूँ।

परसों पहली बार मेरी रसोई में गोल की बजाय चार फाड़ वाली भिंडी बना डाली वो भी मेरी रज़ामंदी से। मन नहीं था पर मना भी नहीं कर सकी। लेकिन बनी खूब बढ़िया और करारी थी। सिर पर सवार ना हो जाये इसलिए बोला नहीं उसे। होंठ सिल लिये अपने।

कल की बात है मेरे लिए गुलाबी रंग की लिपस्टिक ले आयी बोली, “मम्मा आप एक बार ये वाला शेड ट्राई करो, और भी प्रीटी लगोगी।” अब भला ये भी कोई रंग है जो ठीक से दिखाई भी ना दे। लगाना ना लगाना एक बराबर। बस जबरदस्ती लगा दी मेरे। इनकी आँखों की चमक देखकर समझ गई कुछ तो बात है इस रंग में। सच कहूँ तो फब रहा था मुझ पे। मुँह पर ताला जड़ लिया, तारीफ़ के दो शब्द नहीं बोले उससे।


आज सुबह से ही हल्ला मचा रखा है मेरी इस बहुरिया ने। ना जाने इसे कैसे पता चल गया हमारी शादी की सालगिरह के बारे में। अट्ठाईस सालों में आज पहली बार घर के सारे लोग घेर-घेर के बधाई

देने लगे।

बाबूजी ने मिठाई मँगवा ली और बहुरिया ने केक। बाज नहीं आती अपनी मनमानी करने से। इस उम्र में हम दोनों से बच्चों की तरह केक भी कटवा दिया। मारे शर्म के इन्होंने बाबूजी को तो मैंने अपनी इस बहुरिया को ही केक खिला दिया। घर के लोगों ने खूब लिपट-चिपट कर हमारे साथ फ़ोटो खिंचवाई। साल दर साल यूँ ही निकल जाने वाले आज के इस दिन को इसने ही पहली बार हमारी मैरिज एनिवर्सरी बना दिया। खुशी इतनी कि मन भर आया और आँखे छलछला गईं। खूब कोशिश की मैंने हर बार की तरह चुप लगा जाने की पर बोले बिना रहा ना गया। माथा चूम कर बोल ही दिया अपनी बहुरिया को, “आखिर मन को मना ही लेती है…….. तेरी हर मनमानी।”

मीनाक्षी चौहान

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