लाल बॉर्डर की साड़ी – लतिका श्रीवास्तव

मेघना जी जड़ सी हो गई जब उनके पति शिशिर ने उन्हें देखते ही कहा,ये क्या पहन लिया तुमने!!ये रंग तुम पर सूट नहीं करता,इतने चटक रंग की साड़ी पहनने की तुम्हारी उम्र है क्या??जाओ मेहमानों के आने से पहले चेंज करके आओ!!और हां इस बार ध्यान रखना ……अरे अकल नहीं है तो पूछ लेना था मुझसे!!क्या क्या मैं देखूं और सुधारू तुम्हारा…..!!सबके सामने शिशिर के तानों और आंखों ने उन्हें हमेशा की तरह सहमा दिया था और अपने कक्ष में जाने को बाध्य कर दिया था…..

वैसे ये कोई पहली बार नहीं हो रहा था,ऐसे वाक्य ऐसे ताने तो जैसे उनकी दिनचर्या के अभिन्न अंग ही बन गए थे….पर आज तो ऐसा नहीं कहना चाहिए था,आज…..

उनकी बहू आ रही है,उनके इकलौते पुत्र की शादी बड़ी धूमधाम से संपन्न हुई आज बहू के स्वागत में भव्य पार्टी का आयोजन किया गया था,मेघना जी का उछाह देखने लायक था….कितने अरमान से बहु आगमन पार्टी में बढ़िया लाल बॉर्डर की सिल्क साड़ी उन्होंने तैयार करवाई थी,साथ में आज सालों के बाद मैचिंग गहने भी पहने थे,आईने में अपने आप को देख कर वो खुद ही शर्मा गईं थीं …..पर शिशिर ने तारीफ़ करने के बजाय सबके सामने ऐसा कहकर उन्हें मुंह दिखाने लायक स्थिति में नहीं रखा था….पता नहीं शिशिर को मेरी इस तरह बेइज्जती करके क्या सुकून मिलता है?? मारे क्षोभ के उनकी आंखों में आंसू आ गए….और उन आंसुओ के साथ ही जैसे पिछले जीवन के कितने दृश्यों के पर्दे खुलने लगे…..

शादी के बाद से ही उनकी पसंद की आलोचना करना जैसे शिशिर का प्रिय शगल बन गया था…. मेघना एक पढ़ी लिखी सुंदर पत्नी थी,शिशिर की इज्जत करती थी,हर काम में उसकी सलाह लेती थी उसको बता कर करती थी, कहीं भी जाना हो कुछ खरीदना हो मेघना शिशिर से बिना पूछे कुछ भी नही करती थी….लेकिन धीरे धीरे उसने महसूस किया शिशिर हर बार उसकी बातों की उसकी खरीददारी की अवहेलना करता था,अपनी सही गलत बाते उस पर थोपना अपनी मर्दानगी समझता था ,.पत्नी मेरे अनुसार चलती है दोस्तों और रिश्तेदारों के बीच ये बात उसका अहम तुष्ट करते थे…….

हर अच्छा निर्णय और अच्छी बात का श्रेय शिशिर को और हर खराब घटना या निर्णय की उत्तरदाई मेघना ही बनती आई है…… 



……शादी के बाद पहली बार जब वो कॉफी बना कर लाई तो सबने बहुत तारीफ की जबकि शिशिर मौन ही रहे और पूछने पर बोले शक्कर ज्यादा थी इस घर में इतनी शक्कर कोई नही पीता……उनके दोस्त के घर पार्टी में जाने को तैयार हुई तो शिशिर ने अपनी भाभी से  कहा भाभी अब आप ही इसे कुछ कायदा सिखा दो,मेरे साथ तो कहीं जाने लायक ही नहीं है ये!!फिर वहां पार्टी में सबके इसरार पर जैसे ही उसने जूस का गिलास उठाया पता नही शिशिर की सहमा देने वाली निगाह मिलते ही घबराहट में उसका हाथ कांप गया था और गिलास उसके हाथ से छूट कर उसके और कई मेहमानों की ड्रेस भिगोता चला गया था…. सबके सामने शिशिर ने कितना कुछ सुनाया था उसे कि मेजबान को आकर टोकना पड़ा था….

…एक बार शिशिर के जन्मदिन पर मेघना बड़े शौक से एक शर्ट खरीद के ले आई तब….

मेघना तुमको किसने कहा था मेरे लिए शर्ट खरीद के लाने को,पहले मेरी पसंद तो समझ लो, खरीददारी करने की अकल भी है तुम्हे !! ,इतनी घटिया शर्ट आज तक मैने नही पहनी…..तब से आज तक मेघना ने शिशिर के लिए कुछ भी नही खरीदा।

एक बार मेघना की घनिष्ठ सहेली उसके घर आई थी, दोनों बातें करने में मशगूल  थे उसी समय शिशिर आ गए,और दोनों की हंसी मजाक को अपने ऊपर ले लिया,….”अच्छा तो अब अपनी सहेली से मेरी बुराई कर रही हो….बहुत हंसी आ रही है तुम्हें इतनी देर तक गप्पे लडाने की फुरसत मिल गई तुम्हें,वैसे तो  कहती हो टाइम ही नहीं मिल पाता ……..मेघना को अपनी सहेली का अपमान से दग्ध चेहरा अभी तक याद है …. उस दिन के बाद से उसका कोई भी परिचित उसके घर नहीं आता।

एक बार और शायद अंतिम बार ही दोनो साथ में बाजार गए थे घर के लिए नया सोफा सेट लेना था…दुकान में.उसके एक सोफा पसंद करते ही दुकानदार और बाकी सभी के सामने शिशिर उस पर झल्लाने लग गया था, अरे तुम्हें तो किसी चीज की अकल ही नही है,कुछ पूछना ही बेकार है तुमसे तो,सोफा खरीदने आ गईं!!हुंह ….कोई आइडिया भी है तुम्हें…!

मेघना अधिकतर मौन भाव से सब सहन करते हुए बिना कोई आपत्ति किए स्वीकार करती चली आ रही है।प्रतिकार करने की असमर्थता और अवज्ञा करने पर घर का वातावरण असहज होने का खौफ, समझाने की कई असफल कोशिशों और मायके तक अपनी इस दयनीय स्थिति उजागर ना होने की सफल कोशिशों के कश्मकश में मेघना का जीवन शिशिर के हर अनुचित व्यवहार और बातो को भी स्वीकारने हेतु बाध्य होता आया है।


बहुधा वो अपने प्रति शिशिर के इस असंवेदनशील और कटु बर्ताव का कारण अपनी ही कमियों को सोचकर कुंठित होती रहती है।

…..पर आज उसकी बहू आने वाली है….. उसकी जिंदगी का नया पड़ाव आरंभ होने वाला है..!क्या अब इस उम्र में भी अपनी बहू के सामने उसे इस तरह अपमानित होना पड़ेगा!!!शिशिर की तो आदत बन चुकी है उनके लिए तो ये सब स्वाभाविक है पर आने वाली बहू के लिए ये अस्वाभाविक भी रहेगा और सास की इज्जत घटाने वाला होगा…क्या बाकी की जिंदगी में अब उनकी बहू भी इसी तरह का बर्ताव उनके साथ करेगी??? नहीं.. नहीं…इसकी कल्पना से ही मेघना सिहर गई….अपने इसी कक्ष में आंसू बहाते अनगिनत पल उसकी आंखों के सामने से गुजरते चले गए…………

…….आज भी बिस्तर पर उसकी आंखों के सामने शिशिर की थोपी गई पसंद की साड़ी हर बार की तरह उसके खामोश आज्ञापलन की विवशता को मुंह चिढ़ा रही थी और शायद उसकी पसंद की लाल बॉर्डर साड़ी की अनाधिकार चेष्टा को पैरो तले लाने का इंतजार कर रही थी……

अचानक उन्हे आज ये बात शिद्दत से महसूस हुई कि शिशिर के इस असंवेदन शील बर्ताव को बढ़ावा देने में उनकी निःशर्त मूक सहनशीलता ने भी अहम रोल अदा किया है,वो चुपचाप मानती गईं,सहन करती गईं इसीलिए शिशिर ऐसा करना अपना हक समझने लगा….पत्नी की सहनशीलता भरी समझदारी का दुरुपयोग करता गया..!

   “मालकिन बहू जी आ गईं हैं भैया जी आपको ढूंढ रहे हैं….आवाज सुनकर वो वर्तमान में आ गई,वो जानती थी बेटा उनको ही ढूंढेगा और वहां नहीं पाकर चिंतित हो जायेगा….. एक ठोस निर्णय करते हुए उन्होंने पति की थोपी साड़ी को उसकी जगह बताते हुए अलमारी में रख दिया और अपनी पसंद की लाल बॉर्डर साड़ी को अपने ऊपर फिर से ठीक किया और जैसे ही हाल में बहू के लिए बुके लेकर उसके पास गईं बहू ने तुरंत उनका हाथ पकड़ कर अपने पास बुलाया और शिशिर के बगल में खड़े करते हुए  सबके सामने जोर से तारीफ करते हुए कहा ,”अरे वाह मम्मी आज तो आप बहुत सुंदर लग रही है ये बुके तो आपके लिए ही सही लग रहा है ,बेटे ने भी बहुत स्नेह से हंसकर हां मम्मी आज तो आपका ही दिन है …. कहकर  आगे बढ़कर उनके पैर छू लिए….उनकी आंखों की आत्म विश्वास भरी चमक ने आज  शिशिर की सहमा देने वाली आंखों को सहमा दिया था।

V P

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