आइसक्रीम – जयसिंह भारद्वाज

रीटा’ज आइसक्रीम की एक स्टैंडिंग टेबल में आमने-सामने हम दोनों खड़े-खड़े आइसक्रीम खा रहे थे। धीरे से वह बोली, “कल क्या हो गया था आपको?”

“कल..कब!” मैंने उसे देखते हुए अचरज से कहा।

“अरे यार! कल शाम फाउंटेन पार्क में तुझे कौन सा जूड़ी बुखार आया हुआ था जो ब्रेकअप माँग रहा था मुझसे।” उसने झुँझलाते हुए कहा।

“शाम को फाउंटेन पार्क.. ब्रेकअप… यह क्या कह रही हो। मुझे तो कुछ भी याद नहीं।” मैंने बच्चे जैसी मासूमियत से कहा।

“यार! तू आज फिर से शुरू हो गया न!” झुँझला कर दोनों हाथों से उसने अपने बाल नोच लिए फिर अपना सिर पकड़ कर कोहनियों को मेज पर टिका दिया। फिर अचानक मुझे देखते हुए मुस्कुरा पड़ी और बोली, “यस, दैट्स इट! सच्ची में…. प्रेम के भारी पलों को भुला देने का यह हुनर मुझे भी सीखना है आपसे। बढ़िया। अच्छा.. वो देखो! एक लड़की की ड्रेस कितनी अच्छी है।” मेरे पीछे संकेत करते हुए बोली।

“मुझे तुम्हारे सिवा कोई लड़की नहीं दिखती। मुझे नहीं देखना।” उसकी शरारत भाँपते हुए मैंने उसे देखते हुए कहा।

“ओए होए मिस्टर चश्मिश!” वह खुश हुई और फिर बोली, “अच्छा, उस बन्दे की शर्ट देखो.. कैसी है।”

मैं चकमा खा गया और जैसे ही उधर घूमा, मुझे मेरे गालों पर आइसक्रीम की ठंडक महसूस हुई। पलक झपकते ही उसने आइसक्रीम लगे होठों से मुझे चूम लिया था और मुझे देख कर मुस्कुराते हुए अपना अँगूठा दिखा रही थी।

गाल पोछ कर मैं अपनी कुल्फी खाने लगा।




वहॉं से निकल कर घण्टाघर की तरफ साथ-साथ पैदल चलते हुए वह बोली, “कल रात को आसमान में चंद्रमा देखा, उदास दिखा। मुझे लगा वह आप हो, सच्ची में। सुबह देखा कि पारिजात के फूल आँगन में बिछे पड़े हैं किंतु वे खुश नहीं थे। फिर से मुझे आपकी याद आ गयी। आपकी उदासी से मुझे बेइंतेहा मोहब्बत है। सुबह बादल बहुत नीचे झुक कर बरस रहे थे। मुझे लगा कि ये आप ही हो जो रोये जा रहे हो.. रोये जा रहे हो अकारण ही। देहरी में बैठकर मैं भी रोने लगी थी। और मजे की बात सुनो! आप भी मेरी ही तरह पक्के झूठे हो जो मुझसे अलग होकर प्रसन्न रहने की बात कह देते हो.. है न! अकेले ही दुनिया से लड़ने का ख्वाब देखते हो! मुझे संग लिए बिना यह सम्भव न होगा ‘जय’ आपसे। है कि नहीं।”

मैंने कुछ कहा तो नहीं .. बस अपनी उँगलियों में फँसी हुई उसकी उँगलियों पर दबाव बढ़ा दिया। प्रतिक्रिया में उसने भी यही किया। और चलते रहे .. बढ़ते रहे ऑटो स्टैंड की तरफ..

(कहानी की तारतम्यता के लिए कृपया इसके पहले की कहानी “ब्रेकअप” अवश्य पढ़ें।)

             -/दो कदम साथ साथ/-

स्वरचित: ©जयसिंह भारद्वाज, फतेहपुर (उ.प्र.)

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