गुरु मंत्र – अंजू निगम

मैं अपनी ही बहन का फोन “इग्नोर”करने लगी थी|मुझे लगता कि वो हर बात को लेकर कुछ  ज्यादा ही परेशान हो जाती हैं|फिर वो समय नहीं देखती और तुरंत मुझे फोन कर देती|

   बाई के न आने या नलके में पानी न आने जैसी छोटी बाते भी उसे बेतरह परेशान करती|समय के साथ उसकी ये परेशानियाँ मुझमें भी नकारात्मक सोच भरने लगी थी और जरा सी बात पर मेरा मुँह भी लटकने लगा था|मेरा चिड़चिड़ापन मेरी गृहस्थी पर असर डालने लगा था|

“तुम हर छोटी बात को ले इतनी परेशान क्यों हो जाती हो?तुम्हारे ये तरीके चीजो को नहीं सुधार पायेगे|खुश रहा करो और दूसरो को भी यही सीख दिया करो|”

 मेरे पति बात ठीक कह रहे थे|मैंने देखा था कि परिस्थिति कितनी विषम हो,उससे ऐसे निकल आते जैसे कुछ हुआ ही न हो|

“मैं भी आपकी तरह होती|बड़ी से बड़ी बात को भी सहजता से लेती|कौन सा गुरू मंत्र पढ़ते हैं आप,जरा मेरे कान में भी वो फूंक दीजिये|”मैं अपने चेहरे पर मुस्कान सजा कर बोली|

 “मुस्कुराती कितनी अच्छी लगती हो|”पति के चेहरे पर छायी चमक बता रही थी कि वो वाकई मुझे ऐसे ही मुस्कुराता देखना चाहते है|

   पिछले कुछ महीनो से अपने चिड़चिड़े व्यवहार का मुझे अफसोस था|

“बस और नहीं|पति के दिये गुरू मंत्र को मैं जीवन में जरूर उतारूँगी”ये तय किया तो मुझे बहुत हल्कापन लगा अपने अंदर|

  अगले दिन जब मोबॉइल की स्क्रीन पर बहन का नाम चमका तो मैंने उसके कान में भी यही गुरू मंत्र फुंका|

“जीवन जैसा आता जाए,उसको वैसा ही जीते जाओ|होंठो में मुस्कान फैलाये|”

अंजू निगम

नई दिल्ली

 

 

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