बहू का फर्ज तो बेटी का कर्तव्य कुछ नहीं – संगीता अग्रवाल 

” श्रेयश पापा को मेरी जरूरत है फिर यहां है क्या जिसका मोह हो तुम्हे !” मंजूषा अपने पति से बोली।

” तुम्हे जाना है तो जा सकती हो पर मैं नहीं जाऊंगा !” श्रेयश सपाट लहजे में बोला।

” श्रेयश मैने तुम्हारे मम्मी पापा की बीमारी में इतनी सेवा की यहां तक कि तुम्हारे भाई के ऐक्सिडेंट में भी जी जान से सेवा की अब मेरे पापा को थोड़ी सी हमारी जरूरत है मान जाओ ना प्लीज़ मैं अकेली बच्चों के साथ जाऊं ये क्या पापा को गंवारा होगा !” मंजूषा प्यार से बोली।

” मेरे मम्मी पापा का तुमने जो भी किया वो फर्ज था तुम्हारा तुम बहू हो किसी दामाद का फर्ज नहीं होता अपने सास ससुर का करना ये सिर्फ बहू का फर्ज होता है अब मुझे इस टॉपिक पर बहस नहीं चाहिए। मेरा जब मन होगा तब सोचूंगा मैं वहां जाने की !” श्रेयश ने दो टूक कहा और बाहर निकल गया।

ये है श्रेयश और मंजूषा बीस साल से शादीशुदा हैं। दोनों के दो बच्चे भी हैं बेटी कॉलेज में और बेटे ने इसी साल बारहवीं के पेपर दिए हैं। श्रेयश के मम्मी पापा इस दुनिया में नहीं है और भाई को कोई मतलब नहीं उससे। मंजूषा के परिवार में उसका एक बीमार भाई और पिता हैं मां की मृत्यु अभी चार साल पहले ही हुई है। मंजूषा के पापा जीवन की सांझ में चाहते हैं कोई अपना साथ हो जिससे उन्हें अपने बेटे की भी चिंता ना रहे इसलिए उन्होंने मंजूषा से उनके साथ आकर रहने की पेशकश की श्रेयश की कोई खास नौकरी भी नहीं घर भी किराए का है तो जाने में हर्ज भी नहीं पर श्रेयश ज़िद्द पर अड़ा है। जबकि मंजूषा ने अपने सास ससुर की हमेशा सेवा की अब जब उसके पापा को जरूरत तो श्रेयश मुंह मोड़ रहा है।

” हे ईश्वर तूने एक बहू और पत्नी के हिस्से सारे फर्ज ही क्यों लिखे । एक बहू बेटी बन सकती है तो एक दामाद बेटा क्यों नहीं !” मंजूषा ये सोचते हुए रोने लगी।



धीरे धीरे समय गुजरने लगा मंजूषा की बेटी का कॉलेज पूरा हो गया और बेटा फाइनल ईयर में आ गया। इस बीच मंजूषा ने श्रेयश को बहुत समझाया अपने मायके चलने को यहां तक कि उसने ये भी कहा कि मायके के पास घर ले लेते हैं जिससे पापा की भी देखभाल हो जाएगी पर वो टस से मस नहीं हुआ। मंजूषा के बच्चों ने भी पापा को बहुत समझाया पर वो अपनी ज़िद पर अडा रहा। बच्चे अभी पैरों पर खड़े नहीं थे अपने जो वो कोई फैसला लेते।

” हैलो बेटा , तुम्हारे पापा को माइनर सा अटैक आया है !” एक दिन मंजूषा के पास उसके पापा के दोस्त का फोन आया।

” अंकल पापा ठीक तो हैं ना ?” मंजूषा ने चिंतित हो पूछा।

” फिलहाल वो ठीक हैं पर तू अब देर मत कर आ जा यहां !” अंकल ने ये बोल फोन रख दिया।

मंजूषा रोने लगी क्यों एक बेटी इतनी बेबस हो जाती है कि अपने जन्मदाता के लिए कुछ नहीं कर पाती है उसने खुद से सोचा।

” नहीं मैं बेबस नहीं हूं… एक औरत जब घर संभाल सकती बच्चे पैदा कर सकती उनकी अच्छी परवरिश कर सकती यहां तक की अपने ससुराल के हर फर्ज निभा सकती तो अपने जन्मदाता के लिए ये बेबसी क्यों नहीं हूं मैं बेबस !” उसने खुद से कहा। और अपना व बच्चों का सामान पैक करने लगी।

” श्रेयश मैं पापा के पास जा रही हूं बच्चो को लेकर तुम सोच लो तुम्हे क्या करना है मैं तीन महीने का वक़्त देकर जा रही हूं इस बीच फैसला ले लेना वहां आओगे तो तुम्हारा स्वागत है और नहीं भी आना चाहो तो तुम स्वतंत्र हो !” श्रेयश के आने पर मंजूषा ने अपना फैसला सुना दिया।

” तुम….!” श्रेयश कुछ बोलने को हुआ तो मंजूषा ने हाथ के इशारे से चुप करवा दिया।

” बस श्रेयश मेरी कैब आ चुकी है मैं चलती हूं उम्मीद है तुम फैसला जल्दी लोगे। एक बहू के फर्ज बाखूबी निभाए मैने अब एक बेटी का फर्ज निभाना है जिसे निभाने से मुझे कोई नहीं रोक सकता !” मंजूषा बोली और बच्चों को साथ ले निकल गई।

ट्रेन में बैठी हुई मंजूषा अपने बचपन की यादों में खोई थी कि अचानक एक स्टेशन आया और गाड़ी रुक गई। मंजूषा ने बाहर झांक कर देखा एक लड़की अपने बूढ़े बाप का सहारा बनी उन्हें सीढ़ियों पर सहारा दे ले जा रही है।

” बेटा तू खुद बैसाखियों पर है मुझे कैसे सहारा देगी !” उस लड़की का पिता उससे बोला।

” पापा कोई बैसाखी एक बेटी को उसके पापा को सहारा देने से नहीं रोक सकती आप चिंता मत करो !” वो लड़की हंस कर बोली और धीरे धीरे उन्हें सीढ़ियां पार करा दी।

” पापा आपकी बेटी भी अब तक अपाहिज थी जो दूसरों की बैसाखियों के सहारे थी अपना फैसला खुद नहीं ले पा रही थी आज उसने अपनी बैसाखी छोड़ खुद से चलना सीख लिया है और वो आ रही है आपके पास …अपने जन्मदाता के पास।

दोस्तों आपको मंजूषा का फैसला कैसा लगा बताइएगा जरूर।

आपकी दोस्त

संगीता अग्रवाल 

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