औरत को इतना भी नसीब नहीं होता – मीनाक्षी सिंह

सुरभी ,शाम को तैयार हो जाना और बच्चों को भी कर देना…घूमने चलेंगे …कई दिन हो गए ,तुम लोगों को कहीं घुमाया नहीं हैँ…खाना भी बाहर ही खायेंगे ,,कुछ बनाना मत …पतिदेव के मुंह से ये शब्द सुन सुरभी ख़ुशी से झूम उठी….

विक्रम मैं क्या पहनूँ ,वेस्ट्रन य़ा साड़ी …कुछ भी पहन लो यार ..मैं जा रहा हूँ..6 बजे तक रेडी रहना….इतना कह विक्रम तो काम पर चला गया ..पर सुरभी बस घूमने के ख्यालों में खोयी रही …खोयी भी क्यूँ ना ,,अरसा हो गया उसे घूमे हुए पति ,बच्चों के साथ …सुबह से शाम तक चकरघिन्नी सी बनी बस बच्चों और पतिदेव की सेवा में लगी रहती हैं ….बच्चों के स्कूल और पतिदेव के ऑफिस जाने के बाद घर के काम कर जो थोड़ा बहुत समय मिलता हैँ उसमें अपनी कमर सीधी कर लेती हैँ सुरभी…पर आज घूमने की ख़ुशी में आराम के समय अपने और बच्चों के कपड़े पर प्रेस करने बैठ गयी ….बच्चों के जूतें खुद की सेंडिल से धूल हटा कपड़े से साफ कर बाहर रखी..यह क्या ब्लाऊज तो बहुत ढ़ीला हो गया हैँ..जल्दी से सिलाई  मशीन निकाली ,ब्लाऊज टाईट किया ..चूड़ी निकाली मैंचिंग की …फेस पर पैक लगाया..बेचारी को पूरी दोपहर हो गयी घूमने जाने की तैयारी करने में..बच्चें स्कूल से आयें तो उन्हे भी बताया कि पापा आज घुमाने ले जा रहे हैं …बच्चें भी घूमने की ख़ुशी में पूरी दोपहर इधर ऊधर खुश होकर नाचते रहे …सुरभी ने सारे बर्तन साफ कर दिये ये सोचकर कि आज तो खाना बाहर खाना हैँ..लौटकर थक ज़ायेंगे तो कोई काम फैला नहीं होगा ..सब सो ज़ायेंगे… 5 बजे से तैयार होना शुरू किया ..6 बज गए  ..सुरभी और बच्चें तैयार होकर गेट पर खड़े हो गए पापा के  इंतजार में…

पतिदेव का फ़ोन आया ..यार सुरभी आज ऑफिस में पार्टी हैँ थोड़ा लेट हो जाऊंगा ..तुम लोग खाना खाकर सो जाना ….ठीक हैँ..सुरभी उदास होकर बोली..तुमने तो आज घुमाने का वादा किया था हमें..बच्चें तैयार खड़े हैँ…उनसे क्या बोलूँ ??? मन ही मन सोची मेरे तो नसीब में ही सामंजस्य बैठाना लिखा हैँ जीवन से…

अच्छा ,,ऐसा कहा था क्या मैने..कोई बात नहीं ..कभी और चलेंगे..बच्चों को पार्क घुमा लाओ..मन बहल जायेगा …तुम भी चली जाओ ..

सुरभी ने फ़ोन रखा ….मन ही मन सोची ये इतना सज संवरकर अब पार्क जाऊँ … बच्चें समझ गए ,बोले हर बार की तरह  हम कहीं घूमने नहीं जा रहे …पैर पटकने लगे…सुरभी उन्ही को मनाती रही ….आज उसे थकान बाकी दिनों से भी ज्यादा लग रही थी ..मानसिक भी और शारीरिक भी….पास की विमलेश जी हंसकर व्यंग कस्ते हुए   बोली…अब नहीं जा रही..कोई नहीं..तैयार हुई हो तो अकेले ही घूम आओ …सुरभी बच्चों का हाथ पकड़ गेट बंद कर अन्दर आ गयी …..😐😐😐😐

मीनाक्षी सिंह की कलम से

आगरा

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