सुबह का भूला – नीलम सौरभ

“नहीं मम्मीजी, ऐसा तो अब कहीं नहीं होता…और होता भी होगा तो मुझसे नहीं हो पायेगा!”
आज यह पहली बार था कि परिवार की छः माह पुरानी छोटी बहू स्तुति सास की असंगत बात सह नहीं सकी थी तो उलट कर बोल पड़ी थी। वह अब तक विदाई के समय माँ, ताई जी व बड़ी भाभियों के सिखाये संस्कारों के कारण कड़वा घूँट पीती हुई भरसक चुप रही थी लेकिन आज उसे लगा, अब बस! बहुत हुआ, अब और नहीं!!
सास अनुराधा देवी के लिए बहू का यूँ जवाब देना कतई असहनीय था। पल भर में उनका पारा चढ़ गया। कल की आयी, इसकी ये मज़ाल…बड़ी बहू को आये दस साल हो गये, आज तक उसका कभी मुँह नहीं खुला और ये…! मारे क्रोध के वे उबल पड़ीं।
___”छोटी बहू, तुम न बहुत ज्यादा बोलती हो! यही सीख कर आयी हो क्या मायके से कि सास के सामने अपशब्द बोलो, उनकी बेइज़्ज़ती करो? कान खोल कर सुन लो…यह सब मेरे घर में नहीं चलेगा। बहू हो, बहू की तरह रहो मर्यादा में…समझीं न!”
स्तुति इस मिथ्या आरोप से पहले तो हैरान खड़ी रह गयी। फिर उसे लगा कि अभी चुप रहने का मतलब तो आरोप को स्वीकार करना होगा अतः उसने एक बार फिर से अपनी सफाई में कुछ कहने की कोशिश की।
____”लेकिन मम्मीजी…अपशब्द कहाँ बोला मैंने…और किसी की भी बेइज़्ज़ती क्यों करना चाहूँगी…मैं तो केवल अपनी बात…!”
____”बहुत हुआ स्तुति बहू, अब एक शब्द भी नहीं…कोई इस तरह अपने से बड़ों से बहस करे, हमें बिल्कुल बर्दाश्त नहीं। आज तक हमने भी ससुराल वालों के सामने मुँह नहीं खोला और तुम उल्टा जवाब दे रहीं…कुछ नहीं तो अपनी जेठानी धरा से ही कुछ सीख लो! कम बोलती है, मीठा बोलती है, कभी तुम्हारी तरह जुबान नहीं लड़ाती। शरम-लिहाज गहना है उसका…तभी हम सबको शुरू से इतनी प्यारी है। और…तुम…तुम तो जाओ यहाँ से!” 

गुस्सा नियंत्रण से बाहर हो गया था तो अनुराधा जी चिल्ला पड़ी थीं।
बेहद अपमानित होकर स्तुति वहाँ से अपने कमरे की ओर चल दी। बेबसी में उसके आँसू निकल आये थे।
____”हे भगवान, कैसे जिंदगी बिताऊँगी यहाँ…सब कहते हैं यही तुम्हारा असली घर है…यहाँ के लोग ही तुम्हारे अपने हैं…क्या ऐसा होता है अपना घर…जहाँ अपनापन ही न हो, जहाँ दम घुटता हो…बिना किसी दोष के सुनना पड़ता हो!”
बेचारी स्तुति जिस संयुक्त परिवार से आयी थी, वहाँ न घूँघट प्रथा थी और न ही पुरानी रूढ़ियों वाले कोई बेकार के बन्धन। वह खुले विचारों वाली, बड़े चंचल स्वभाव की थी, जिंदगी को हर पल भरपूर जीने वाली।  जहाँ भी वह रहती थी, कोई गुमसुम या उदास नहीं रह सकता था। बचपन से घर का माहौल हल्का-फुल्का ही देखा था जहाँ आपसी प्रेम और आत्मीयता थी, एक-दूसरे के लिए लगाव और परवाह था। अनुशासन और नियम भी थे लेकिन इनके पालन के नाम पर किसी पर भी जबरन का दबाव या व्यर्थ का बन्धन नहीं था। स्तुति अपने ताऊजी की दो बहुओं और एक अपनी भाभी के संग दिन भर हँसी-मज़ाक करती हुई ताई जी और माँ के कामों में हाथ बँटाती रहती थी। घर-गृहस्थी के ढेरों ऐसे काम जिनके लिए बाहर जाना पड़ता हो, वह अपनी भाभियों में से किसी भी एक को लेकर इतने आराम से निबटाया करती थी कि घर के पुरुषों को पता ही नहीं चलता था कि बिल भरने से लेकर राशन लाना या फिर कोई घरेलू उपयोग की चीज बिगड़ जाये तो सुधरवाना क्या होता है। केवल आर्थिक उपार्जन और परिवार को हर तरह से भावनात्मक सुरक्षा, यही सब उनके जिम्मे था। घर की स्त्रियों व बच्चों को सिर-माथे पर रखने वाली परम्परा के वाहक थे वे पीढ़ियों से।
ऐसे स्वतंत्र वातावरण में पली-बढ़ी स्तुति को ससुराल आने के बाद जैसे ही पता चला, उसे साँस भी सासू माँ से पूछ कर लेना होगा, उसकी साँस उसी समय से अटकने लगी थी।





अगले दिन जब घर पर उसकी मुँह-दिखाई की रस्म रखी गयी, उसे पड़ोस की महिलाओं की बातचीत से पता चला कि उसे हर समय साड़ी में ही रहना होगा, जिसका पल्लू सिर से न सरके। बेवजह बोलना नहीं है, तेज आवाज़ में ठहाके लगा कर हँसना फूहड़ता की निशानी है जो यहाँ बर्दाश्त नहीं की जाएगी…और तो और ससुर और जेठ के सामने भी नहीं पड़ना है बल्कि पूरी तरह से पर्दा करना है, वह बिल्कुल हैरान-परेशान हो गयी थी।
शुरू-शुरू में उससे बार-बार गलतियाँ हो जातीं और उसे सासू माँ के कोप का भाजन बनना पड़ता। साड़ी पहन कर काम करना उसके लिए संसार के सबसे कठिन कामों में से एक था, अतः वह सलवार कमीज पहन कर सिर पर दुपट्टा लपेट लेती। अनुराधा जी को यह भी बहुत नागवार गुजरता। सिर से पल्ला हटते ही वे उसे तुरन्त टोकतीं। एक ही घर में साथ रहते घर के कुछ लोगों से बात न करने, उनके सामने न पड़ने को टोका जाना बहुत दिनों तक स्तुति  को बड़ा असहज लगता रहा। किसी तरह वह घर के माहौल और रीति-रिवाजों के अनुसार ख़ुद को ढालने की कोशिश कर भी रही थी, मगर सास का तानाशाही रवैया उससे सहन नहीं हो रहा था। थोड़े समय में ही ऐसे घुटन भरे माहौल के कारण उसे अपनी नयी-नवेली शादीशुदा जिंदगी बोझ लगने लगी थी।
स्तुति की जेठानी धरा बहुत शान्त स्वभाव की थी, अगर सास दिन को रात कह दें, तब भी कभी बहस न कर तुरन्त हाँ में सिर हिलाती। उससे सास बेहद ख़ुश रहतीं। शेष लोगों के मनोभाव, स्वभाव व व्यवहार स्तुति अभी तक कुछ नहीं जान पायी थी, क्योंकि सासूमाँ के अनुशासन और नियमों की दीवार बीच में थी, किसी से बातचीत ही नहीं होती थी।
अब तक ऐसे ही समय बीत रहा था और जिंदगी की गाड़ी किसी तरह घिसटते हुए चल चल रही थी मगर आज के इस अकारण अपमान से स्तुति का दिल टूट गया। इससे पहले अपने पति सिद्धांत से वह कई बार इन मुद्दों पर बात करने की कोशिश करके देख चुकी थी। हर बार उसका लगभग एक ही जवाब होता था, ____”मैं तो क्या, पापा और भइया भी इस मामले में कुछ नहीं कर सकते…क्यों घर का शान्त माहौल बिगाड़ने पर तुली हो डियर…भाभी को देख कर कुछ सबक लो न, किस बात की कमी है तुम्हें!”





मन ही मन पक्का निश्चय करके स्तुति ने अलमारी खोली, एक ट्रॉली बैग निकाल कर अपने कुछ कपड़े, कागज़ात और जरूरी सामान रख कर पैक करने लगी।
____”बस और नहीं घुट-घुट कर मरना है यहाँ…मायके बात करूँगी तो कोई भी नहीं समझेगा, सब मुझे ही समझदारी दिखाने को बोलेंगे। पहले तो इस जेल से निकल कर वहाँ घर पहुँचती हूँ पहले…फिर सोचूँगी कि आगे क्या करना है। इतनी तो पढ़ी-लिखी और लायक हूँ ही कि अपना बोझ आराम से उठा सकती हूँ, वो भी सम्मान के साथ!”
इससे पहले कि वह घर के पिछले गेट से निकल कर पीछे वाली सड़क पर टैक्सी रुकवा पाती, कन्धे पर टँगे हैंडबैग में रखा उसका मोबाइल फोन बज उठा। एक बार के लिए तो उसका मन हुआ कि पहले स्टेशन पहुँच जाये, तब ही किसी का फोन उठाये लेकिन जब फोन बार-बार, लगातार बजता ही रहा, हार कर उसने कौन इतनी शिद्दत से कॉल कर रहा है, देख लेना मुनासिब समझा।
देखा तो सिद्धांत की कॉल थी। वह दुविधा में पड़ गयी। पहले टैक्सी पकड़े कि कॉल उठाये। तभी कॉल फिर से आ गयी। पता नहीं क्यों इस बार उसे किसी अनहोनी की आशंका होने लगी अतः उसने धड़कते दिल से कॉल रिसीव कर लिया।
दूसरी तरफ सिद्धांत बेहद घबराया हुआ था, बदहवासी में उससे ठीक से बोला भी नहीं जा रहा था, ऊपर से जहाँ से वह फोन कर रहा था, पता नहीं नेटवर्क की कोई समस्या थी या कुछ और, आवाज़ कट-कट कर आ रही थी। पूरा ध्यान लगा कर स्तुति सुनने-समझने की कोशिश कर रही थी…और जैसे ही उसे बात समझ में आयी, क्षण भर के लिए वह मूर्ति बनी खड़ी रह गयी…फिर ट्रॉली बैग वहीं पटक कर भागती हुई वापस घर में घुसी। वह चिल्लाती जा रही थी,
____”मम्मीजी…पापाजी…धरा दीदी….जल्दी आइए मम्मीजीsss…सुनिए पापाजीsss…कहाँ हैं आप लोग मम्मीजी….!”
वास्तव में फोन पर सिद्धांत ने किसी तरह स्तुति को बताया था कि बड़े भइया सुदर्शन को हार्टअटैक आ गया है और वे दूर कहीं रास्ते में गिर कर पड़े हुए हैं।
छोटी बहू की ऐसी चीख-पुकार सुनते ही अनुराधा देवी के साथ ही ससुर भुवन जी और जेठानी धरा भागे चले आये। और बात समझते ही सबके पाँवों तले से ज़मीन खिसक गयी, जान हलक में आकर अटक गयी। अब क्या होगा…धरा ने तो रोना ही शुरू कर दिया।





___”कुछ कीजिए न मम्मीजी, पापाजी…इनको कुछ भी हुआ तो मैं भी जिन्दा नहीं बचूँगी मम्मीजी…कुछ करो न छोटी…सिद्धांत भइया को फोन करो ना जल्दी..!”
घर का बड़ा बेटा सुदर्शन यानी सिद्धांत का बड़ा भाई आज पुश्तैनी गाँव के लिए निकला हुआ था। हमेशा की तरह अपने फार्महाउस के बहुत सारे कामों को देखने के लिए। 38 वर्षीय सुदर्शन न केवल पूर्ण रूप से स्वस्थ था, बल्कि आज सुबह जब वह घर से चला था, तब तक कोई भी परेशानी नहीं थी उसे। शहर वाले घर से फार्महाउस वाला गाँव 40-45 किलोमीटर ही था। पूरा परिवार कभी-कभार जाता रहता था और घर के सभी पुरुष तो अक्सर ही आना-जाना करते रहते थे।
अभी सिद्धांत ने जो बताया उसके अनुसार सुदर्शन फॉर्म-हाउस के खेतों का सारा काम व जरूरी हिसाब-किताब देखकर बाइक द्वारा हमेशा की तरह आराम से वापस लौट रहा था कि उसे एकाएक बेचैनी लगने लगी, दम घुटता सा लगने लगा। उसने सुनसान पड़ी सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे बाइक रोक कर जब मोबाइल फोन से कॉल करके सिद्धांत को किसी तरह अपनी हालत बताई तो उसने मामले की गम्भीरता भाँपते ही भइया से अपना गूगल लोकेशन भेजने को कहा। सुदर्शन बड़ी मुश्किल से अपने होश सँभालते हुए वैसा करने में सफल तो हो गया था मगर अब उसकी हालत पल-पल बिगड़ती जा रही थी। बहुत तकलीफ के साथ अटक-अटक कर उसने कहा कि अब मेरे होश गुम हो रहे हैं और मैं यहाँ सड़क के किनारे कच्ची ज़मीन पर लेट गया हूँ। सुनते ही छोटे भाई का कलेजा मुँह को आ गया।
सिद्धांत की नौकरी हाउस डेवलपिंग के बड़े कॉन्ट्रैक्टर के ऑफिस में थी, जहाँ से कभी भी लोकेशन या साइट देखने कर्मचारियों को पचास-सौ किलोमीटर तक भी जाना पड़ता था। उस दिन भी वह अपने बॉस के साथ दूर किसी जगह पर फँसा हुआ था जब भइया सुदर्शन का कॉल उसके पास आया। बॉस को जैसे ही उसने सब कुछ बताया, उन्होंने तत्काल अपनी गाड़ी वापस शहर की ओर मोड़ ली मगर फिर भी घण्टे भर से पहले वे उस जगह पर पहुँच नहीं सकते थे। रास्ते में जैसे ही सिद्धान्त के दिमाग़ ने थोड़ा काम किया, उसने तत्काल स्तुति को फोन लगाया था और घबराहट के कारण हकलाते हुई किसी तरह से सारी बात बतायी थी।





अभी जबकि घर में कोहराम-सा मच चुका था, स्तुति ने धीरज धरते हुए ख़ुद को सँभाला फिर उसने सिद्धांत को हिम्मत बँधाते हुए भइया की गूगल लोकेशन ट्रेस करके अपने मोबाइल पर तत्काल भेजने को कहा।
घर में सुदर्शन की कार खड़ी थी लेकिन ससुरजी को चार-पहिया चलानी नहीं आती थी। वे ख़बर सुन कर स्थिति की गम्भीरता का अंदाज़ा लगते ही बदहवासी में अपना स्कूटर निकालने को भागे। स्तुति ने बिजली की फुर्ती से एक थैले में पानी की बोतल, कुछ दवाइयाँ व कुछ ज़रूरी सामानों को रखा और कार की चाबी उठा कर तेजी से पोर्च में खड़ी कार की ओर भागी। आनन-फानन में गाड़ी स्टार्ट करके चिल्लाते हुए उसने ससुर जी को आवाज़ लगायी,
____”पापाजी, जल्दी से स्कूटर छोड़ इधर आइए, बैठिए गाड़ी में…जल्दी कीजिए, समय बहुत कम है!”
ड्राइविंग सीट पर बैठकर स्टेयरिंग संभालते हुए उसने कार के सामने का उनके साइड वाला गेट खोल दिया था।
जब तक सुदर्शन की लोकेशन ट्रेस करके दोनों वहाँ पर पहुँचे, तब तक वह बेहोश हो चुका था। उसे ऐसे निःचेष्ट पड़े हुए देख कर भुवन जी को काठ मार गया। ____”ओह्ह, सब कुछ ख़त्म…हाय मेरा बेटा!”
वे भी तुरन्त वहीं ज़मीन पर गिर पड़े। बेहोश बेटे को पकड़ कर कलपने लगे।
जबकि स्तुति ने जैसे ही अपने जेठ की हालत देखी, थोड़ी जाँच-पड़ताल के बाद वह समझ गयी कि भइया को हार्ट-अटैक आया है। बिना समय गँवाये उसने भुवन जी को सहारा देकर एक तरफ बिठाया फिर सुदर्शन के बगल में बैठ कर उसे सीपीआर देने लगी जिसके लिए वह अपनी कॉलेज लाइफ से पूर्ण प्रशिक्षित थी। कुछ देर तक लगातार कई बार सुदर्शन की छाती को दबाने के बाद उसने अपनी चुनरी का एक छोर उसके मुँह पर रख दो-तीन बार अपने मुँह से फूँक मार कर उसे कृत्रिम साँस दी। फिर थोड़ी देर तक सीने को पसलियों के ऊपर बार-बार दबाया और फिर से कृत्रिम साँस दी। आठ-दस बार ऐसा लगातार दोहराते ही सुदर्शन की रुकी हुई साँस लौट आयी। तुरन्त ही उसने ससुर जी की सहायता से उसे उठाकर बिठाया और साथ लाया हुआ पानी घूँट-घूँट कर पिलाया। सुदर्शन का सिर सहलाते हुए वह कहती जा रही थी,
____”सब कुछ ठीक हो जाएगा भइया…बिल्कुल नहीं घबराना है आपको…हम हैं न आपके साथ…सँभालिए अपने-आपको!”
सुदर्शन की हालत जरा सँभलते ही उसे कार की पिछली सीट पर ससुर जी की गोद में सिर रख कर लिटाने के बाद उसने फिर से ड्राइविंग सीट सँभाल ली।





स्तुति ने पूरी तत्परता से न सिर्फ अपने जेठ को सही समय पर अस्पताल पहुँचाया बल्कि वहाँ के लापरवाह स्टाफ से लड़-भिड़ कर उन्हें तत्काल एडमिट भी करवाया। वहाँ उपस्थित अस्पताल के छोटे कर्मचारी जब आदत से मजबूर आनाकानी कर रहे थे, स्तुति दनदनाती हुई मुख्य चिकित्सक के ऑफिस में घुस गयी। उसने जब अपने अधिकार और उनके कर्तव्यों का कानूनी पहलू पुरज़ोर तरीक़े से समझा कर धमकाया, सारा स्टाफ जो ऐसे इमरजेंसी के मौकों पर बीमार के घरवालों की मज़बूरी और डर का फ़ायदा उठा मोटी रकम ऐंठने के फिराक में रहते थे, अपनी नौकरी बिगड़ने के भय से काँप उठे। पाँच मिनट के अन्दर सुदर्शन को आईसीयू में भर्ती करके उसका इलाज शुरू कर दिया गया। यह भी एक बहुत अच्छी बात हुई थी कि उसके साथ वहाँ पहले से पहुँचे दो अन्य परिवारों को भी लाभ हो गया था जो दुर्घटना में गम्भीर रूप से घायल अपने परिजनों को एडमिट कर लेने की देर से गुहार लगा रहे थे।
सुदर्शन जब पूर्ण स्वास्थ्य-लाभ कर अस्पताल से घर लौटा, सासू माँ और ससुर जी की सोच छोटी बहूरानी के प्रति एकदम बदल चुकी थी। सास अनुराधा जी तो अपनी पुरातनपंथी पूर्व व्यवहार पर इतनी शर्मिन्दा थीं कि स्तुति के सामने निगाहें नहीं उठा पा रही थीं।
एक हफ़्ते बाद ही पड़े सुदर्शन के जन्मदिन पर घर में दोहरी खुशी मनाने के लिए एक छोटा सा आयोजन किया गया। हर बार की तरह अपने बड़े बेटे सुदर्शन को हँसते-खिलखिलाते हुए अपने पिता और नन्हें बेटे टुकटुक के हाथों अपने जन्मदिन का केक कटवाते देख कर अनुराधा जी की आँखें हर्षातिरेक में छलक उठीं। स्तुति बहू नहीं होती तो आज शायद घर में मातम पसरा होता, हँसने के बजाए सब रो रहे होते। यह विचार मन में आते ही माँ के ममतामयी हृदय में भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा। उनकी आँखें छोटी बहू को इधर-उधर ढूँढ़ने लगीं। देखा तो वह बड़ी बहू धरा के पीछे खड़ी ‘हैप्पी बर्थडे टू यू’ गाती हुई रिश्तेदारों और पास-पड़ोस के बच्चों के साथ तालियाँ बजा रही थी। सिर पर लिया हुआ दुपट्टा सरक कर कन्धों पर पड़ा हुआ था जिसे देख कर आज सासू माँ को तनिक भी गुस्सा नहीं आया। तभी अचानक स्तुति की नज़र उनकी ओर पड़ गयी। उन्हें अपलक अपनी ओर देखते पा कर बेचारी घबराती हुई दुपट्टा माथे पर खींच कर सिर ढँकने का प्रयास करने लगी।
अनुराधा जी अब अपने-आप को रोक नहीं सकीं। अपना सारा अहम, सारा संकोच परे रखते हुए वे बहू स्तुति के पास पहुँच उन्हें माफ़ कर देने की चिरौरी करने लगीं, तो स्तुति ने हड़बड़ाते हुए उनके जुड़े हुए हाथ थाम लिये। सासू माँ की आँखों से बहते आँसुओं को देख वह भी भावुक हो उठी। एकाएक भावनाओं का बाँध टूटते ही वह लपक कर उनके गले लग गयी।
____”ऐसे माफ़ी माँग कर मुझे पाप का भागी मत बनाइए मम्मीजी!…माँगिए मत, बल्कि कुछ दीजिए मुझे ईनाम में, अगर ख़ुश हैं मुझसे तो..!”





____”तुमने तो मेरा बड़ा बेटा मौत के मुँह से वापस छीन कर मुझे लौटाया है बहू, बोलो क्या दूँ तुम्हें इसके बदले में?…वैसे तो कोई भी चीज इसकी बराबरी नहीं कर सकती पर तुम्हें क्या चाहिए, बताओ…मैं भरसक देने की कोशिश करूँगी!”
अपने गले से सोने की लम्बी, भारी-सी चेन उतार कर स्तुति को पहनाती हुई वे बोल रही थीं।
____”यह नहीं चाहिए मम्मीजी! …इतने छोटे ईनाम से मैं नहीं सलटने वाली…यह चेन तो धरा दीदी को बहुत पसन्द है, उन्हें ही मिलनी चाहिए…मुझे तो आपसे कुछ और चाहिए!”
अपने गले से वह चेन उतार कर जेठानी को पहनाती हुई स्तुति कह रही थी।
____”बोलो न मेरी बहूरानी, क्या चाहिए तुम्हें…जो मेरे बस में हुआ, देने में पल भर देर न करूँगी।”
सासू माँ भी लाड़ भरे स्वर में बोल उठीं।
____”बस मम्मीजी! परम्पराओं और रीति-रिवाजों के बन्धन थोड़े ढीले कर दीजिए। आप अगर मेरी माँ हैं इस घर में…तो पापाजी भी तो मेरे पिता की जगह हैं और जेठजी भी बड़े भाई की जगह…फिर इनसे घूँघट करके चेहरा छुपा कर रखना…सामने न पड़ना। घर में आपस में हँस-बोल न सकना तो और भी घुटन भरा लगता है। ऐसा लगता है जैसे घर की सारी खिड़कियाँ, सारे रौशनदान बन्द हैं, ताज़ी हवा और धूप घर तक नहीं आ रहीं। ज्यादा कुछ नहीं चाहती मैं…बस अपना यह घर-परिवार, इसमें दूध में चीनी की तरह ठीक वैसे ही घुल जाना चाहती हूँ, जैसे मेरे मायके में मेरी तीनों भाभियाँ घुलमिल गयी हैं। चाहे मेरी शादी से पहले हो या अब, जब मैं वहाँ होती हूँ न, घर में हमें देख कर कोई बाहर वाला अनुमान नहीं लगा पाता कि बेटी कौन है और बहू कौन!”
हमेशा चुप रह कर सब कुछ सहने वाली धरा भी अब देवरानी के साथ खड़ी थी। हाथ जोड़ कर वह भी बरसती आँखों से शायद यही माँग रही थी।
वहाँ उपस्थित सारे लोग अनुराधा जी को देख रहे थे कि वे क्या फैसला करने वाली हैं।
नम आँखों के साथ अनुराधा जी एकदम से मुस्कुरा उठीं। आगे बढ़ कर सबके सामने दोनों बहुओं को आलिंगन में भर कर उन्होंने यह घोषणा कर दी,
____”जिस बात में मेरी बहुएँ ख़ुश, मेरा परिवार राज़ी, वही मेरा भी निर्णय। माना कि बहुत देर कर दी मैंने, खिड़की दरवाज़े खोल कर ख़ुशियों को अपने घर आने का न्यौता देने में…लेकिन सुबह का भुला अगर शाम से पहले घर लौट आये, उसे भूला नहीं कहते न!”
#बहू
(स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित)
नीलम सौरभ
रायपुर, छत्तीसगढ़

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