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स्वाभिमान अपना अपना – सुभद्रा प्रसाद

  “शादी की सालगिरह मुबारक हो, भैया- भाभी |” नैना ने अपना उपहार देते हुए चहक कर कहा |

         “ओ नैना, तुम यहाँ, कैसे? ” उसके भैया रवि ने पूछा |

         “रंजन की बदली इसी शहर में हो गई है |हम दो महीने पहले ही यहाँ आये हैं |आज आपकी शादी की सालगिरह पर अचानक आकर आपलोगों को सरप्राइज देना चाहती थी |” नैना खुशी से बोली |

            “हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी ” रवि ने उपहार लेने के लिए हाथ बढाया ही था कि एक आवाज आई और नैना ने देखा, सामने उसके दूर के रिश्ते की बहन पूजा खडी़ थी |

              “पूजा, तुम |” भाभी उसकी तरफ मुडी और उसके दिये उपहार को थाम लिया |नैना का हाथ उपहार देने को आगे बढा रह गया |भैया- भाभी पूजा और उसके पति से बातें करने में व्यस्त हो गये |नैना ने अपना उपहार टेबल पर रख दिया और कुर्सी पर बैठ गई |वह प्रतिक्षा करने लगी कि भैया- भाभी उसके पास आयें और उससे बातें करें |

       बैठे- बैठे उसका मन अतीत की गलियों में भटकने लगा |माता-पिता, भैया और वह बस ये चार व्यक्ति थे परिवार में |पिता जी एक साधारण सी नौकरी करते थे |रवि की पढ़ाई में बाधा न आये, इसीलिए पिता  जी ने नैना की शादी, उसे हाईस्कूल तक पढ़ाकर एक साधारण परिवार में एक साधारण लड़के से कर दिया |वह सामान्य ढंग से अपना जीवन जीने लगी |रवि पढ़ लिख कर एक अच्छी कंपनी में उंचे पद पर कार्यरत हो गया और उसका विवाह भी एक संपन्न परिवार में हो गया |रवि के जीवन में उसकी पत्नी और ससुराल वालों का प्रभाव बढ़ता गया और माता, पिता और बहन का प्रभाव कम होता गया |जब उसने अपने माता, पिता को ही उचित मान-सम्मान, व्यवहार न दिया तो बहन को क्या देता ? उसे भैया- भाभी अपने स्तर का समझते  भी नहीं थे |उन्हें अपनी संपन्नता का बहुत अभिमान  हो गया था |माता पिता चल बसे और रवि का संपर्क नैना से कम होता गया |उचित व्यवहार और मान-सम्मान न मिलने के कारण नैना ने भी आना बहुत कम कर दिया था |नैना के पति एक छोटी सी सरकारी नौकरी करते थे और दो महीने पहले उसका तबादला इस शहर में हुआ था | पिछले दो साल से वह भैया- भाभी से मिली नहीं थी |




आज भैया- भाभी की शादी की सालगिरह होने के कारण ,नैना  पुरानी सारी बातें भूलकर आ गई थी | पति और बेटा शहर से बाहर गये थे, इसीलिए वह अकेली ही आई थी |वह उनसे मिलने और बातें करने के लिए थोड़ा उत्साहित भी थी , परन्तु दोनों में से किसी का भी ध्यान उसकी तरफ था ही नहीं |                                                     भैया और भाभी की हंसी ने उसका ध्यान खींचा  तो उसने देखा कि दोनों पूजा उसके पति और अन्य लोगों से बातें करने और उनकी आवभगत में ही व्यस्त थे | पार्टी  शानदार थी और लोग खाने   का आनन्द ले रहे थे  | वह अन्य लोगों से बात करने लगी |

            पूजा उनके दूर के रिश्ते की बहन थी और इसी शहर में एक बडे बिजनेसमैन से व्याही गई थी |पूजा न तो कभी उसके माता पिता से मिलने आती थी और न हीं नैना से उसका संपर्क था, पर भैया से इतना घनिष्ठ संबंध  ? 

           “एक घंटे से वह बैठी है,पर भैया भाभी को फुर्सत ही नहीं उससे बात करने की | अच्छा हुआ, वह  अकेली ही आई  |पैसा हो तो पराये भी अपने हो  जाते हैं और न हो तो अपने भी पराये हो जाते हैं |” सोचते हुए नैना ने एक गहरी सांस ली |” रिश्ते पराये हो जाये,पर स्वाभिमान तो सबका अपना अपना होता है |अब जब भैया – भाभी बुलायेंगें, तभी वह आयेगी  |”नैना एक झटके से उठी और बाहर आ गई |न किसी ने उसे खाने को कहा, न उसने खाना खाया |

                                                          # स्वाभिमान

     स्वरचित

     सुभद्रा प्रसाद

     पलामू, झारखंड  |    

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