रिक्त स्थान (भाग 22) – गरिमा जैन

जितेंद्र अच्छे से जानता था कि नैना को उसके बिल से कैसे बाहर निकालना है!! आज उसका गुस्सा चरम सीमा पर था!! सारे झरना देखने जाते तो हैं लेकिन जितेंद्र वहां पूरे समय खोया खोया रहता है और रेखा की निगाहें सिर्फ जितेंद्र पर थी । जब भी जितेंद्र दुखी होता, उदास होता ,तो रेखा के चेहरे का नूर भी चला जाता ।उदासी के बादल रेखा पर मंडरा रहे थे और यह बात रूपा बखूबी देख रही थी। वह रेखा से कई एक बार पूछती है लेकिन रेखा उसका कोई जवाब नहीं दे पाती।

अनमने मन से जितेंद्र और रेखा वापस रिजॉर्ट लौट आते हैं। सारे रात में इकट्ठा खाना खा रहे थे लेकिन जितेंद्र का मन आज भटक रहा था । खाना खाकर वह तुरंत बाहर निकल जाता है। रेखा जब थोड़ी देर बाद बाहर जाती है तो देखती है कि जितेंद्र किसी से फोन पर बात कर रहा है ।जितेंद्र को इतने गुस्से में रेखा ने कभी नहीं देखा था ।वह  किसी से बहुत जोर जोर से बात कर रहा था और जैसे उन्हें डांट रहा था

“सब आपकी ही गलती है अंकल ,आप ने ही नैना को इस हद तक बिगाड़ दिया कि आज वह लोगों की जान लेती फिर रही है। मैं सिर्फ आपकी वजह से आज तक चुप था नहीं तो नैना तो कब की जेल की सलाखों के पीछे होती। सिर्फ आपकी और पापा की दोस्ती के कारण चुप हूं लेकिन अंकल अब मैं चुप नहीं रहूंगा ।अगर आप कोई ठोस कदम नहीं उठाते ,नैना को सीधी राह पर नहीं लाते तो आप फिर मुझसे कोई उम्मीद मत रखिएगा ।मैं यह भूल जाऊंगा कि आप और पापा भाइयों के समान है। मैं यह भूल जाऊंगा कि मुसीबत के समय में आपने हमारी कितनी मदद की थी क्योंकि अब बात मेरे परिवार पर आ गई है ।मेरी जिंदगी नैना ने बिखेर  दी है ।पहले मेरा तलाक हुआ और अब जब मैं अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा हूं तो वह मुझे जान से मारने की धमकी दे रही है ।”

जितेंद्र काफी देर के लिए खामोश हो जाता है। फोन में उस तरफ नैना के पिता थे ।वह जितेंद्र से बहुत सी बातें करते हैं और शायद उसे सांत्वना भी देते हैं कि वह जल्द से जल्द कोई ठोस कदम उठाएंगे ।रेखा चुपचाप खड़ी रहती है ।जितेंद्र फोन काट देता है और बहुत देर तक  ऊपर आकाश के तारे देखता रहता है ।रेखा समझ नहीं पा रही थी कि जितेंद्र को फिर से खुश कैसे देखें? वह क्या बात करें जिससे उसका मन अच्छा हो जाए !!

तभी रेखा कहती है “पता है जितेंद्र “

जितेंद्र चौंक जाता है वह नहीं जानता था कि रेखा पीछे खड़ी है !!

रेखा फिर कहती है “पता है जितेंद्र जब बचपन में हम नानी के घर जाते थे तब हम सारे छत पर सोते थे। मामा मौसी के बच्चे, हम सारे सफेद चादर पर जब लेट के आकाश देखते थे तो आकाश ऐसे ही तारों से भरा दिखता था ।आज बिल्कुल मुझे वह रात याद आ गई ।फिर मामा हमें खूब डरावनी कहानियां सुनाते जिन्हें हम सच मान जाते और रात भर खूब डरते ।कितने भोले थे हम ,सब की बातों को सच मान लेते थे।

जितेंद्र फीकी हंसी हंसता है ,फिर वह कहता है” पता है रेखा बचपन में मैं भी नानी के घर जाता था। बड़ी मीठी यादें हैं। हमारी नानी का घर पहाड़ों में था ।जब भी हम वहां जाते सुबह सुबह खूब अच्छा नाश्ता बनता था । पूरी,आलू की सब्जी, मूली के पराठे ,आलू के पराठे,खीर ,पुडिंग।। फिर हम सब वह खाना पैक करके अक्सर घूमने निकल जाते। खाते-पीते दोपहर में खूब धूप सेकते ।शाम को 4:00 बजे से ही जैसे लगता शाम ढल गई है। रामू काका बाहर आग जलाते ।उसमें हम सारे पनीर भूनकर खाते थे। बहुत अच्छे दिन थे । सच रेखा तुमने बचपन की याद दिला दी। कितने सुहावने थे ।काश वो दिन फिर से लौट आए , वो बचपन फिर से लौट आता जब मैं अपने पिता से चिपककर सोता था ,सुबह उनका चेहरा देखता था ।

रेखा कहती है ” तो क्या तुम अपने पिताजी के साथ अब नहीं सो सकते? अब तुम बहुत बड़े हो गए हो ?

जितेंद्र कहता है “बड़ा तो नहीं हुआ लेकिन हमारे विचारों में कई बार बहुत मतभेद  हो जाते हैं ,कई बार व्यापार को लेकर कई बार ज्याति जिंदगी को लेकर ।

रेखा हौले से जितेंद्र का हाथ पकड़ती है और कहती है क्या कभी मुझसे मतभेद होगा तो मुझसे भी अलग हो जाओगे?

जितेंद्र  रेखा की गहरी आंखों में देखने लगता है और कहता है “ऐसी बात दोबारा मत कहना रेखा”

रेखा फिर उससे कहती है “तो क्या तुम अब अपने पापा से प्रेम नहीं करते ?

जितेंद्र कहता है “करता तो हूं लेकिन अनजानी दीवार कई बार हम लोग के बीच खड़ी रहती है “

रेखा कहती है “तो उस दीवार को तोड़ दो जितेंद्र और जाकर अपने पिता को गले से लगा लो ।तुम वैसे ही बचपन को फिर से याद कर सकते हो जो बचपन तुम नानी के घर में जीते थे। जो बचपन तुम बहुत साल पीछे छोड़ आए हो। कभी भी अपने अंदर के बच्चे को मरने मत दो ,उसे हमेशा जिंदा रखो तभी तो जिंदगी में तुम खुश रह पाओगे ।”

जितेन हौले से रेखा का हाथ पकड़ता है और दोनों धीरे-धीरे चहल कदमी करते हुए रिजॉर्ट के घर में वापस आ जाते है

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