” पाखी ”  – डॉ. अनुपमा श्रीवास्तवा

सुबह- सुबह एक हाथ में चाय की प्याली और दूसरे हाथ में पानी का ग्लास लिए चाची कमरे में घुसी और जोर -जोर से बोलने लगी, अजी सुनते हैं जल्दी उठिए  पेपर में रमाकांत जी की बेटी का नाम छपा है ।  पूरे जिले में टॉप आई है। नाम रौशन कर दिया माँ- बाप का और साथ में पूरे जिले का। मानना पड़ेगा उनकी बेटी को लड़कों को भी पछाड़ दिया।

चाचा जी अनमने से उठ कर बैठ गए। चाची के हाथ से पानी का ग्लास लेते हुए बोले,-” अरे भाई,

बेटियों को बहुत पढ़ा -लिखा देने से उसे नौकरी पर लगवा देने से  और बार-बार मेरा बेटा, मेरा बेटा कहते रहने से उन्हें थोड़े न कोई बेटा कहने लगेगा !

रमाकांत जी भूल भ्रम में पड़े हुए हैं। बेटी तो बेटी ही रहती है। जब शादी करना  पड़ेगा  तब समझ में  आएगा।  कर्ज ले लेकर पढ़ाई करवा रहे हैं। बेटियों का बोझ सब से अधिक होता है ।ऐसे ही कहावत नहीं बना है कि जब बेटी का जन्म होता है तो  बोझ से एक हाथ धरती भी धंस जाती है। चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात! जल्दी ही पेपर का नशा उतर जायेगा। फिर हाथ पसारने आ जाएंगे कर्ज के लिए।

चाची बोली,-“अच्छा रहने भी दीजिये अपने दोस्त के लिए इतनी कटुता अच्छी नहीं है ।कुछ भी हो औलाद तो औलाद है चाहे जो रहे “। अपनी बेटियों को आगे बढ़ाने में वह कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। उनकी दोनों बेटियां भी काबिल है पढ़ाई लिखाई में। बहुत ही समझदार और संस्कारी।

तुम चुप  ही रहो समझी , सच पूछो तो वह मेरे बेटे का नकल उतारते हैं और कुछ नहीं । यहां तक तो  मांग चांग पढ़ा लिया  अब थोड़ा भेज कर देंखे बाहर पढ़ने के लिए आटा -दाल का भाव समझ में आ जायेगा,मामूली है क्या! हूँह!

चाची चुपचाप से ग्लास कप  समेटकर जाने को तैयार हुई तो चाचाजी ने टोका -“अब तुम मत चली जाना बधाई देने उनके घर पर। तुम भी तो औरत ही हो न पिघलने में समय कहां लगता है तुमको।”

 

चाची अपना सिर हाँ में हिलाते हुए  कमरे से बाहर निकल गई। वह सोच रही थी कि  बेकार ही लोग कहते फिरते हैं कि दुनियां में बदलाव हो रहा है। आदमियों का सोच तो जस का तस है। जो दूसरे की बेटी के लिए ऐसा सोच रहा है वह अपनी बेटी को कहां कुछ करने की इजाजत देगा भला! ना..! वह अब कभी नहीं बताएंगी की स्नेहा जूडो -कराटे सीखती है और इस बार उसे ब्लैक बेल्ट भी मिलने वाला है। माना कि बेटा पढ़ने लिखने में अव्वल है पर मेरी बेटी भी कम नहीं है भगवान करे वह और अधिक तरक्की करे।

स्नेहा ने जैसे ही फाइनल एग्जाम दिया चाचाजी के तरफ से उसके लिए लड़का ढूंढने का फरमान जारी कर दिया गया । रिश्तेदारों ने एक से एक खानदानी लड़कों का लिस्ट चाचाजी को दिया। दबे जबान चाची ने आग्रह किया कि स्नेहा और आगे पढ़ना चाहती है। इसपर चाचाजी का जवाब था कि जिंदगी भर पढ़ाई करेगी तो घर गृहस्थी कब सीखेगी। अब मेरा निर्णय नहीं बदलेगा।

चाची ने कहा-,”कम से कम एक बार बेटी देख लेती लड़के को तो अच्छा रहता।” चाचाजी की भृकुटी तन गई। क्या कहा  बेटी से इजाज़त लेने के लिए  मुझे सीख दे रही हो। तुम मुझे  देखने आई थी क्या?

मन मसोस कर चाची शादी की तैयारी में जुट गई।

लड़का पढ़ा लिखा अच्छे पद पर कार्यरत था। जोड़ी भी अच्छी थी। चाचाजी के नजर में खानदानी भी था था ।दहेज में क्या -क्या देना है सब कुछ तय हो चुका था पर सबको यही बताया गया था कि कोई डिमांड नहीं है लड़के वाले का ।उन्हें सिर्फ सुंदर और घरेलू लड़की चाहिए थी। जो भी दिया जा रहा है वह शौक से बेटी को दे रहे हैं।

देखते देखते शादी की तारीख भी आ गयी। मेहमानों से घर भर गया।  रमाकांत जी भी अपनी बेटियों के साथ शादी में शामिल होने आए थे। दोस्त होने के नाते वह भी बारातियों के स्वागत की तैयारियों में लगे हुए थे। उनकी बेटियां भी स्नेहा की तैयारियों में हाथ  बंटा रहीं थीं।

चाचाजी कहते नहीं अघा रहे थे कि उन्होंने अपनी बेटी के लिए सर्वगुण संपन्न लड़के को ढूँढा है और किसी के बस का नहीं है ऐसा रिश्ता ढूंढ़ लेना। वो जब भी य़ह बोलते उनका इशारा रमाकांत जी के तरफ ही रहता।चाची को डर लगा रहता कि कहीं उनकी बातों का बूरा नहीं न लग जाय वे तुरंत उन्हें किसी काम का बहाने  से बुला लेती थी।

 

पत्नी से ज्यादा पति के  विकृत विचार को  दूसरा कौन जान सकता है । बेचारी सशंकित थी कि किसी मेहमान को बूरा ना लग जाये चाचाजी की व्यंग्य वाण का। जिसमें उनको महारत हासिल था।

दरवाजे पर बरात आने का सभी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। एक घंटा बीता,दो घन्टा बीता ऐसे ही कई घंटे बीत गए। पता चला जनवासा से कुछ दोस्तों के साथ दूल्हा कहीं  गया है उसके आने पर ही बारात  दरवाजे पर जाएगी ।इंतजार करते करते आधे मेहमान वापस चले गए। लगभग बारह बजे रात को बारात  दरवाजे पर आई। जो लोग बचे थे स्वागत के लिए आगे बढ़े।

यह क्या ! दूल्हे ने चाचाजी के हाथ से माला छीनकर फेंक दिया। चाचाजी एक दम से घबड़ा गए।  पंडित जी  ने टोका तो  दूल्हे का दोस्त  उनसे  उलझ गया। चाची  दामाद जी का आरती उतारने आई तो उनके हाथ से आरती का थाल लेकर फुंक मारकर दीया बुझा दिया। वह अड़ गया कहने लगा कि यह  ढकोसला पुराना हो चुका है अब यह नहीं चलेगा आप दोनों मेरे पैर छूओ वर्ना शादी कैंसल!

चाचाजी को समझते देर नहीं लगी कि लड़का ड्रिंक लिए हुए है और अब जग हंसाई निश्चित ही होगी। काटो तो खून नहीं वाली स्थिति थी। चारो तरफ लोग अचंभित थे कि यह सब क्या हो रहा है।  महिलाएं  मूंह पर हाथ धरे तमाशा देख रही थीं। एक एक कर सब ने समझाने की कोशिश की लेकिन वह समझने के लिए तैयार ही नहीं था। चाची की आंखों से झर- झर आंसूं गिर रहे थे। मना किया था कि जल्दबाजी मत कीजिए बेटी है कोई गाय नहीं जो किसी भी खूँटे से बाँध दिया जाय।

जयमाला लिए स्टेज पर स्नेहा भौचक सी खड़ी थी ।कब से वह लड़के को पिता जी के साथ बदतमीजी करते देख रही थी। लेकिन कर ही क्या सकती थी अंदर ही अंदर उसका खून खौल रहा था। रमाकांत जी की बेटी बोली,”- चाचाजी ने कहां से ऐसा नमुना ढूँढा है तुम्हारे लिए स्नेहा! सुना था बड़ा संस्कारी है। ऐसे लड़के से शादी करने से तो बिना ब्याह के रहना ही ठीक है। काश! तुम्हारे जगह पर मैं होती तो इसको मजा चखा देती ।

दूल्हे का नजर जैसे ही स्नेहा पर पड़ा वह जोर से ठहाका लगा कर हंसने लगा।  ओ माई स्वीटी  चलो चलो तुम भी मेरे पास  चलकर आओ और मेरे जूतियों को अपने माथे से लगाओ चरण धूलि ले लो हा- हा- हा- हा……

अजीब माहौल बन गया था।  क्रोध से चाचाजी की आंखे लाल हो रही थी उन्होंने बेटी की ओर देखा शायद लाज रखने की गुहार लगा रहे थे । स्नेहा के पास कोई दूसरा उपाय नहीं था। वह धीरे-धीरे स्टेज से नीचे उतर कर दूल्हे के पास आई। उसे देखते ही दूल्हा अपनी हदें पार कर गया लपक कर आँचल पकड़ना चाहा….

तड़ाक…..!

तड़ाक…..!

अचानक जैसे बिजली गिरी हो। चारो तरफ सन्नाटा…

 

स्नेहा की आवाज गूँज उठी….क्या कहा था कि तेरे जूते को माथे लगाऊ…..तू  मेरी जूती  के लायक  भी नहीं है l नीच ,घटिया इंसान! अच्छा हुआ जो पहले ही तेरी असलियत मालूम चल गयी। भाग यहां से वर्ना….

लड़के के पिता दौड़कर चाचाजी के पास आए और गुस्से में बोले यही सिखाया है अपनी लाडली को  होने वाले पति पर हाथ उठा दिया। शर्म आनी चाहिए आपको ।

स्नेहा थर -थर कांप रही थी  अपने गुस्से और चाचाजी के डर से। पता नहीं वह क्या करेंगे?

चाचाजी ने अपने हाथों से दूल्हे के पिता के माथे पर से पगड़ी उतार कर नीचे फेंक दी  और बोले,-” शर्म मुझे नहीं आपको आनी चाहिए जो इतना बदमिजाज़ ,संस्कारहीन और बदतमीज औलाद पैदा किया है आपने। मुझे तो गर्व है अपनी बेटी और उसके संस्कार पर जिसने बाप की इच्छा का मान रख कर तैयार हो गई थी इस जानवर के साथ शादी के लिए।”

चाचाजी की आंखों से आग बरस रहा था  अपने को काबू में करते हुए बोले-,”जितनी जल्दी हो सके बारात के साथ अपने इस कपूत को यहां से दफा कीजिए वर्ना शायद आपको पता नहीं है ब्लैक बेल्ट होल्डर है हमारी बेटी समझ गए….या ठीक से समझा दूँ।

चाचाजी ने आंखें पोछते हुए स्नेहा को अपने सीने से लगा लिया और बोले…..   “आज से तू बेटी नहीं मेरा गर्व है बेटा ! मुझे माफ कर दे! अब कोई पिंजरा तुझे कैद नहीं कर सकता।”

आगे बढ़ कर उन्होंने रमाकांत जी की बेटियों के माथे को भी चूम लिया  और अपनी भर्राई आवाज़ में बोले-,” तुम जैसी बेटियों पर  हर पिता को फक्र है ! खूब उड़ो बेटा ! हमारी दुआ है सारा आसमान एक दिन तुम्हारे पंख में   समाहित होगा !!”

#बेटी_हमारा_स्वाभिमान

स्वरचित एवं मौलिक

डॉ. अनुपमा श्रीवास्तवा

मुजफ्फरपुर, बिहार

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