जादुई दुनिया… – विनोद सिन्हा “सुदामा”

वैसे तो हर इंसान का बचपन अपने आप में किसी जादुई कहानी से कम नहीं…बचपन की दुनिया किसी जादुई दुनिया से कम नहीं..

नर हो या मादा..आदमी हो या औरत.. शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति या इंसान हो जिसने अपने बचपन में दादा-दादी,नाना-नानी,या फिर अपने माता पिता के मुख बयां किस्से कहानियों में जादुई दुनिया का सफर न किया हो..

कभी राजा रानी तो कभी राजकुमार और राज कुमारी की कहानी..कभी सिंड्रेला और  बूढ़ी जादूगरनी तो कभी हातिमताई और शेख चिल्ली की कहानी..कभी चाँद तारों की शैर तो कभी..महलो की..जादुई छड़ी से लेकर जादुई चिराग तक..अलिफ लैला से लेकर..चंद्रकान्ता की प्रेम कहानी तक..न जाने कितने किस्से कहानियों से मन बहला …है सबका..

सभी इन कहानियों को सुनकर और जी कर ही बड़े हुए…

पर कहते हैं..इन सबमें..सबसे बड़ा जादुगर..सबसे अच्छी जादुगरी अगर कोई जानता या जिसके के पास अच्छी जादुगरी का हुनर है…दुनिया में वो दो ही है..या तो स्वयं ईश्वर या फिर एक पिता…

ईश्वर तो खैर ईश्वर है…

लेकिन पिता बच्चाें के लिए सदा से ही किसी जादुगर से कम नहीं रहा…

बेटा हो या बेटी बच्चाें के सपने पूरे करने के लिए एक पिता सदा अपनी क्षमता से अधिक प्रयास करता है..

वहीं बच्चों के मन में भी पिता की छवि किसी सुपरमैन, हीरो या जादूगर से कम नहीं होती

शायद ही कोई बच्चे ऐसे हों जिनकी फरमाईश किसी पिता ने न पूरी की हो…


मेरे लिए भी मेरे पिता किसी जादुगर से कम नहीं थे…

हालांकि बहुत लंबा साथ नहीं रहा..फिर भी जितने लम्हें जितनी जिंदगी साथ गुजरी..आज भी सब मधुर स्मृतियों में अंकित है..

बहुत ही रहस्यमयी व्यक्तित्व के मालिक थे मेरे पिता..शांत हँसता मुस्कुराता चेहरा.. मोहल्ले के सभी बच्चे हर शाम उनके ऑफिस से आने का इंतजार किया करते….वैसे कमाई बहुत नहीं थी लेकिन रोज़..उनके हांथ में कुछ न कुछ होता ही था…जिसे वो गली के मुहाने से जो भी बच्चा मिल जाता बाँटते हुए घर आते..कितनी दफा तो घर पहुँचे बिना ही खाने पीने की समाग्री खत्म हो जाती..माँ गुस्सा भी  करती..

पर उनपर कोई फर्क नहीं पड़ता…वो अपने धून में मस्त रहते…

आदतन वो ज्यादातर उजले मलमल का कुर्ता और पायजामा पहनते थे..इसलिए लखनवी नवाब कहते थे सभी ..उन्हें..

जब मैं बहुत छोटा था तो मुझे ये भी पता नहीं होता था कि कब मैने कोई सपना देखा कब मेरे सपने हकीकत में तब्दील हो  गए..

आज भी याद है मुझे..

बचपन की वो सारी बाते….वो छोटी छोटी चाहतें..वो फरमाईशें..जब मैं रात सोचता काश.मेरे पास भी ये खिलौने होते ऐसे कपड़े होते.. और बिना कहे सुबह  या फिर दोपहर..को वो चीज मेरे सामने होती थी..

पता नहीं कैसे  पापा को पता हो जाता था…

मुझे क्या जरूरत है…

मैं माँ से पूछता ….अरे माँ..ये कौन लाया…

माँ का बड़ा सरल जवाब होता…

मुझे नहीं पता…



फिर कैसे…??

सुना है इस शहर में जादूगरों की आत्मा भटकती है…

बिना कहे..बिना बोले…

वही बच्चों की हर माँग पूरी कर देता है…

पर उन्हें पता कैसे चलता है किस बच्चे ने क्या चाहा है..और किसे क्या चाहिए..

रोज़ दश्त पर निकलते हैं सभी..

दश्त..???

घूमते हैं..सब..

मेरी मंद बुद्धि…

मैं कहता तब तो मैं दादा जी को भी माँग लूँगा…

कम से कम बूढी दादी का मन बहला रहेगा..

बेकार वो सबको डाँटती फिरती है..



माँ हँस देती…

कहती वो सिर्फ़ खानेपीने.. एवं पढने लिखने कि चीजे देता है..कभी मन हुआ तो खिलौने..

गुजरे हुए इंसानों को वापस नहीं लाता…वो..

मैं मायूस हो जाता…

फिर सोचता मुझे क्या मुझे तो मिल ही जाता है..

क्रिसमस के दिन दिवाली के दिन..तो मैं सोता तक नहीं.. बस जादूगर का इंतजार करता रहता..

एक छोड़ चार चार पाँच पाँच मोजे टांग देता…

लेकिन नींद मुझे अपने आगोश में ले ही लेती और फिर सुबह उठकर देखता तो..

ढेर सारे  टॉफी.. कपड़े और खिलौने रखे मिलतें..

मै पागल…समझता कि सैंटा और अच्छे जादुगर ने लाकर दिया ये सब…बाद  पिता के जादू और उनकी जादुई दुनिया का एहसास मुझे तब हुआ जब मैं स्वयं पिता बना….अपनी नन्ही परी यानि मेरी छोटी सी बेटी..का पहला स्पर्श पाया मैने..

जब उसे पहली बार अपनी बाहों में लिया..

बस उस दिन से मैं भी अदृश्य जादुगर बन गया और प्रयास है कि बेटे बेटी की इच्छाएं और उनके सपनों को  पूरा करने में कोई कसर न बाकी रहने दूँ… ..

उनके सपनों की जादुई दुनिया में वो हर रंग भरूँ…जिनसे मेरे सपनों के कुछेक कोने खाली रह गए …

विनोद सिन्हा “सुदामा”

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