दोयम दर्जे की सोच (भाग 2)- आरती झा आद्या

थोड़ी देर में ही लड़कियों की भीड़ लग जाती है… हमारे पास मरने के अलावा रास्ता ही क्या है… रोज रोज नोचे जाने से तो अच्छा है.. एक बार में खुद को खत्म कर लो.. एक लड़की दूसरी से कहती है। रोज रोज नोचे जाने से क्या मतलब है इसका.. जैसे ही दिया ने उनसे पूछा.. वो दोनों लड़कियाँ उससे दूर हट कर खड़ी हो गई। 

दिया ये नहीं जानती थी कि किसी नई आई लड़की से अन्य लड़कियों को बात करने का आदेश तब तक नहीं था, जब तक वार्डन ना कहे अन्यथा सजा के रूप में यातना की हद तक चली जाती थी वार्डन। तभी बिना सायरन बजाती एक एम्बुलेंस और एक पुलिस गाड़ी गेट के अंदर आती है और तब दिया देखती है कि किसी के मृत शरीर को उठा कर एम्बुलेंस में रखा गया। एम्बुलेंस जिस तरह आई थी.. उसी तरह बिना सायरन बजाती चली गई। यहाँ क्या तमाशा लगा रखा है.. जाओ काम करो अपना सब वहाँ खड़ी लड़कियों की भीड़ को देख वार्डन चीखती है। सारी लड़कियाँ पल भर में अपने अपने काम में ऐसे लग गई.. जैसे वहाँ कुछ हुआ ही नहीं हो। 

वार्डन और इंस्पेक्टर को अपनी तरफ आते देख दिया खुद को सिकोड़ के एक तरफ हो गई। 

अरे आपका कोई क्या बिगाड़ सकेगा.. आपने तो बड़े बड़े राजनेताओं तक को खुश रखा हुआ है। आप तो बस हमें खुश रखो.. हम आप पर आँच भी नहीं आने देंगे.. वार्डन से कहता हुआ खींसे निपोरता इंस्पेक्टर एक निगाह दिया पर डाल कर आगे बढ़ गया। 

तभी वार्डन घूम कर कहती है.. ऐ लड़की यहाँ क्या कर रही है.. कमरे के अन्दर जा और जब तक मैं ना कहूँ.. कमरे से बाहर मत आना.. गुर्राती हुई वार्डन दिया से बोल इंस्पेक्टर के साथ आगे बढ़ गई। 

ये सब देख कर दिया की भूख प्यास सब मर चुकी थी… समझ चुकी थी कि यहाँ क्या खेल खेला जा रहा है। क्यूँ समाज ऐसा है.. क्यूँ हम लड़कियाँ सिर्फ खेलने की चीज़ हैं.. क्यूँ हम लड़कियों को सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन का साधन ही समझा जाता है… कब हम भी इंसान समझे जाएंगे… क्यूँ एक औरत दूसरी का दुःख ना समझ उसकी परेशानी का सबब बन जाती है। यहाँ चल रहे क्रियाकलाप की किसी को खबर नहीं होती थी या खबर दबा दिया जाता था। अक्सर दिया को अब यहाँ उन लोगों के दर्शन हो जाते थे.. जो टीवी अखबार में बड़ी बड़ी बातें करते दिखते थे। जिन्हें खबर होना चाहिए.. उनकी देखरेख में ही ये काम चल रहा था.. तो कौन दिलाता इन्साफ…

दिया अपनी ही सोच में गुम थी।

रात में किसी ना किसी लड़की की चीख से सुधार गृह दहलता रहता था और सुबह कोई ना कोई लाश में परिवर्तित हो चुकी होती थी। 

कभी विद्रोह करने के जुर्म में मार दी जाती थी… कभी हालात के हाथों मार दी जाती थी। क्या मेरी भी परिणति यही है मर जाना… बिना उन दरिंदों को सजा दिलाए। नहीं.. नहीं मेरे साथ ऐसा नहीं होगा… सब कुछ जानते हुए भी दिया एक झूठा आश्वासन खुद को देती थी

लेकिन दिया ऐसे नर्क में आ चुकी थी.. जहाँ की ख़बर शायद भगवान के कानों तक भी नहीं जा रही थी। एक शाम उस इंस्पेक्टर को वार्डन के साथ सुधार गृह में घूमते देख दिया अनजानी आशंका से काँप रही थी। अभी तक यहाँ उसे किसी से बात करने की इजाजत नहीं मिली थी। क्या करे वो… खुद को उस इंस्पेक्टर के सामने परोसने दे या खुद को खत्म कर ले। धीरे धीरे अँधेरा घिरने लगा.. डरी सहमी दिया खुद को समेटे एक कोने में बैठी थी। रही सही कसर पूरी कर दी दिया को खाना देने आई रसोई की केयरटेकर की कुटिल मुस्कान ने। वार्डन का आदेश है खाना जल्दी खा ले.. आज की रात तुझे बहुत काम करने हैं.. केयरटेकर कह कर चली जाती है। 

कुछ देर के बाद ही इंस्पेक्टर को लि‍ए वार्डन दिया के कमरे के बाहर खड़ी थी… गगनभेदी ठहाका लगाता हुए इंस्पेक्टर जैसे ही वार्डन के साथ दरवाजे को धकेल अंदर जाता है.. दोनों की चीख निकल जाती है। 

दिया अपने दुप्पटे के सहारे छज्जे में लगे लोहे के रॉड से लटकी हुई अपनी आत्मा को मुक्त कर चुकी थी और उसकी बाहर की ओर निकली आँखें इंस्पेक्टर को घूरती हुई लगी थी.. जो कि अब शायद इंस्पेक्टर और वार्डन को कभी चैन की नींद ना सोने दे । लेकिन आज एक बार फिर समाज के दोयम दर्जे की आपराधिक सोच ने किसी के ख्वाब के घोंसले को पूरी तरह उजार दिया था और फिर से दिया का कातिल कौन प्रश्नचिन्ह अनदेखा कर जहां का तहां छोड़ गया था।

आरती झा आद्या

दिल्ली

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