बेबी चांदनी (भाग 2) – सीमा वर्मा

बेबी चांदनी की आंखों में रहस्य के काले घेरे उभरने के पहले ही मम्मी ने एक गाड़ी वाले अंकल की सिफारिश से उसका दाखिला शहर से दूर बने इस बोर्डिंग स्कूल में करवा दिया था।

जिसके चारो ओर दूर-दूर तक कोई घनी आबादी नहीं थी।

वह छुट्टियों में भी घर नहीं जा कर यहां ही रहती हुई सारे -सारे दिन हॉस्टल के अपने कमरे में बैठी अध्ययन में लीन रहती है।

सिस्टर लिसेरिया की तो वह सबसे प्रिय छात्रा है।

वे उसे दूर से ही आती देख सहज ही कह  उठती हैं ,

‘ कमॉन …कमॉन माई चाईल्ड  , वुड वी डॉक्टरनी साहिबा ‘

चांदनी खिलखिला कर हँस पड़ती।

वे दोनों अक्सर साथ ही वाक पर निकल जाया करतीं।

जहाँ अपने घर में चांदनी हमेशा एक अन्जाने संकोच में डूबी रहती है।

उसके विपरीत हॉस्टल के एकान्त में भी वह स्वच्छंद, निर्भय हो कर रहती है।

अचानक प्रिय सहेली चित्रा की आवाज ने उसे स्मृतियों के घेरे से बाहर निकाल दिया …

चित्रा के हांथों में एक बड़ा सा चित्र है।

जिसे लहराती हुई वह चांदनी के निकट आ कर खड़ी हो गई,

” देख तो चांदनी यह कितनी खूबसूरत पेटिंग आज मॉल रोड के बगल वाली गली  में दिखी तो मैंनें इसे खरीद लिया,

‘ देख तो जरा इसमें इस छोटी नन्ही सी बच्ची की तस्वीर तुझसे कितनी मिलती-जुलती है ना ? ‘

चांदनी अपनी छवि इस सरस ,सजीव छायाचित्र में देख कर स्तंभित है।

उसे इस चित्रोमय स्मृति का ज्ञान  तो।

लेकिन चित्र में अंकित बच्ची की बाईं गाल पर नाक के ठीक नीचे छोटे से सुनहरे तिल ने उसे हतप्रभ कर रखा है।

उस अत्यंत सुन्दर चित्र में अपने समय की नामी -गिरामी कुशल नृत्यांगना ‘फूलबाई , कत्थक शैली नृत्य के परण में चक्कर लगाती हुई पर्दे के किनारे रखे पीतल के बड़े से फूलदान से टकराती हुई दिखाई गई है।

जिसके पास ही वह नन्हीं घुंघराले बालों वाली बच्ची बड़ी अदा से खड़ी है।

‘यह तो हूबहू मम्मी की तस्वीर है’ वह अपनी पलकें झपकाए बिना तस्वीर को एकटक देखती हुई

सीधी आकाश से उतर कर धरती पर आ खड़ी हुई।

इस फूलबाई के तीखे नाक-नक्श देख कर चांदनी सिसकारी भर उठी।

बरसों पहले देखी इन मोहतरमा का एक ऐसा ही सजीव पूर्ण- चित्र आंखों के सामने आ खड़ा हुआ।

कितने बरस बीत चुके हैं।

लेकिन वह साधारण सी घटना उसे इतनी गहराई से सही-सही नुक्तों सहित याद होगी यह उसकी सोच से परे है।

दिमाग के किसी कोने में विचारों की आंधी उमड़ रही है।

‘आश्चर्यजनक रूप से उपर से नीचे तक रईसी में पगी उस फूलबाई की नन्हीं बच्ची रुपाली

(मम्मी ) के लिए खुद को उस नाचनेवाली के कोठे से अलग कर पाना एवं स्वयं को उच्च वर्ग की सभ्रांत महिला के रूप में स्थापित कर पाना असान नहीं रहा होगा।

चांदनी ने अपनी मम्मी में एक खास बात नोटिस की है।

वे कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखती हैं।

उसने अपनी आंखें रगड़-रगड़ कर मल कर देखा ,

यह सब कोई सपना है या हकीकत ?

जो तेज रफ्तार वाली सिनेमा के रील की तरह खुलती जा रही है। जिसे उसका दिल और दिमाग स्वीकार नहीं करना चाहते।

इसके बाद उसकी मनःस्थिति एकदम से बदल गयी।

हाँथ बढ़ा कर चित्रा से वह तस्वीर अपने हांथों से लिए चांदनी अपने कमरे में चली आई।

जैसे सीने पर दुःख, बेचैनी और आशंकाओं से भरा बस्ता उठा रखा है।

काफी देर तक खिड़की पर खड़ी हुई हॉस्टल के लंबे, हल्के अंधेरे में डूबे कॉरिडोर में आंखें गड़ाए…  चुपचाप देखती रही।

बाहर बागीचे में विशाल अमलतास के पेड़ से होती हुई हवा मंद-मंद बह रही है।

फूल झड़ रहे हैं शनैः – शनैः ।

काफी देर तक जब अंधेरे में नजर गड़ाने के बाद भी अपनी समस्या का समाधान नहीं ढू़ँढ़ पाई तो एक कठोर निर्णय लेने को विवश हो गई।

कितनी बार खुद को सजा देकर भी दूसरों को सजा दी जाती है।

छुट्टियाँ शुरु होने वाली हैं इस बार उसे माँ के पास घर जाना ही होगा।

अब वह बाइस बर्ष की हो चुकी है। 

अपनी मेहनत और क्षमता के बल पर देश के अव्वल माने जाने वाले मेडिकल कॉलेज की मेधावी स्टूडेंट मिस ‘चांदनी ‘।

‘ उसके नाम के बाद कोई सरनेम नहीं है  ? ‘

जब कि सबों के होते हैं।

इस बार मम्मी को बताना  होगा।

कदाचित यह मम्मी के पास घर जाने का शायद आज तक का सबसे मुश्किल सफर होगा।

पिता को उसने कभी देखा नहीं और माँ का खिला-खिला जवाँ लेकिन ‘मजबूत’ रूप चांदनी को सदैव भाया है।

‘ लेकिन निर्मम भी हम उसी के प्रति होते हैं जिसे सबसे ज्यादा चाहते हैं ‘

चांदनी –

जानती है जब भी वह घर जाती है,

उसकी नजर बचा कर मम्मी हमेशा मुझमें कुछ ढू़ँढ़ती -टटोलती रहती हैं मगर कहती कुछ नहीं हैं।

उन दोनों के बीच अनकहे की एक मजबूत दीवार है।

जैसे सदा एक अडोल चुप्पी सी खिंची रहती है उन दोनों के बीच …

बीच-बीच में कोईअनपढ़ा पन्ना  समय-कुसमय फड़फडा उठता है।

माँ को हमेशा तरह-तरह के वाध्य यंत्रों पर सुर-ताल साधते हुए देखा है।

मम्मी गायिका हैं।

जब वह बहुत छोटी थी तो उसे अपने उन नाजुक दिनों में भी हर एक चीज के लिए घंटो माँ का रास्ता देखना पड़ता था।

कितनी बार तो गहरी नींद … में होती

जब रात गये मम्मी लौटतीं,

उसे छाती से चिपका कर गुनगुनाती ,

   ‘ ओ मेरे मजार पर फूल चढ़ाने वाले

      इक झलक दिखला जाता तो तेरा

           क्या जाता “

और यह गाते समय उनकी आंखों से सावन-भादो की झड़ी लग जाती थी।

चांदनी की  सभी सहेलियां कहती हैं ,

” चांदनी की मम्मी हम सबकी मम्मी से अलग हैं “

जब सबकी मम्मियां किसी तीज-त्योहार में तैयार हो कर गीत गातीं पेड़ों के इर्द-गिर्द घूम मन्नतें माँगती ।

उसने अपनी मम्मी को कमरे में बंद हो सजी-संवरी सितार बजाते देखा है।

दिन भर के बाद ‘शाम’ सिर्फ़ उनकी और उनके संगीत महफिलों के लिए होती ।

जिसमें चांदनी की उपस्थिति की सख्त मनाही हुआ करती।

बाद के दिनों में वह घर कम जाने लगी थी।

अक्सर मम्मी ही उससे मिलने हॉस्टल आ जाती तब वे दोनों खूब घूमती-फिरती मजे करतीं। कभी सदर बाजा़र तो कभी मॉल रोड तक पैदल ही घूम आती। 

तब मम्मी खूब खुश रहतीं , हँसती और खिलखिलाती।

चार-पाँच दिन उसके साथ समय गुजार कर जब उनके वापस जाने का समय आता तो वे दोनों ही चुप हो जाया करती थीं।

मम्मी तो मौन ही हो जातीं

‘ मदर लिली ‘ के ऑफिस में जा कर उनसे घंटो दबी-घुटी आवाज में बाते किया करतीं और निकलते  समय एक साइन किया हुआ ब्लैंक चेक धीरे से मदर के हाथों में थमा देतीं।

जिसे ऑफिस के बाहर खड़ी चांदनी देखती और बातों को सुनने का प्रयास तो करती पर कुछ सुन नहीं पाती।

वह अभी खयालों में डूब उतरा ही रही थी।

अचानक हवा के झोंके से चित्र उड़ गया जिसे उठाने को झुकी चांदनी की नजर फिर से उस नन्ही लड़की के गालों पर पड़े तिल पर जा अटकी।

चांदनी ने आंखें मल कर फिर से अच्छे से देखा ,

उसे लगा मानों वह खड़ी-खड़ी ही सो गई हो और यह सब जो सामने है वह मात्र एक सपना …है ?

 या ऐसी कोई हकीकत जिसे उसका दिल और दिमाग स्वीकार नहीं करना चाहते ।

    क्रमशः

अगला भाग 

बेबी चांदनी (भाग 3) – सीमा वर्मा

बेबी चांदनी – सीमा वर्मा

सीमा वर्मा

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