अधूरी ख्वाहिश – पृथ्वीराज

प्रिया, कई सालों के बाद आज अपने गांव लौट कर आई थी, वो वहां के ज़मीदार की बेटी थी, शक्ल से तो खूबसूरत थी ही, और अब शहर में पढ़ कर समझदार भी हो गई थी.. वो इस गांव की अकेली लड़की थी जो शहर पढ़ने गई थी.. और कुछ दिनों की छुट्टी में वो वापस पुरानी यादें ताजा करने वापस आई थी.. कई सालों से बाहर रहने के कारण उसको गांव बहुत बदला बदला सा लग रहा था.. पर वो नदी का किनारा और वहां लगा आम का पेड़ अब भी वैसे ही थे.. जहां वो बचपन में अपने दोस्त के साथ खेला करती थी.. पर अब उस नदी पर जाने की मनाही लग चुकी थी गांव में.. क्योंकि गांव वालों का मानना था की उस पेड़ पर भूत रहता है.. मगर अभी तक ये बात प्रिया को पता नहीं थी..

घर पहुंच कर, Fresh हो कर, सबसे बातें करके, खाना खा कर अब सोने का वक्त भी हो गया था.. पर कई सालों से शहर में AC की हवा में सोने की आदत हो चुकी थी तो गांव में पंखे की हवा में उसको नींद नही आ रही थी..

इसलिए प्रिया खिड़की में जा कर बैठ गई, और वहां से गांव को देखने लगी.. फिर भी मन नही लगा तो वो घर की छत पर जा कर ताज़ी ठंडी हवा का मजा लेने लगी,

रात की गांव की ताजी ठंडी हवा उसको बड़ा सुकून दे रही थी.. और घर की छत पर टहलते हुए उसकी नजर दूर नदी किनारे पर गई.. उसने देखा की वहां कोई घूम रहा है.. पर रात होने के कारण उसको ठीक से कुछ दिखाई नहीं दिया.. तो वो इस बात पर ध्यान दिए बिना ही वापस नीचे अपने रूम में आ गई.. और मन ही मन सोचने लगी की वो कल उस नदी पर जरूर जायेगी जहां वो बचपन में खेलती थी..




सुबह जल्दी से उठ कर, नाश्ता करके उसने अपने कुछ कपड़े एक छोटे से बैग में भरे और वो बिना किसी को बताए नदी की तरफ निकल गई.. वो सोच रही थी की अगर मौका मिला तो वो नदी पर नहा भी लेगी .. वो नदी पर पहुंची और उसी आम के पेड़ के पास आई, तो उसने देखा वहां एक लड़का अपना मुंह छिपाए बैठा रो रहा है.. तो उसको याद आया की शायद ये वही है, जिसको उसने कल रात घूमते देखा था.. उसने उससे पूछा की तुम कौन हो? और रो क्यों रहे हो? तुम्हारा घर कहां है? तो लड़के ने बिना सर उठाए ही उसको जवाब दिया की.. उसका ना कोई घर है, ना उसका अब कोई दोस्त है.. और वो इसी पेड़ के पास रहता है.. हां पहले एक दोस्त था पर वो भी जा चुका है.. और अब बस वो उस दोस्त के लौट कर आने का इंतजार कर रहा है..

तो प्रिया ने कहा की वो भी इसी जगह बचपन में खेलने आती थी, और उसका सबसे अच्छा दोस्त था जुगल.. वो दोनो खूब मस्ती करते थे, और दोनो बचपन में यहीं घर घर खेलते थे.. दोनो पति पत्नी बनते थे.. बहुत मजा आता था.. पर उसके पापा ने एक दिन हम दोनो को साथ खेलते देख लिया था तो मेरा घर से निकलना और खेलना बंद करवा दिया था.. पापा कहते थे की वो जमींदारों की बेटी है और उसको गांव के बच्चो के साथ नही खेलना चाहिए.. फिर उसको पढ़ाई के लिए शहर भेज दिया और तब से ना जुगल से कोई बात हुई ना कोई खबर आई.. और बाद में उसको पता चला की जुगल और उसका परिवार गांव छोड़ कर चले गए हैं..

फिर लड़के ने उससे पूछा की, अगर जुगल तुमको वापस मिल जाए तो क्या करोगी? तो प्रिया ने हंसते हुए कहा की “मैं तो उससे शादी कर लुंगी” और हमेशा उसके साथ रहूंगी.. उसका जवाब सुनकर.. उस लड़के ने अपना मुंह उठाया.. उसकी दोनो आंखे काली थी.. और सर से मुंह पर बहता हुआ खून दिख रहा था.. गले पर पर कटने के निशान थे..

शाम को प्रिया की लाश उसी पेड़ के पास मिली जहां उसके बाप ने जुगल को पीट पीट कर मारा था, और उसके पूरे परिवार को घर में जिंदा जला दिया था..

ये सब उसने प्रिया को शहर भेजने के बाद किया था, और गांव में ये बात फेला दी थी की जुगल का परिवार गांव छोड़ कर चला गया है..

पर शायद जमींदार ये बात भूल गया था कि, वक्त सच्चे प्यार को मिला ही देता है.. चाहे जिंदा रहते हुए या मरने के बाद

लेखक : पृथ्वीराज

 

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