अभागी – बड़भागी – रवीन्द्र कान्त त्यागी

“हीटर का एक पॉइंट बढ़ा दे आशू। ठंड बढ़ गई है। लगता है आज सीजन की पहली बर्फ गिरेगी। और सुन। तेरा खाना वहाँ ओवन के पास ही रखा है। गरम करके खा ले। मुझे ये ऐस्से कंप्लीट करना है।” स्कूल से लौटकर कंधे से बैग उतारते बेटे से श्रुति ने कहा।

“ओ मॉम डार्लिंग। एस्से कंप्लीट करने के बाद खाना दे देना पर … खाऊंगा मैं तुम्हारे हाथ से ही।” तेरह साल के आशू ने मां का कंधा पकड़ते हुए कहा।

“बड़ा हो गया है रे। कब तक मां के पल्लू से बंधा रहेगा। ट्यूब से अकेला स्कूल जाता है। दोस्तों से दिन भर चैट करता है और निवाले खाता है मां के हाथ से। अच्छा तू चेंज कर ले। तब तक मैं कंप्लीट कर लेती हूँ। पापा भी आते ही होंगे।” श्रुति ने बेटे के सर पर हाथ फेरते हुए कहा।

बेटा कपड़े बदलने की बजाय मां के सामने राइटिंग टेबल के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गया और स्नेह के साथ मां को देखने लगा।

“मां … तुम्हारे माथे पर ये चोट का निशान कैसा है। क्या बचपन में गिर पड़ी थीं।”

“काम करने दे आशू। ये सवाल कितनी बार तो पूछ चुका है।”

“और आप कितनी बार टाल चुकी हो मम्मी। बताओ न मम्मी प्लीज।” और जिद करते हुए आशू ने कंप्यूटर के कवर पर हाथ मार दिया। खट से स्क्रीन बंद हो गई। श्रुति ने क्रोध से बेटे की तरफ देखा। फिर अपने लाडले की शरारत पर ममता से मुस्करा दी।


“बहुत जिद्दी होता जा रहा है तू। अच्छा, तुझे एक कहानी पढ़वाती हूँ मगर एक शर्त है। तू इसके बाद कोई सवाल नहीं पूछेगा।”

“प्रौमिज़ माय डीयर मॉम। प्रौमिज़।”

“सामने शैल्फ पर किताबों के नीचे तीसरे नंबर पर जो डायरी रखी है, उसके पैंतीसवें पेज पर मेरी हैंड राइटिंग में ये कहानी लिखी है जो बरसों पहले इंडिया में राजस्थान स्टेट के भरतपुर शहर में शुरू हुई थी। तू पढ़ ले। तब तक पापा आ जाएंगे। फिर साथ ही खाना खाते हैं। यू आर अ ब्रेव बॉय। अब तू बड़ा हो गया है। तुझ से कुछ भी छुपाने का कोई अर्थ भी नहीं है।”

—–

“कैसा पीला सा रंग पड़ गया है रे जीतू। वहाँ तुझे खाना नहीं मिलता था क्या लंदन में।”

“खाना तो मिलता था माँ पर तुम्हारे हाथ का नहीं। अब ये गोरी अंग्रेजन भला तेरे जैसा खाना बना सकती हैं क्या माँ।” जतन ने मुस्कराते हुए ममता से माँ के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा। 

“पहले चाय पिएगा या स्नान करेगा। ये गरम कपड़े उतार दे बेटा और पहले नहा ले। थकान उतर जाएगी। तब तक मैं तेरे लिए चाय बनाती हूँ।”

“अरे माँ, सुबह तीन बजे, लंदन में जब घर से एयरपोर्ट के लिए निकला तो ठंड के मारे जान निकली जा रही थी और यहाँ लू के थपेड़े चल रहे हैं। माँ, पहले चाय ही बना दो। वो अदरक और इलायची वाली। जैसी तुम बनाया करती थीं। तुम्हारे हाथ की चाय पिये हुए तो बरसों गुजर गए हैं।”

“सात समंदर पार चला जाएगा तो … वरना रोटी तो यहाँ भी मिल जाती।” माँ का स्वर भीग गया और वो रसोई की तरफ चली गई।

दस मिनट के बाद जब माँ हाथ में चाय का प्याला लेकर लौटी तो जतन ने कोट उतार कर पलंग पर फेंक दिया था और उसी खिड़की के पास खड़ा था जहां माँ उसे छोड़कर गई थी।

“अरे, अभी तक वहीं खड़ा है जतन। क्या देख रहा है।”

“न नहीं … कुछ नहीं माँ। मैं कह रहा था कि पिताजी अभी तक नहीं लौटे।” जतन ने अनमने से मन से कहा।


“आते ही होंगे। गाँव से सुबह ही निकलने को कह रहे थे। बस नहीं मिली होगी। नंदराम के पोते के जसूटन में गए हैं। वैसे तो जाने का मन नहीं था। तबीयत भी ठीक नहीं रहती। अरे तेरे रिश्ते वालों ने बहुत परेशान कर रखा है। तपेश के चाचा ने बड़ा दबाव देकर बुलाया था। कह रहे थे कि तपेश की ससुराल पक्ष के सारे लोग फंगशन में आएंगे। उसकी साली बड़ी सुंदर है। पढ़ी लिखी भी है। कह रहे थे कि एक बार तेरे पिताजी को लड़की पर नजर लगवा देंगे। फिर बात आगे बढ़ाएँगे। पैसे वाले लोग हैं बेटा। बात बन गई तो तेरे लौटकर जाने से पहले ही शादी करने को तैयार हैं।”

“माँ … अभी नहीं माँ। अभी मुझे ठीक से सैटल तो हो जाने दो। दो चार महीने में ट्रांसफर भी होने की उम्मीद है। न जाने दुनिया के किस कौने में भेज देगी कंपनी।”

“अरे तू बावला है जीतू। सत्ताईस अट्ठाईस का होने को है। अब क्या तुझ में बड़ पीपल फूटेंगे। हर बार ऐसे ही टालकर चला जाता है। इस बार हम तेरी एक न सुनेंगे। हम क्या पोते पोती का मुंह देखे बिना ही दुनिया से जाएंगे।”

“मगर मां …।” जतन एक ठंडी सी आह लेकर सोफ़े पर बैठ गया।

“जतन बेटा … जो गुजर गया वो समय वापस आ सकता है क्या।” मां उसके बालों में हाथ फिराते हुए कहने लगी।

“पुरानी यादों को स्लेट पर लिखी इबारत की तरह पोंछ कर अपने दिल से मिटा दे बेटा। वो अभागी अपने दुर्भाग्य की छाया अपने साथ लिए दूसरे घर चली गई है।” माँ ने दोबारा कहा। 

“अभागी … दुर्भाग्य। क्या हुआ है मां।”

“तू दिल का बड़ा कमजोर है रे। इसी लिए हम ने तुझे कुछ नहीं बताय। अपनी किस्मत के पन्ने काली स्याही से लिखवाकर लायी है सुर्ती। शादी से सात दिन पहले बाप मर गया। परिवार की तंगहाली को देखते हुए समाज और रिशतेदारों ने नियत समय पर ही फेरे डालना उचित समझा। बूढ़े बुढ़िया के पास जो कुछ जोड़ा जुगाड़ा था वो तो शादी की तैयारियों में लगा दिया था। सब का मानना था कि ये दिन टल गया तो न जाने फिर कभी गरीब मां बाप की बेटी डोली चढ़ेगी या नहीं। एक तरफ चिता की आग भी ठंडी नहीं हुई थी और दूसरी तरफ रोती बिलखती सुर्ती अपनी विधवा माँ को अकेला छोड़कर ससुराल चली गई।”  

“चलो मां। एक तरह से अच्छा ही हुआ। श्रुति अपने घर चली गई। अब जिये अपनी जिंदगी। अपनी दुनिया में। अपनी घिरस्ती में।”

“काहे की घिरस्ती बेटा। चल तू नहा ले। तेरे कपड़े बाथरूम में रख दिये हैं। सुन बेटा। अब बहू ले आ। कब तक माँ से काम कराता रहेगा।”

“अरे माँ, अभी तो मैं तुम्हारा छोटा सा नन्हा बच्चा हूँ। पर …पर तुम ने ये क्यूँ कहा कि ‘काहे की घिरस्ती।”


“जा, तू नहा ले। आते ही अपना मन खराब मत कर। उस अभागी की घिरस्ती तो शादी के छह महीने बाद ही बिखर गई थी। बस … अब तो उस घर की नौकरानी बनकर रह गई है। सुर्ती की माँ सब बताती है।” माँ ने दुखी होकर एक ठंडी आह सी लेकर कहा।

“क्या बताती है श्रुति की मां। क्या हुआ है उसके साथ। मुझे बताओ न मां। आखिर हुआ क्या है।” जतन कुर्सी सरकाकर उस पर बैठ गया।

“छोड़ बेटा। जो बीत गई सो बात गई। अभागी के भाग में जो लिखा था उसे कौन मिटा सकता है। क्या पता उसकी किस्मत में विधवा होना ही लिखा हो और इसी लिए विधाता ने तेरा उसके साथ …। भगवान मेरे बेटे को लंबी उमर लगाए।” माँ ने बेटे के सर पर हाथ फिराते हुए कहा।

“विधवा … क्या कह रही हो मां। श्रुति विधवा हो गई है? मर गया है उसका पति? अरे मां। क्या हुआ उसे इस उम्र में। अभी तो शादी हुए दिन ही कितने हुए होंगे।”

“अब क्या कहूँ बेटा। श्रुति की मां का सोचकर दिल बैठ बैठ जाता है। एक साल के भीतर पति चला गया। बेटी की शादी हुई तो दामाद को भगवान ने छीन लिया। बेचारी बिलकुल टूट गई है। अकेली बुढ़िया दुनिया में किस किस से टकराएगी। भाग्य से लड़े या जमाने से।”

“अब काहे की लड़ाई रह गई मां। सब कुछ तो लुट पिट गया है बेचारी का। मगर मां तुम भी आज पहेलियाँ बुझा रही हो। मुझे बताओ न मां। क्या छुपा रही हो।”

“उन लोगों ने बुढ़िया के मकान के लालच में उसकी बेटी को एक प्रकार से बंदी बना रखा है। अपनी माँ से भी बात नहीं करने देते। मगर न मुझे तुझ से कुछ और बताना है। न तुझे इस तरफ कोई ध्यान देने की जरूरत है। जीतू, चल खड़ा हो। नहा ले। तब तक तेरे पिताजी आते ही होंगे। फिर सब साथ बैठकर खाना खाएँगे। तू अब दोबारा इन सब झंझटों में अपना दिमाग खराब मत कर। पहले ही क्या थोड़ा हंगामा हुआ था। अब तू अपनी नई जिंदगी शुरू कर बेटा। मैं नहीं चाहती कि तेरे भावुक मन पर दोबारा उन घटनाओं की खरोंच भी लगे।”

तभी दरवाजे पर आहट हुई। जतन के पिता भगवान सहाय ने प्रवेश किया। जतन  ने उनके पाँवों को हाथ लगाया और वे माथे का पसीना पौंछते हुए सोफ़े पर बैठ गए।

“यात्रा ठीक हो गई जतन। कोई दिक्कत तो नहीं हुई। कब पहुंचा।” भगवान सहाय ने बेटे से मुखातिब होकर कहा।

“सब ठीक रहा बाऊजी। अभी एक घंटा हुआ है।”

“शकुंतला … मैं तो बात लगभग पक्की ही करके आ गया। पक्की क्या … बस मैंने अपनी तरफ से हाँ कह दी है। अब वो भी एक बार हमारे बेटे को देख लें। बड़ी सुंदर लड़की है। लंबी गर्दन, बड़ी बड़ी आँखें। ऊंची पढ़ाई पढ़ रही है।” भगवान सहाय ने पत्नी को संबोधित करते हुए कहा।

“बाऊजी मैं … मैं अभी …।” जतन ने झिझकते हुए कहा।


“तुझ से पूछा किसी ने। पहले ही बहुत दंद फंद करके हमारी नाक कटवा चुका है। अगर उस रात श्रुति के मां बाप पुलिस में नहीं जाते और तुम दोनों को भागते हुए बस अड्डे पर पकड़ नहीं लिया जाता तो … मेरा तो सोचकर ही मन दहल जाता है। इतनी बड़ी दुनिया में कहाँ भटकते रे तुम दोनों। ससुरी ये उम्र ही अंधी होती है। इंसान आगा पीछा कुछ सोचता ही नहीं। दो कपड़े बगल में दबाये और भाग लिए। जैसे बाहर दुनिया में कोई तुम्हारे लिए दफ़तरखान सजाये बैठा है। मार काटकर फेंक देता तुझे कोई और श्रुति को किसी कोठे पर बेच देता।” 

“इतने दिनो में लड़का बाहर से आया है जी और आप आते ही अंगारों पर बैठ गए।” मां ने उलाहना देते हुए कहा। फिर एक ठंडी आह लेते हुए बोली “सब किस्मत की बात है जी। सुर्ती तो आज भी नरक में पड़ी है। कैसी भली सी लड़की है और …। सच्ची कह रही हूँ। अगर बीरादरी विरादरी के झमेले नहीं होते तो मैं उसे अपनी बहू बना लेती। मुझे तो अम्मा – अम्मा कहते थकती नहीं थी।”

“तुम भी गंवार की गंवार ही रहोगी जानकी। हम अपने बेटे की जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं और तुम न जाने कौन सा राग लेकर बैठ गईं। भुगतेगी श्रुति जो उसकी किस्मत में होगा। गलती तो उसने भी की ही थी। अगर बदनामी नहीं हुई होती तो क्यूँ उसका बाप आनन फानन में …।”

“गलती तो सुर्ती और हमारे बेटे की बराबर ही थी मगर इस दुनिया में औरत को ही भुगतना पड़ता है। लड़की की जात है। मां बाप को कुछ सोचने समझने का मौका भी न मिला। बदनामी के डर से बूढ़े बुढ़िया ने बिना सोचे समझे उसे एक खाँटी किरमिनल के साथ ब्याह दिया और छह महीने गुजरने से पहले ही उसका पति पुलिस एनकाउंटर में मारा गया।” मां ने दुखी होकर कहा।

“चुप रहो शकुंतला। चुप रहो। अब श्रुति की जिंदगी से हमारा कुछ लेना देना नहीं है। क्या लगती है हमारी। तुम जवान बेटे के सामने बार बार उसका जिक्र करके क्यूँ उसका मन खराब करने पर तुली हुई हो। इतनी भी समझ नहीं है क्या तुम्हें। औरत को ही भुगतना पड़ता है …। अरे उसे तब पता नहीं था जब मां बाप के मुंह पर कालिख पोतकर …। उसके साथ जो गुजर रही है, उसके लिए हम जिम्मेदार हैं क्या?” भगवान सहाय ने क्रोध से चिल्लाकर कहा।

ये राजस्थान के रेतीले भाग का एक छोटा सा शहर था। शहर के बाहरी हिस्से में बड़ी सी खाली पड़ी जमीन पर किसी छुटभैये कौलोनाइजर ने छोटे बड़े बेतरतीब से प्लॉट काट रखे थे। दूर दूर इक्का दुक्का मकान बने हुए थे। बीच बीच में पड़ी खाली जगह में रेत के छोटे छोटे टीलों पर कंटीले कीकर की झड़ियों ने अपना अस्तित्व बचा रखा था जिन से गरम हवा टकराती तो कंटीली झाड़ियाँ क्रोध में आकर सुनहरी रेत के कण हवा में झोंक देतीं।

लगभग एक घंटे की मशक्कत और खोजबीन के बाद जतन ने एक मकान का दरवाजा खटखटाया। ये एक बिना प्लास्टर का कोई सौ गज या उस से भी छोटे प्लॉट में बना हुआ अधूरा सा मकान था।

एक लगभग साठ साल के किन्तु ढलती उम्र में भी अपेक्षाकृत बलिस्ट से दिखने वाले बुजुर्ग ने दरवाजा खोला। उनकी मूछें गालों तक फैली हुई थीं। मूछों और सर के बालों को खिजाब या काली महंदी से रंगा गया होगा किन्तु समय गुजरने के साथ नीचे से जड़ों में सफ़ेद बाल अधिक झांक रहे थे। उन्होने एक सफ़ेद लूँगी सी बांध राखी थी और ऊपर का बदन नंगा था। पूरा बदन पसीने में भीगे हुए काले सफ़ेद खिचड़ी बालों से भरा हुआ था। उनके चेहरे पर और गोल सी लाल आँखों में एक अजीब प्रकार का न जाने दबंगई का या वहशीपन का सा भाव झलक रहा था।


जतन उनका चेहरा देखकर ही एक पल को सहम सा गया। फिर उसने कुछ साहस सा बटोरकर कहा “जी मैं … मैं भरतपुर से आया हूँ। मैं … श्रुति …।

“अरे सुनती हो। देखो भरतपुर से बहू का कोई रिश्तेदार आया है।” बुजुर्ग, जतन को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए दरवाजे से एक ओर हट गए।

घर में चारों तरफ अव्यवस्था और विपन्नता का शासन था। आँगन के एक कौने में नल के नीचे झूँठे बर्तनों का ढेर लगा हुआ था। सामने पड़ी खाट पर कपड़ों का ढेर पड़ा था। खाट के बराबर दो पुरानी सी प्लास्टिक की कुर्सी पड़ी हुई थीं। दरवाजों पर पुरानी साड़ियों के मैले से पर्दे टंगे थे।

भरतपुर का नाम सुनते ही, मलीन से सफेद कपड़ों में लिपटी हुई एक नारी छाया घर के किसी भीतर के भाग से बाहर की ओर दौड़ी और घर के गलियारे की दहलीज पर आकर ठिठक गई। उसकी आँखों के नीचे स्याह निशान दिखाई दे रहे थे। उसका तनावयुक्त उदास चेहरा किसी चिरकाल बंदिनी सा गहरी निराशा में डूबा हुआ था। उसका गौरवर्ण उन्नत भाल बिना शृंगार और बिंदी के सूना सूना दिखाई दे रहा था किन्तु चेहरे की मासूमियत से आज भी वो स्कूल की छात्रा सी दिखाई देती थी।

आगंतुक को देखकर उसके चेहरे पर उजाले की एक किरण झलकी और अपने हालात और वातावरण की गंभीरता को देखकर तुरंत गायब हो गई। एक भय और किसी अनहोनी की आशंका से उसका चेहरा पीला सा पड़ गया था।

झुर्रीदार मूछों वाले बूढ़े ने श्रुति को घूरकर देखा और श्रुती नजरें नीची किए वापस मुड़कर घर के भीतर समा गई।

“बैठो नौजवान। अरे कोई पानी लाओ भई। छोरा गर्मी में तपता हुआ आया है।” बुजुर्ग ने एक क्षण के लिए भी जतन के चेहरे से नजरें न हटाते हुए कहा।

एक पीली सी ओढ़नी को सर पर सँवारती हुई एक प्रौढ़ महिला हाथ में पानी का ग्लास लेकर प्रगट हुई और पानी का ग्लास जतन को देते हुए बोली “कूण है रे छोरा। कांई रिश्तेदारी है तेरी बींदनी से। पहले तो ना देखा कभी।”

“जी मैं … वैसे हम साथ पढ़ते थे। श्रुति की जो माँ है न … वो … मैं।” जतन के मुंह से बोल नहीं फूट रहे थे।

“हूँ … बोल बोल। आगे बोल।” बुजुर्ग ने लगातार जतन के चेहरे पर आँखें गड़ाए हुए कहा।

“हम … हम पड़ौसी भी हैं और … श्रुती की माँ जो हैं … वो मेरी मौसी …।” उसकी खुश्क जबान में कांटे से उग आए थे और शब्द मानो सूख गए थे। हलक से बाहर नहीं निकल पा रहे थे। दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था।

“हूँ … ।” बूढ़े ने लंबी हुंकार भरते हुए धीरे धीरे उठते हुए शंका के साथ कहा “अरे कहीं तू वही लफंगा छोरा तो नहीं जिसके साथ हमारी बींदनी शादी से पहले भागने की कोशिश कर रही थी।”


बिना जवाब सुने हुए बूढ़े ने लपक कर जतन के बाल पकड़ लिए और चिल्लाकर कहा “अरे लाठी डंडा लाओ रे कोई। ये बदमाश यहाँ तक पहुँच गया है। हरामखोर जानता नहीं कि हम कौन है। पूरे इलाके की रूह कांपती है हमारा नाम सुनकर। तू आज यहाँ से जिंदा बचकर नहीं जा सकता छोरे।”

श्रुति चीखती हुई जतन की ओर भागी किन्तु उसे किन्ही दो बलिष्ट हाथों ने पकड़कर भीतर घसीट लिए।

“अरे तलवार ला मेरी। आज ये छोरा यहाँ से जिंदा बचकर नहीं जा सकता। हरामखोर की हिम्मत तो देखो।”

“अरे पागल हो गए हो क्या। घर में ही खून खराबा करोगे। पहले ही पुलिस हमारे पीछे लगी रहती है। एक छोरे को तो गंवा दिया। अब तुम भी जेल में सड़ोगे क्या।” बुढ़िया भीतर से चिल्लाई।

“पर जिंदा तो नई जाण देणा इसे। हमारे घर की इज्जत उछालने की हिम्मत कैसे हुई इस नामाकूल की।”

तभी एक पैंतीस – चालीस साल का आदमी भीतर के कमरे से लाठी लेकर बाहर आया और उस ने जतन को ताबड़तोड़ पीटना शुरू कर दिया। भयानक कोहराम मच गया किन्तु इस वीराने से इलाके में उस चीख पुकार को सुनने वाला कोई नहीं था। जतन को अपनी आँखों के आगे साक्षात मौत दिखाई दे रही थी और वो रहम की भीख मांग रहा था। थोड़ी ही देर में मां बाप के लाड़ प्यार में पला उनका इकलौता नाजुक सा बेटा जतन जो अधिक प्रहार न सह पाने के कारण, भय और घंटों धूंप में भटकने के कारण पहले ही लस्त पस्त हो चुका था मूर्छित होकर एक ओर लुड़क गया।

“अरे … एक काम कर छोरा। रस्सी ला। इसे बांधकर ड़ाल देते हैं। रात को मार कर ‘रण’ में फेंक देंगे। कोई पहचानेगा भी नहीं कि लावारिस लाश किसकी है। और सुण। बीन्दणी पर निगाह रखना। जबान न खोल दे वरना उसे भी ठिकाने लगाना पड़ेगा। अरे आखिर उसका पुराना आसिक है। सांकल तो ठीक से लगा दी थी न कोठरी की। देख कहीं छोरी भाग न जाये।”

“अरे कहाँ भागेगी बाप्पू सा। तीन दिन से तो बुखार में पड़ी है। मर खप जाए तो इसका भरतपुर का मकान बेचकर …।” बोलते बोलते वो लाठी फेंककर गलियारे की तरफ गया और ज़ोर से चिल्लाया “बीन्दणी भाग गई बापू सा। पीछे का दरवाजा खुला पड़ा है।”

“अरे पकड़ साली को। और सुण। तलवार ले जा। जहां मिले वहीं काट देना। अरे इज्जत की खातिर तो हमारा खानदान … मर जाएँ या मार दें। जिंदा मत छोड़ना।”

मूर्छित लहुलुहान जतन को वहीं छोड़कर बेटा पीछे के दरवाजे से और बाप आगे में मुख्य द्वार से हाथों में नंगी तलवार लेकर बाहर की ओर भागने लगे।


अंधेरा हो गया था। रेत के टीलों के बीच से गुजरती पतली सड़क पर गश्त करती पुलिस की जीप में बैठे दारोगा ने रात के धुंधलके में एक अजीब नजारा देखा। एक चीखती हुई औरत छोटी सी चट्टान से नीचे सड़क की ओर भागी चली आ रही थी और एक ढलती उम्र का व्यक्ति हाथ में नंगी तलवार लिए तेजी से उसका पीछा कर रहा था।

अचानक श्रुति का पाँव फ़िसला और उसका सर एक पत्थर से टकरा गया। इस से पहले कि नंगी तलवार लिए दानव मूर्छित हो गई श्रुति के निकट पहुँच पाता, एक फायर की आवाज सन्नाटे में गूंज उठी।

अगले दिन श्रुति और जतन ने नागौर के सरकारी हस्पताल में आँखें खोलीं।

———–

तेरह साल का आशू अश्रुपूरित नेत्रों से अपनी मां की ओर देख रहा था। तभी दरवाजे पर आहट हुई और जतन ने प्रवेश किया। आशू भागकर अपने पापा से लिपट गया।

रवीन्द्र कान्त त्यागी

2 thoughts on “अभागी – बड़भागी – रवीन्द्र कान्त त्यागी”

  1. अति हृदय विदारक कहानी । रवीन्द्र जी की क़िस्सा गोई लाजवाब । बहुत अच्छा लगा कि आपने दुखांत नहीं किया ।
    मधु अहमदाबाद

    Reply

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!