“आधा हिस्सा” ( भाग 1) – डॉ .अनुपमा श्रीवास्तवा

 राकेश बालकनी में बैठे एक हाथ में पेपर और दूसरे हाथ में मोबाईल लिए पता नहीं किस सोच में डूबा था। सामने टेबल पर चाय ठंडी हो रही थी पर उसका ध्यान…..।

रिया ने पीछे से आवाज लगाई-” कहाँ ध्यान है आपका? चाय भी ठंडी हो गई। “

“रिया गाँव से पिताजी का फोन था।”

“पिताजी का फोन सुबह- सुबह क्या बात है?” रिया भी थोड़ी चिंतित हो गई।

“क्या कहा उन्होंने जो आप सोच में पड़े हुए हैं।”

वो दिल्ली जाना चाहते हैं मुझे टिकट भेजने को कहा है ।

“दिल्ली!!”

इस बार रिया की आंखों में प्रश्नचिह्न था।

“हाँ कल के लिए ही टिकट चाहिए, वो अभय के पास जाना चाहते हैं ।”

“पिताजी का दिमाग खराब हो गया है क्या! अभय के पास क्यों जाना चाहते हैं?”

बता रहे थे उसका तबियत खराब है और वह हॉस्पीटल में है ।उसकी पत्नी ने फोन किया था पिताजी के पास।

“तबियत खराब है तो होने दे, ऐसे लोगों का यही हाल होना चाहिये। और मैं कहती हूँ कि जरूरत क्या है पिताजी को वहाँ जाने की । पिताजी भूल कैसे गये अभय की करतूत को।”

रिया गुस्से में बोले जा रही थी और राकेश के दिमाग में फिर वही बीता हुआ घटनाक्रम रिपीट होने लगा…

उसका परिवार एक आदर्श परिवार था जिसकी चर्चा चार गांवों तक होती थी ।उस परिवार की आपसी  समझ, सामंजस्य भाईचारा और प्यार हर दूसरे परिवार के लिए उदाहरण था।  उसके घर में कोई खटास उत्पन्न  हुआ हो ऐसा कभी किसी ने नहीं सुना । उस परिवार के लोग अपने आप को हर परिस्थिति में संयमित रखने की कोशिश करते थे। बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान घर की चारदीवारी के अंदर ही हो जाया करती थी।   पिताजी को गांववाले बाबु साहेब संबोधित करते थे। उन्होंने बड़े ही जतन से समाज में अपने परिवार को प्रतिष्ठित करके रखा था। शायद यह संस्कार उन्हें अपने पूर्वजों से मिली थी। 

“बाबु साहेब” के परिवार में तीन बेटे और दो बेटियाँ थीं।

अगला भाग

“आधा हिस्सा” ( भाग 2) – डॉ .अनुपमा श्रीवास्तवा

#परिवार 

स्वरचित एवं मौलिक

डॉ .अनुपमा श्रीवास्तवा

मुजफ्फरपुर ,बिहार 

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