सहारे की बैसाखी – मंजू तिवारी

मम्मी ये ऐसे वैसे कपड़े नहीं पहनते हैं इनको तो ब्रांडेड कपड़े चाहिए मम्मी पापा भी बड़े खुश होकर अपनी बेटी के कहे अनुसार दमाद को बेटी को और उसके बच्चों को अच्छे अच्छे कपड़े दिलाते

कभी पैसे देते बेटी जब भी आती एक गाड़ी भर कर सामान के साथ उसकी विदा की जाती,,, बेटी दमाद बड़े खुश हो जाते,,, कि मेरे मम्मी पापा तो मुझे बहुत देते हैं ।,,,दमाद की कमाई थोड़ी कम थी लेकिन आगे बढ़ाने की पूरी गुंजाइश हो सकती थी,,,  इस सहारे ने दामाद के कदमों को आगे बढ़ने ही नहीं दिया,, 

यह उपहार नहीं थे यह बेटी को अप्रत्यक्ष रूप से उसकी आर्थिक मदद थी बेटी को जब भी किसी शादी ब्याह में जाना होता तो अपने ससुर से आर्थिक मदद लेती क्योंकि ससुर भी अच्छे कामाने वाले थे वह भी अपने बेटे बहू को खूब मदद करते हैं।,, इस तरह से सूरज जी की बेटी का घर का अच्छा गुजारा हो रहा था कभी ससुर की मदद से कभी पिता के सहारे से तो कभी भाइयों के सहारे से,, पति भी कमाता था लेकिन पति की कमाई में पूर्ति नहीं हो रही थी संतुष्टि नहीं थी

जब भी बच्चों को आवश्यकता पड़ती पैसे के लिए तो भाई मदद कर देते लेकिन सूरज जी की बेटी की आर्थिक मदद के कारण बहु का जीवन स्तर निम्न होता चला जा रहा था,,, बहू और बेटे जब भी अपने घर जाते खाली हाथ लौट के आते,,, बेटे से आर्थिक मदद भी लेते और बहू और बेटे और पोते कैसे रह रहे इससे उनका कोई सरोकार नहीं होता ,,, सूरज जी की पत्नी बहू को ताना मारती मेरे तो इकलौती बेटी है। अर्थात बहू भी अपने मायके से लेकर आए ,,, बेटा ज्यादा कामाता है इसलिए बेटे से ले लिया जाए और बहू की आवश्यकता को अनदेखा कर दिया जाता पैसे का रोना रोकर बेटे को खोखला कर दिया जाता,,,

 बस उन्हें तो लगता मेरा दामाद तो कम कमाता है। तो हमें उसकी मदद करनी चाहिए इस आर्थिक सहारे के चलते सूरज जी का दामाद  आर्थिक सहारे की बैसाखी से चलने लगा लेकिन कोई भी आर्थिक मदद बहुत लंबे समय तक नहीं दे सकता  यह तो तय होता ही है,,,

 अब सूरज जी की बेटी को ससुराल और मायका दोनों जगह से आर्थिक सहारा बंद हो गया और सूरज जी के दामाद का जो उसके आगे बढ़ने का सुनहरा अवसर था वह भी निकल चुका 




इस तरह सूरज जी की बेटी और दामाद आर्थिक रूप से पिता और  और ससुर द्वारा अपाहिज बना दिया गया,, दामाद की आगे बढ़ने की क्षमताएं समाप्त कर दी अर्थात आर्थिक रूप से अपाहिज बन गए,,,

क्योंकि अब तो सूरज जी भी आर्थिक मदद देने में सक्षम नहीं है। क्योंकि उनके ऊपर भी बहुत सारी जिम्मेदारियां है। अभी दो बेटों को पढ़ाना और उनकी शादी भी करनी है। बड़े बेटे पर अपने परिवार की जिम्मेदारियां हैं बच्चे हैं। तो यह संभव नहीं हो पाता,,,

वही सूरज जी का बेटा,,  राम जिसे कभी भी आर्थिक मदद या किसी तरह का सहयोग नहीं किया गया हमेशा उससे अपनी और अपनी बेटी की आर्थिक जरूरतों को पूरा करवाया बेटे से लेते बेटी की आवश्यकता  पूर्ति कर देते हैं बहू को भी बुरा लगता कि इस घर में यह किस तरह का रीति रिवाज है क्योंकि उसने अपने परिवार में कभी इस तरह की चीजों को नहीं देखा था बेटियों को बेटों के बराबर हक जरूर दिए गए थे लेकिन इस तरह का रिवाज तो बिल्कुल भी ना था

 सूरज जी की बहू के पिता बड़े स्पष्ट वादी थे जिन्होंने बेटीकी शादी में कोई कसर नहीं छोड़ी ऐसा कुछ नहीं बचा जो अपनी बेटी को ना दिया हो लेकिन सारी जिंदगी या यूं कहिए आवश्यकताओं की पूर्ति करना कभी भी उचित नहीं समझा और उनकी बेटी भी बहुत स्वाभिमानी थी 




और बड़े गर्व से कहते कमाने वाला लड़का  है एक से एक अच्छे कपड़े पहनो ब्रांडेड पहनो जो अच्छा लगे वैसा पहनो हमारी बेटी को भी पहनाओ मेरा दिमाद तो बहुत कमाने वाला है  सब अपने अरमान पूरे करोऔर सूरज जी का बेटा भी कभी भी किसी से उम्मीद नहीं करता हमेशा पत्नी से कहता बहुत कमाता हूं कहता ,,, मुझे किसी की जरूरत नहीं है हमेशा देना ही सीखा था जो है उसी में खुश किसी से लेना स्वाभिमान के विरुद्ध था

 बहू को भी मायके से कभी भी कुछ लेना अच्छा नहीं लगा इसलिए सूरज जी के बेटे ने तो खूब उन्नति की और आगे बढ़ गया 

लेकिन वही सूरज जी का दामाद आर्थिक सहारे की बैसाखी से चलने की आदत की वजह से अपाहिज बन गया,,,,, सूरज जी का बेटा आत्मनिर्भर बन गया,,,,

यहां सिर्फ यह कहना चाहती हूं चाहे बहू हो बेटा हो बेटी हो दामाद हो कोई भी हो उसको इतना सहारा मत दो कि वह अपनी जिंदगी में कुछ भी ना कर पाए और उसे ऐसा लगे मुझे क्या करने की जरूरत है सब तो अपने आप हो रहा है तो ऐसी आदत ना बनने दे

 बच्चों पर जिम्मेदारियां जरूर डालनी चाहिए जिससे वह आगे बढ़ सके सके और अपने परिवार का भरण पोषण अच्छे से कर सके किसी प्रकार की कोई परेशानी ना आए आर्थिक रूप से सक्षम बने 

यहां मैं यह भी नहीं कहती कि बिल्कुल भी मदद ना करें बस सहारा यह देख कर देना चाहिए सहारे लेने वाले की प्रवृत्ति क्या है

 कहीं वह आपसे सहारा लेकर नकारा तो नहीं बन रहा कहीं आप उसे सहारा देकर उसकी उन्नति की राह में बाधक तो नहीं बन रहे

 सहारा लेने वाले को हमेशा सहारा लेने की आदत बन जाती है जो सहारा देता है वह आर्थिक रूप से खोखला हो जाता है और उसके किए का कहीं लेखा-जोखा नहीं होता है। सहारा लेने वाला सहारे का पात्र होना चाहिए

सहारा देकर किसी को नकारा नहीं बनाना उसकी प्रवृत्ति का ध्यान रखें कहीं वह लालची तो नहीं,,, सहारा देने की वजह से कहीं अपने परिवार को तो खोकला नहीं कर रहे,,,, सहारा जरूर दें लेकिन किसी को सहारे की आदत ना लगाएं,,,,

मंजू तिवारी गुड़गांव

#सहारा

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