रिक्त स्थान (भाग 5) – गरिमा जैन

रेखा की नींद सुबह 5:00 बजे ही खुल जाती है ।उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह आज क्या पहनेगी ।इतनी उलझन तो उसे कभी नहीं हुई ।आज तो उसे हल्का सा मेकअप लगाने का भी मन था और उसने अपनी मम्मी से उनका फेवरेट परफ्यूम भी मांगा था ।उसका मन कर रहा था कि वह आज कितने जतन से तैयार हो पर उसके यह सारे जतन क्या ऑफिस जाने के थे या फिर जितेंद्र से मिलने के। जितेंद्र के सामने व कुछ अलग दिखना चाहती थी ।

पिछले दो बार जब भी जितेंद्र से उसकी मुलाकात हुई वह अस्त-व्यस्त ही थी। पहली बार तो वह इतने गुस्से में गई थी और दूसरी बार तो उसने सुबह सवेरे घर के कपड़े ही पहने थे। जितेंद्र क्या सोचता होगा कि यह लड़की बिल्कुल झल्ली सी है। इतने कपड़े देखने के बाद भी रेखा को कुछ समझ नहीं आ रहा था। फिर उसने एक सफेद रंग की लेस की शर्ट निकाली और गहरे नीले रंग की जींस। उस पर मेल खाता हुआ नीले रंग का स्कार्फ लिया ।

बालों को ऊंची पोनी में बांधा और हल्का सा मेकअप किया। हल्की गुलाबी रंग की लिपस्टिक में उसकी मुस्कान और सुंदर लग रही थी ।वह जाने के लिए समय से शायद पहले ही तैयार हो गई और दरवाजे की घंटी बजी। वह लगभग दौड़ते हुए दरवाजा खोलने के लिए गई। उसे पूरा यकीन था कि जितेंद्र ही होगा।

दरवाजा खुला तो जितेंद्र तो नहीं था शायद उसका ड्राइवर आया था ।बोला आप रेखा मैडम है ना साहब ने भेजा है वह अचानक उन्हें कोई जरूरी काम आ गया इसलिए वह नहीं आ पाए। चलिए मैं आपको ऑफिस तक छोड़ देता हूं। रेखा का खिलता हुआ सा चेहरा मुरझा गया ।वह कितने जतन से आज तैयार हुई थी।




उदास मन से वह गाड़ी में बैठ गई और लगभग 10-15 मिनट के अंदर ही उस ऊंची बिल्डिंग के नीचे खड़ी थी जहां पर मेडिसन कम्युनिकेशन का ऑफिस था। ऑफिस बीसवे माले पर था । रेखा की दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी । जितेंद्र साथ होता तो उसे संबल देता । रूपा भी उसके साथ नहीं आई ।उसने कहा की रेखा को वहां अकेले ही जाना चाहिए ।बीसवें माले पर पहुंचते-पहुंचते रेखा बहुत घबरा चुकी थी।

अंदर रजिस्ट्रेशन काउंटर पर उसने चौहान साहब के बारे में पूछा । रिसेप्शन पर बैठी खूबसूरत सी लड़की ने चौहान साहब के केबिन का पता दिया। रेखा चलती जा रही थी। उसे लग रहा था जैसे वह कुछ बोल ही नहीं पाएगी। जैसे उसके कदम उस का साथ देना ही छोड़ देंगे ।तभी चौहान साहब का केबिन आ गया । जब रेखा अंदर गई तो कुछ ही मिनटों में उसकी  सारी परेशानी खत्म हो चुकी थी।

चौहान साहब एक अधेड़ उम्र के आदमी थे और बहुत ही खुश मिजाज हंसने बोलने वाले। रेखा उनके साथ बहुत जल्दी घुल मिल गई ।उसे ऐसा लगा ही नहीं कि वह इतने बड़े ऑफिस में अपने बॉस से बात कर रही है ।वह तो बिल्कुल दोस्तों की तरह व्यवहार कर रहे थे ।वह रेखा से कहते हैं हम यहां किसी को सर या मैडम नहीं बोलते सब लोग  नाम से ही  पुकारते हैं। मेरा नाम समीर चौहान है। तुम मुझे समीर कह कर ही बुलाओगी। 

यहां कोई किसी का बॉस नहीं और कोई किसी का नौकर नहीं ।हम सब आपस में दोस्तों की तरह व्यवहार करते हैं। रेखा को समीर की यह बात बहुत अच्छी लगी। वह उनके साथ एक बड़े हॉल में गई जहां पर एक जरूरी मीटिंग होनी थी ।वहां पर रेखा को कई बातें समझाई गई कि उसे कॉन्ट्रैक्ट में बंधने के बाद किन किन नियमों का पालन करना होगा।

उसे कॉन्ट्रैक्ट की पूरी फाइल दी गई और उसे 24 घंटे का वक्त दिया गया ।वह आराम से कॉन्ट्रैक्ट को घर जाकर पहले  समझ ले तभी  उस पर हस्ताक्षर करें। रेखा बहुत खुश थी। उसने सब के साथ कॉफी पी। तीन चार घंटे कहां बीत गए  पता ही नहीं चला।




तभी बाहर बहुत काले काले बादल घिर आए थे ।सुबह इतनी उमस भरी गर्मी जो थी। दो बजे तक बहुत तेज पानी बरसने लगा ।इतनी तेज बारिश में वह घर कैसे जाएगी वह सोचने लगी। लेकिन उसने समीर चौहान से कुछ नहीं कहा। वह क्या सोचेंगे कि रेखा कितने डरपोक किस्म की लड़की है ।उसे घर तक जाने के लिए किसी के साथ की जरूरत है ।रेखा ऊंची बिल्डिंग के नीचे खड़ी थी उसे जितेंद्र का ख्याल आ रहा था ।

काश कहीं से जितेंद्र आ जाता तो कितना अच्छा होता ।फिर उसने कैब बुक करने के लिए अपना फोन निकाला तभी पीछे से किसी ने उसकी पीठ पर हाथ रखा। वह चौक गई ।पीछे पलट के देखा तो काले पैंट शर्ट में एक लड़की वहां खड़ी थी। उसके पास छाता था उसने रेखा से कहा चलो मैं तुम्हें ड्रॉप कर देती हूं।

तुम्हारा घर कहा है? रेखा  उसे जानती नहीं थी । उसने कहा तुम जितेंद्र की दोस्त हो ना। मुझे जितेंद्र का फोन आया था। चलो मैं तुम्हें ड्रॉप कर दूंगी। रेखा असमंजस में पड़ गई। जितेंद्र उसके बारे में इतना क्यों सोचता है ।वह लड़की कौन थी! थोड़ी देर में वे दोनो ऑफिस के पार्किंग लॉट में थे ।उस लड़की का नाम पूनम था। पूनम बहुत खुशमिजाज हंसने बोलने वाली लड़की थी ।रेखा उसके साथ बहुत देर तक असहज महसूस नहीं कर पाई ।

वह जितेंद्र के बारे में रेखा को कई बातें बताती है ।पता है रेखा पहले मैं और जितेंद्र एक साथ ऑफिस में काम करते थे। स्वाति भी तो वही काम करती थी ना हमारे साथ ।स्वाति को तुम जानती हो ना। जितेंद्र की पहली पत्नी। रेखा स्वाति का नाम सुनकर अचरज में पड़ गई ।स्वाति के बारे में वह बहुत कुछ जानना चाहती थी लेकिन कभी उसे किसी से कुछ पूछने का मौका नहीं मिला था। पता है रेखा हम तीनों की बहुत अच्छी कंपनी थी ।

मैं ,जितेंद्र और स्वाति खूब घूमते फिरते थे। बहुत मजाक करते थे। लेकिन रेखा सच कहते हैं ना हमारी दोस्ती को किसी की नजर लग गई, कहते हुए जैसे पूनम की आंखों से आंसू छलक आए. खैर छोड़ो तुम बताओ तुम्हारा पहला दिन कैसा गया ऑफिस में. मैं तुम्हारे ऑफिस के नीचे वाले ऑफिस में काम करती हूं । मैं इंश्योरेंस कंपनी में हूं। जितेंद्र बहुत बिजी हो गया है आज। बहुत इंपॉर्टेंट मीटिंग है उसकी। अगर यह मीटिंग सक्सेसफुल रही तो जितेंद्र के बिजनेस को एक नई आशा की किरण दिखाई देगी ।उसकी इतने महीनों की मेहनत रंग लाएगी। रेखा तुम भी उसके लिए दुआ करना ,उसे दुआओं की बहुत जरूरत है ।

रेखा मन ही मन सोचने लगती है सच में वह तो हमेशा यही सोचती थी कि जो अमीर लोग होते हैं, बड़े-बड़े हवेलियों में रहने वाले, कोठियों में रहने वाले उनके जीवन में दुख का अंश भी नहीं होता होगा ।वह हमेशा खुश रहते होंगे। उनके पास पैसे जो है ।लेकिन सच उनके जीवन में भी कितना दुख है कितनी तकलीफ है कितनी चुनौतियां हैं ।वह मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करती है कि जितेंद्र अपने जीवन के हर इम्तिहान में सफलता पाए।

तभी अचानक पूनम सड़क के किनारे गाड़ी रोक लेती है ।रेखा भुट्टा खाएगी !बहुत मजा आएगा । जब हम तीनों एक साथ घूमते थे ना ,मैं स्वाति और जितेंद्र और पानी बरसता था तब हम सड़क के किनारे रुक भुट्टा  जरूर खाते थे ।रेखा हंसने लगती है ।बरसात में भुट्टा खाना उसे भी बहुत अच्छा लगता था लेकिन कैसे बताएं कि वह जब भी भुट्टा सड़क किनारे खाती थी तो वह पानी से गीला हो जाता था ।गाड़ी में बैठकर खाने को कभी मिला ही नहीं था। लकड़ी की सौंधी सुगंध मन को गुदगुदाने लगती है। कितनी अच्छी खुशबू थी।तभी उसे रजनीगंधा के फूलों की सुगंध याद आ जाती है जो उसके घर में ,उसके अलमारियों में ,उसके कपड़ों में भर चुकी थी जितेन की खुशबू जैसे उसके जीवन में सराबोर हो चुकी थी….

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गरिमा जैन

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