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“मायके की रानी” हूं मैं!! – मीनू झा 

ईश्वर भी जाने क्यों हम औरतों को ही ऐसे ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करता है कि हमारे आगे इतने आडे तिरछे रास्ते होते हैं कि उनकी भूल भुलैया में उलझ हम मंजिल की राह ही बिसरा बैठते हैं…आज उसी मोड़ पर तो खड़ी है वो और बिल्कुल समझ नहीं आ रहा कि क्या करें…किससे सलाह लें..किससे अपनी परेशानी बांटें…।

बहू… कहां हो ?? नीचे आना जरा—सासु मां की आवाज आई तो रेवती ने अपनी सोच को विश्राम देकर नीचे का रूख किया…।

जी मांजी…कुछ कहा आपने??

अभी फिर भाभी का फोन आया था..वो कह रही थी कि लड़के वालों ने पूछवाया है कि तारीख तय करने कब आएं..तुम्हारी बात हुई अपने भाई से??

बात तो उसी दिन हुई थी मांजी…पर भाई से नहीं भाभी से..उसने तो कहा था कि वो रंजन को बता देंगी..

तू खुद क्यों नहीं बात कर लेती बहू…देख सबकुछ जितनी जल्दी साफ हो जाए बेहतर..वरना हमें और भी रास्ते ढूंढने होंगे ना??

दरअसल रेवती की ननद की शादी तय हुई थी..रेवती के पति मोहित की पार्टनरशिप में एक कंस्ट्रक्शन कंपनी थी हर तरह की सुख संपन्नता थी घर में, कोई तकलीफ़ नहीं थी,.पर पार्टनरशिप पर चल रहे बिजनेस से अचानक अगले पार्टनर ने हाथ खींच लिया..अब सारे प्रोजेक्ट मोहित पर ही आ गए तो उसके आगे बड़ा आर्थिक संकट पैदा हो गया था..एक तो हाथ के काम को तय समय में पूरा भी करना था दूसरे सामने बहन की शादी भी थी जिसके लिए लड़के वालों की तरफ से भी जल्द शादी करने का दवाब बन रहा था…।

अब ये एक बड़ा संकट था,बाजार की अपनी साख पर बहुत इंतजाम तो कर लिया था मोहित ने पर फिर भी पैसे कम पड़ रहे थे..तो सबको ध्यान आया तीन साल पहले पिताजी ने गुजरने से पहले एक प्लाॅट के कागजात रेवती को थमाए थे भाई और भाभी के सामने ये कहते हुए कि ..  




बेटा ये प्लाॅट तुम्हारे जन्म के समय हमने तुम्हारे लिए ही खरीदा था..पर ना पढ़ाई लिखाई में और ना शादी के वक्त हमें इसकी जरूरत पड़ी..पर ये तुम्हारी अमानत है तुम रख लो कभी जरूरत आन पड़ी तो तुम्हारे काम आएगी.

पर भगवान का दिया सबकुछ था रेवती के पास तो उसने उस जमीन को भाई का हक समझते हुए वो पेपर अपने भाई को ही थमा दिया और कह भी दिया–

ये तुम्हारी संपत्ति है रंजन…मेरा इसपर कोई हक नहीं!!

पर दीदी ये तो मम्मी पापा का आशीर्वाद था तुम्हें उनका आशीर्वाद तो हमेशा मेरे सर पर है पगले..जमीन जायदाद आशीर्वाद थोड़े ही होते हैं भला।—मां के कम उम्र में गुजर जाने के बाद मां की ही तरह तो संभाला था उसने रंजन को तो बातचीत में मां वाला पुट आना स्वाभाविक था।रंजन नौकरीपेशा था और उसकी बहुत आमदनी नहीं थी इससे भी अनजान नहीं थी रेवती।

प्लाॅट वाली बात उसके ससुराल में भी सबको पता थी,तो आज जब मोहित को जरूरत आन पड़ी तो एक ओर से सब कहने लगे..कि भाई से वो पेपर लेकर अभी वो संपत्ति बेच कर काम चला लो..मन ना माने तो बाद में स्थिति संभल जाने के बाद वो पैसे भाई को वापस दे देना.. 

पंद्रह दिन तो रेवती के सकुचाहट में ही निकल गए,ये बात सही है कि भाई का घर तो पहले से  है ही तो वो उस प्लाॅट पर घर नहीं बनाएगा..आज ना कल वो प्लाॅट बिकना ही है…पर जो दे दिया वो मांगना सही होगा क्या?? क्या इज्जत रह जाएगी उसकी भाई भाभी की नजरों में?? वो भी जब पेपर उसके नाम कर चुकी है ।




पर कहीं ना कहीं परिवार के दवाब और मोहित की परेशानियों ने उसे मजबूर कर दिया कि वो भाई से इस बाबत बात करें..पर उस दिन भाई घर पर फोन छोड़कर कहीं गया था तो भाभी से बात हुई थी और उससे कह दिया था रेवती ने कि रंजन आए तो उससे उसकी बात करवा दें..पर अब तक भाई का फोन नहीं आया था।तरह तरह के ख्याल आ रहे थे रेवती के मन में…रंजन बुरा तो नहीं मान गया,भाभी और वो नाराज़ तो नहीं हो गए…।अपने बच्चे की पाला है उस भाई को और आज परिस्थितियों की कड़ी धूप ने उसे और उसकी ममता को झुलसने छोड़ दिया है…पता नहीं क्या होगा?

एक बार फिर से फोनकर लो ना रंजन को रेवती–शाम ढलने को थी,आज समय से पहले घर वापस आया मोहित रेवती से कह ही रहा था कि तभी गेट खुला।

 रंजन उसकी पत्नी और दो साल की बेटी आए थे।

अरे.. रंजन,भाभी,गुड़िया…फोन तो कर देते ये ले आते स्टेशन से..

क्यों दीदू..बेकार जीजू को क्या परेशान करता चला आए हमलोग खुद..वैसे भी मुझे तुम्हें सरप्राइज़ देना था ना

चलो इतनी दूर से आए हो हाथ पैर धो लो मैं चाय बनाती हूं

अरे बैठो तो सही दीदी…चाय पानी तो बाद में पीएंगे पहले बात तो सलटा लें

रेवती का दिल जोरों से धड़क उठा…पैसे के चक्कर में कहीं भाई बहन का संबंध ना खराब हो जाए..।




रंजन ने बैग से एक फाइल निकाला और उससे चेकबुक और पासबुक निकाल कर रेवती की ओर बढ़ा दिया..।

ये लो दीदी…तुमने जब वो प्लाॅट मेरे नाम किया था तभी मैंने उसे बेचकर उन पैसों को बैंक में रखवा दिया था क्योंकि उस समय उसके बहुत अच्छे दाम मिल रहे थे… वो प्लाॅट तुम्हारी अमानत थी..सोच रखा था बच्चों की पढ़ाई लिखाई,शादी ब्याह या किसी तरह की आर्थिक परेशानी आई तो ये पैसे आपके काम आ जाएंगे…या मुझे जरूरत पड़ी तो कर्ज समझकर ले लूंगा फिर उसमें पैसे पूरा कर दूंगा…और देखिए मेरा निर्णय सही रहा अभी आपको अचानक से जरूरत आ पड़ी तो अभी तो प्लाॅट औने पौने दाम पर बेचना पड़ता ना..

भाई…तुमने इतना कुछ–रेवती के मुंह से भावनाओं के अतिरेक में आवाज नहीं निकल रही थी।

दीदी… मैंने तो कुछ किया ही नहीं,आपकी चीज आपको वापस की है…मेरे पास तो कोई सेविंग अभी है ही नहीं,होती तो उससे भी आपकी मदद कर पाता मैं इसका बड़ा अफसोस है मुझे…मायका होता किस दिन की खातिर है–रंजन के स्वर से अफसोस झलक रहा था

हां दीदी..उस दिन से ये भी कोशिश में लगे थे कि थोड़ा बहुत इंतजाम अपनी तरफ से भी कर पाएं पर हो नहीं हो पाया…ये कहते हैं कि एक तो ऐसे भी बड़ी बहन मां की तरह होती है पर दीदी ने तो सचमुच मां बनकर मुझे पाला है..पर मैं उनके लिए कुछ नहीं कर पा रहा.. बेटियों के लिए मायका बहुत बड़ा सहारा होता है…और उन्हें हमेशा ऐसा लगना चाहिए कि वो अपने मायके की रानी हैं.. जहां उनकी हर ख्वाहिश हर अरमान और हर जरूरत पूरी हो पाए…शादी के पहले भी और बाद में भी…निराशा नहीं मिलनी चाहिए मायके से बेटियों को कभी..हम अपनी तरफ से तो कुछ नहीं कर पाए पर लगा आपके साथ आकर खड़े भी हो जाएंगे तो आपको अच्छा लगेगा—भाभी ने कहा।

आपने जो किया जितना किया बहुत है रंजन जी…और इतने से मेरा काम भी आसानी से हो जाएगा आप बेकार दिल पर बोझ ना रखें—मोहित ने रंजन को आश्वस्त किया तो उसके चेहरे पर राहत के भाव आए।

चाय और नाश्ता बना रही रेवती सोच रही थी सच कहा भाभी ने बेटियां मायके की रानियां होती है…मायका पैसों से ना भी सक्षम हो तो क्या अगर परेशानियों में साथ भी खड़ा हो जाता है तो मानसिक संबल और संतुष्टि देता है..।जैसे रंजन को देखकर ही वो उत्साह से भर उठी थी और पल भर को तो अपनी सारी परेशानी ही भूल गई थी।सच है परिस्थितियों की कड़ी धूप के बाद भाई का आने और सब संभाल देने का सुखद एहसास घनी छांव सी राहतदायी है…।

खैर,आज जैसे उसकी जरूरत पूरी हुई कल को उसकी भतीजी की भी जरूरतें पूरी होनी चाहिए…।

जब मोहित का काम संभल जाएगा तो वो एक अच्छी खासी रकम अपनी भतीजी के नाम से फिक्स करवा देगी..ताकि उसे भी जब जैसी जरूरत पड़े रंजन और भाभी को सोचना ना हो…और उसकी भतीजी भी उसी की तरह अपने “मायके की रानी” बनी रहे…।

#कभी धूप तो कभी छांव 

मीनू झा 

 

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