मायके की बेटी अब ससुराल की बहू है!! – मीनू झा 

उसे याद है कभी कोई कहता कि लड़की के गले में मंगलसूत्र और मांग में सिंदूर पड़ने की देर होती है..फिर तो‌ वो अपने ससुराल की ही होकर रह जाती है..तब वो कहती..मैं तो ऐसी नहीं हूं भाई..ऐसा वो‌ लड़कियां करती होगी जिन्हें अपने मायके से उतना प्यार दुलार नही मिला होता..क्यों भला ऐसा करेगी कोई लड़की??

पर आज उस स्थिति से गुजरने के बाद उसे एहसास हो गया था कि सच में ऐसा होता होगा और उसके साथ भी हुआ है–पति को ऑफिस भेजकर अकेली चाय की चुस्कियां लेती सोचे जा रही थी निकिता।

भाई की शादी की शाॅपिंग के लिए बुलाया था मम्मा ने…शादी को तो एक महीने बांकी है पर मम्मा चाहती थी कि उसके शादी की तरह लास्ट दिन तक शाॅपिंग ना चले तो पहले ही सब अरेंज हो जाए..।

मम्मा…मेरी सास और ननद को गिफ्ट करने के लिए ये साड़ियां ले लो,बड़ी प्यारी साड़ियां है …आपने जो शादी और विदाई में गिफ्ट दी थी ना साड़ियां वो लोग बहुत चाव से डालती है—खूबसूरत सी साड़ियों के गट्ठर की ओर इशारा करते हुए बोली निकिता

 

निक्की… देख पहले ही बहुत मंहगी मंहगी साड़ियां दे चुकी हूं तेरी सास और ननद को..इस बार हजार दो हजार में निपटाने का सोचा है..वैसे भी कौन सा हमने तेरे भाई का दहेज लिया है..अपनी पाॅकेट से कितना करेंगे भला..कम में ही निबटाना है सब।

चाहकर भी निकिता बोल नहीं पाई कि फिर वैसी साड़ियां देने की भी क्या जरूरत जो उनके काम की ही ना हो..पता नहीं मुंह सिल सा गया..।फिर उसका इंटरेस्ट ही खत्म हो गया साड़ियों का बस मम्मा के पूछने पर हां ना में जवाब देती रही।

वापस आ रही थी तो अपना म्यूजिक सिस्टम देखकर पुराने समय की याद आ गई..अपनी पाॅकेट मनी और रिश्तेदारों से मिलने वाले पैसे जमाकर करके उसने बड़े शौक से ये म्यूजिक सिस्टम खरीदा था।




नीलेश…मेरा ये सिस्टम पैक करवा दें ना… इस बार लेकर जाऊंगी..बीते दिनों की यादें हैं इससे जुड़ी

क्या दीदी..आपके घर तो इतना बड़ा सिस्टम पहले से है और इस पुराने से सिस्टम पर आप गाना सुनने से तो रहीं.. यहां तो कभी कभी पापा और मम्मा भजन कीर्तन सुन लेते हैं इसपर…आपके पास तो बेकार ही पड़ा रहेगा,रहने दीजिए ना क्यों ले जाएंगी

अपने पैसे से खरीदे होने के बाद भी निकिता उसपर अधिकार ना जमा सकी और भाई के साफ इनकार के बाद उससे कुछ बोल भी नहीं पाई।

पिता के कड़े स्वभाव से घर में सभी डरते थे एक वहीं उनकी मुंहलगी थी..जो अपनी बात उनतक रख सकती थी और वो भी अपनी बात उसी से कहते थे।

विशाल ने अपनी पढ़ाई जारी तो रखी है ना निकिता…या सिर्फ शादी के वक्त के लिए थी वो बड़ी बड़ी बातें ,मेरा ये सपना है, मैं ये कर लूंगा, मैं वो कर लूंगा??–पापा ने अपने उसी चिरपरिचित कड़े लहजे में पूछा।

 

दरअसल विशाल एक अच्छी सरकारी नौकरी तो कर रहा था पर उसका सपना प्रशासनिक सेवा में जाने का था जिसकी चर्चा वो अक्सर करता था और वो उस सपने के प्रति समर्पित भी था…आफिस के बाद देर रात जागकर पढ़ाई किया करता था। निकिता अपने पति की मेहनत और लगन देख रही थी…शायद इसीलिए कभी पापा के सुर में सुर मिलाकर सबकी खिंचाई करने वाली निकिता को जाने क्यों पापा की ये बात चुभ सी गई।




बहुत मेहनत करते हैं…पर किस्मत का भी तो साथ होना जरूरी है–सामने से इतना ही कह पाई निकिता।

बमुश्किल छह महीने ही तो हुए हैं उसकी शादी को और अब वहां का सबकुछ पराया पराया सा लगने लगा है…कल को भाभी आ जाएगी तो सब और बदल जाएगा तब तो शायद खानापूर्ति के लिए ही जा पाएगी वो..।

वो जानती है मम्मी,पापा भाई किसी का मकसद उसे ठेस पहुंचाना नहीं था..वो तो पहले भी ऐसे बोलते थे और तब बात बुरी लगने पर वो उनसे लड़ पड़ती थी…पर अब..अब तो जुबां दिल में उमड़ रही बातों का साथ ही नहीं देती…ये बदलाव सिंदूर और मंगलसूत्र का है या फिर उसके जरूरत से ज्यादा मंथन का ??

शादी के मंत्रोच्चार और वचन ही शायद हर लड़की की प्राथमिकता और जिम्मेदारियों का क्षेत्र बदल देते हैं…अगर ऐसा ना होता तो कोई लड़की अपने माता पिता अपना मायका छोड़कर रह ही नहीं पाती….शादी के बाद की जिम्मेदारी, प्यार, समर्पण और अपनापन ही तो मायके की बेटी को ससुराल की बहू बना देते हैं….और घर के साथ साथ दिलों दिमाग भी बदल जाते हैं..।

 

कूकर की सीटी से उसकी तंद्रा भंग हुई और ध्यान आया..

आज लंच में विशाल छुट्टी लेकर किसी दोस्त को लेकर आ रहे हैं साथ पढ़ाई करने के लिए…शादी से पहले उसे दोपहर की नींद कितनी प्यारी थी और उस समय किसी का आना उसे नागवार गुजरता था..पर विशाल ने कहा तो उसे ध्यान तक भी नहीं आया कि उसकी पूरी दोपहर खाना खिलाने,फिर आधे आधे घंटे पर चाय काॅफी बनाने में निकल जाएगी…सच कहते थे लोग..शादी के बाद लड़की ससुराल की ही हो जाती है….वक्त ने उसे बेटी से बहू कब बना दिया वो तो खुद नहीं जान पाई..—चाय की अंतिम चुस्की के साथ मुस्कुराती निकिता किचन की ओर चल दी…। 

#वक्त 

मीनू झा 

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