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“इज्जत इंसान की नहीं पैसे की होती है” – अनु अग्रवाल 

लक्ष्मी निवास में आज सुबह से ही चहल-पहल थी….हो भी क्यों न…. आखिर…घर के इकलौते वारिस चिराग की शादी की तैयारियां जो चल रहीं थीं……….घर मेहमानों से भर चुका था….आज हल्दी का कार्यक्रम था।

 

तभी कामिनी जी(चिराग की  माँ) ने सबकी नज़रों से बचकर अपनी भाभी नम्रता को कमरे में चलने का इशारा किया….

 

“भाभी……..ये साड़ी कैसी लग रही है आपको…..अगर आपको पसंद न हो तो दूसरी देख लो अभी……सबसे पहले आप को ही पसंद करवा रही हूँ”- कामिनी

 

नम्रता- अरे…..जिज्जी जे साड़ी तो बहुत ही हल्के रंग की है…कोई चटक रंग की साड़ी देना मुझे।

 

हाँ…तभी तो तुम्हें लेकर आयी हूँ…कर लो पसंद जल्दी से…कोई आ न जाये बुलाने….सब मेहमान आ चुके हैं- कामिनी फुसफुसा के कहने लगी।

 

“जिज्जी जे नाइन को देने के लिए रखी है क्या….बहुत ही  बुरी सी लागे है न तो रंग ही अच्छा है और न ही डिजाइन ही कोई खास है- नम्रता ने साड़ी को उलट पुलट करके देखते हुए कहा।

 



“नहीं तो….कामवाली….नाइन….रोटी वाली इन सबकी साड़ियां तो अलग से रख दी हैं… इनमें तो बहन-बेटियों और रिश्तेदारों के ही कपड़े हैं….जे साड़ी हमारी छोटी ननद के लिए है…..पापड़ बनाती हैं घर पर और जीजाजी बेचते हैं दुकान पर।

 

जब भी आती हैं बस वो ही 2-4 साड़ियों पर प्रेस करके पहन आती हैं…आज की साड़ी देखी…लगता है अपने ब्याह के समय की पहन रखी है…कोई फैशन थोड़े ही है इन साड़ियों का अब …दोनों नन्द भाभी खिल्ली उड़ा के हँस पड़ीं।

 

दरवाजे पर ननद शारदा जी ने सब सुन लिया…फिर भी मुस्कुराते हुए अंदर आयीं….

 

“भाभी आपकी जरूरत आन पड़ी है बाहर”…

 

उन्हें देख दोनों के चेहरे के रंग उड़ गए…….

 

“आ….आप कब आयीं दीदी?- कामिनी ने झेंप मिटाते हुए कहा।

 

बस अभी जब आप लोग हँस रही थीं….

 

बात बीच में ही काटकर कामिनी जी चलो…चलो चलते हैं बाहर सब मेहमान क्या सोचेंगे….

 

शारदा जी के लिए ये कोई नयी बात नहीं थी……उनकी आर्थिक स्तिथि या यूँ कहूँ कि उनका वक्त अच्छा न होने के कारण मायके में ऐसा व्यवहार उनके लिए आम बात थी…..

 

कोई भी कार्यक्रम में कामिनी उसके और उसके दोनों बच्चों के साथ ऐसा ही व्यवहार करती….लेकिन वो कहते हैं न कि बेटी को मायके का मोह मरते दम तक रहता है….अपमान का घूंट पीकर रह जाती हर बार शारदा जी……क्योंकि वो नहीं चाहती थीं कि…… जीते जी मायके के दरवाजे उनके लिए बन्द हों।



 

पति किशन जी को भी भनक थी इस बात की लेकिन वो भी मजबूर थे…आखिर कर भी क्या सकते थे…..लेकिन हाँ…

शारदा जी को कभी उन्होंने वहां ज्यादा रुकने नहीं दिया…बस समय पर आते और अपने साथ ही ले जाते। रिश्ते निभा रहे थे बस।

 

वक्त अपनी गति से चलता रहा………किशन जी की मेहनत और शारदा जी की प्रार्थनाओं का फल तो मिलना ही था….दोनो बच्चे बड़े ही होनहार निकले…. पढ़ाई पूरी करके किशन जी के दो मजबूत हाथ बन गए थे….सालों पहले शुरू किए किशन और शारदा का छोटा सा पापड़ का व्यापार अब पूरे भारत में फैल चुका था…. कई शहरों में अब उसके आउटलेट थे……एक ब्रांड बन चुका था…”शारदा पापड़” के नाम से बिकते थे उनके पापड़।

 

गाड़ी, बंगला, नौकर-चाकर….समाज में इज़्ज़त…. क्या नहीं था। अब……बड़े बेटे की शादी ऐसी की सबकी आँखें चौंधिया  गयीं……इतना सब कुछ होने के बाद भी तनिक भी घमंड न था शारदा जी को…वैसा ही सरल स्वभाव.. …..सबसे हँस के बात करना।

 



आज चिराग की बेटी की सगाई है…..कामिनी का फ़ोन सुबह ही आ गया…

 

दीदी…जल्दी आ जाना समय से…आपकी पोती की सगाई है…मैं ड्राइवर भेज दूंगी। नयी बहु को भी लेकर आना।

 

हाँ…भाभी आज मेरे पास ड्राइवरों की फौज है तो तुम भेज ही दोगी….पहले तो कभी एक फ़ोन तक न खटखटाया…अपने मन में शारदा जी बुदबुदायिं…..लेकिन फिर…..भाभी ड्राइवर नहीं भेजना हम आ जाएंगे…..कह कर फ़ोन काट दिया।

 

कार्यक्रम से आने के बाद……..

 

“देख रहे थे आप…..जे वही कामिनी है और जे वही चिराग…जो कल तक सीधे मुँह बात तक न करते थे…. आज मेरा वक्त बदला तो कैसे मेरे आगे पीछे मधुमक्खी की तरह भिनभिना रहे थे….इनको क्या लगता है मैं अपमान भूल गयी…नहीं… बिल्कुल नहीं…वो एक एक बात याद है अभी तक मुझे…कैसे हर बात में मुझे नीचा दिखाया जाता था…कैसे सारी रस्में जीजी से करवा दी जाती थीं….खराब से खराब साड़ी मुझे पकड़ा दी जाती थी। 

 

खैर जो भी हो….ज़िन्दगी से मैंने एक सबक तो सीखा है……पैसा बोलता है जी…..इज़्ज़त इंसान की नहीं पैसे की होती है- आँखों में आँसुओं की झड़ी लगाए शारदा जी किशन जी की तसवीर से कहे जा रहीं थीं।

 

किशन जी भी उन्हें एक टक देखे जा रहे थे।

 

आपकी ब्लॉगर दोस्त

 

अनु अग्रवाल।

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