जिम्मेदारी – ज्योति अप्रतिम

आज माँ घोंसला छोड़ कर सदा के लिए उड़ गई।

आँसू रुक नहीं रहे थे और जिंदगी भर का चलचित्र दिलो दिमाग में घूम रहा था।

छह बच्चे ! दो वर्ष से चौदह वर्ष तक के ।

और घर ! घर के नाम पर एक कम चौड़ा लेकिन लम्बा सा कच्चा कमरा जिसे हर थोड़े दिन में गोबर मिट्टी से लीपना होता और दीवाली पर चूने से पुताई।

और उन छह बच्चों की माँ ! पढ़ी लिखी तो नहीं पर निरक्षर भी नहीं थी।पिता बाहर नौकरी करते थे। माँ की सौ प्रतिशत जिम्मेदारी थी गेहूँ ,दाल ,नोन तेल लाना ,भोजन पकाना ,झाड़ू कपड़े, बर्तन, हर बच्चे को स्कूल भेजना ,हारी बीमारी में पास के सरकारी अस्पताल ले जाना, दवा दारू लाना ,रात जागरण ,ठंडे पानी की पट्टी 




और ढेर सारी चिंता !

और हाँ ! अनुशासन का पूरा रखरखाव ।क्या मज़ाल कि एक भी बच्चा अकारण चूं भी कर जाए।

दिन अपनी गति से गुजरते रहे।बच्चे अब चूजों के खोल से निकल कर ऊँची उड़ान भरने लगे थे।

और माँ ! दिन ब दिन उम्रदराज होती जा रही थी

लेकिन उत्साह एक फीसदी कम नहीं।कभी बड़ी बहू की डिलेवरी ,छोटी का ब्याह ,छोटे का इंजीनियरिंग की डिग्री ,पोते का मुंडन ,पोती के जन्मदिन।

और थोड़े दिन बीते। नाती पोते बड़े हो गए ,पढ़ लिख गए और ये लीजिये ,नई जिम्मेदारी नत जमाई ,पोत बहु सब आ गए ।घर भर गया।

लेकिन पति विछोह सहते हुए माँ अब बिस्तर पर आ गई है।

अब सभी चूजे बड़ी ऊँची उड़ान भरते ,शाम पड़े कभी कभार माँ की ओर झाँक कर कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते।

माँ की विचलित आँखें आखिर कब तक इंतजार करतीं ।आखिरकार आज  बन्द 

गई ।

फिर  जन्म लेगी ,घोसला बनाएगी ,चूजों को जन्म देगी और फिर वही सिलसिला।

माँ जो है!

ज्योति अप्रतिम

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