पुत्र ऋण – आरती झा आद्या

फिर से उस घर में शहनाइयां गूंज रही थी और पांच साल का सन्नी उस गहमागहमी को टुकुर टुकुर देख रहा था। उसे तो बस इतना ही पता था कि उसकी मां जो उसे एक साल पहले छोड़कर भगवान के पास चली गई थी, वो दूसरा रूप लेकर फिर से उसके पास आ रही है और मां के पहले रूप से दूसरे रूप को मिलाने के लिए वो सुबह से मां की तस्वीर सीने से चिपकाए घूम रहा था।

दुल्हन आ गई..दुल्हन आ गई का शोर मच उठा। आ आ सन्नी देख तेरी मां आ गई..सन्नी की दादी बोलती हुई आरती की थाल लिए जल्दी जल्दी दरवाजे की ओर बढ़ चली।

अरे ये क्या उसकी मां तो दिप दिप गोरी थी, एकदम चमकीली… पर ये तो मां ऐसी क्यों बन गई। ये भी अच्छी है लेकिन मेरी मां जैसी बिल्कुल नहीं…भोला मन तुलनात्मक अध्यनन कर रहा था। 

ये लो बहू संभालो अपने बेटे को… कब से मां मां कर घूम रहा है…शेफाली की गोद में सन्नी को लगभग ठेलती हुई सास ने कहा था। एक पल के लिए शेफाली सन्नी को देख हिचकी , फिर शेफाली ने  सहमे सन्नी को थाम लिया। अब तक जो सन्नी तुलना में ही अटका था, मां की गोद, मां का स्पर्श, मां का आंचल पाकर सब कुछ भूल गया। अब उसे सिर्फ याद थी तो शेफाली और कुछ नहीं। शेफाली भी दिल से तो नहीं लेकिन सन्नी की देखभाल करने की कोशिश कर रही थी। उसमें शेफाली की भी क्या गलती थी, पहली शादी थी उसकी तो, अन्य लड़कियों की तरह कई अरमान थे उसके भी। लेकिन सारे अरमान, सारी इच्छाऐं यूंही तो रह गई थी। पत्नी बनने से पहले ही मां बन गई थी। अपनी उम्र से अचानक ही बड़ी हो जाना पड़ा था और सन्नी मां की ममता के लिए तरस गया था तो उसे एक पल के लिए भी नहीं छोड़ता था।पति और सास भी सारी जिम्मेदारी उस पर डाल एकदम से मुक्त हो गए थे। फिर भी समय के साथ शेफाली तारतम्य बिठाने की कोशिश कर रही थी। गुजरते समय के साथ शेफाली भी दो बच्चों की मां बन गई थी और अब सन्नी से उसका ध्यान हटने लगा था। दादी भी नहीं रही थी और पिता अपने काम में मस्त रहने लगे थे। अब शेफाली की ममता सिर्फ अपने बच्चों तक सीमित हो कर रह गई थी। जो शेफाली सन्नी को थोड़ा बहुत लाड़ दुलार कर देती थी, अब उस शेफाली को सन्नी फूटी आंख नहीं सुहाता था। कभी कभी तो उसका मन होता इसे हॉस्टल ही भेज दिया जाए। ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी.. लेकिन तीन बच्चे और जरूरत के इतने खर्चे ये तो संभव ही नहीं था। अब शेफाली ने एक तिकड़म निकाल लिया। अगर अपने बच्चों के लिए पिज्जा मंगवाती तो सन्नी को अपने लिए एक समोसा ले आने कहती। जिससे वो सन्नी को कुछ ना देने के अपराधबोध से भी मुक्त हो जाती और उसके बच्चों का हक भी नहीं मारा गया, ये सोच खुश हो जाती। एक दिन खेलते हुए शेफाली का छोटा बेटा गिर गया और शेफाली के पति भी शहर में नहीं थे। बेटे को चोटिल देख शेफाली आपा खो बैठी और सन्नी को मार मार कर अधमरा कर दिया, जब तक उसके अपने बच्चे रोने नहीं लगे तब तक उसने मारना नहीं छोड़ा था। इसी तरह ज्यों ज्यों दिन बीते शेफाली सन्नी के प्रति उग्र होती हो गई और सन्नी के पापा सब कुछ जानते समझते भी अनजान बने रहते। 




मां की चिक चिक से परेशान हो चुका हूं मैं..पापा मुझे हॉस्टल में रहना है। एक दिन शेफाली के खुद के बेटे ने शेफाली से कहा तो शेफाली अवाक ही रह गई। वो कहां चिक चिक करती है। वो तो सिर्फ सचेत रहती है कि उसके बच्चों का हक सन्नी के खाते में न चला जाए। इसीलिए तो उसने सन्नी को बारहवीं के बाद पढ़ने भी नहीं दिया और दुकान पर बिठा दिया और आज अपना बेटा उससे परेशान है। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। सिर पकड़ कर बैठ गई थी वो।

चिंता मत करो मां.. मैं हूं ना तुम्हारे पास..विवेक भी कुछ दिन में पढ़ कर आ ही जाएगा..सन्नी शेफाली से कहता है।

मुझे माफी दे दे बेटा… मैं हमेशा तुझे हर अच्छी चीज से दूर रखती रही , फिर भी तू कभी छोड़ कर नहीं गया। मार खाकर भी मेरे आँचल तले ही आया और मैं निर्मोही तेरे प्यार को नहीं समझ सकी।

तो अब समझ लो मां…बिटिया सुहानी मां के बगल में बैठती मुस्कुरा कर कहती है। सच भैया आपसे बहुत प्यार करते हैं और आप….

इन्हीं मां के गोद में एक अरसे बाद मुझे ममता मिली थी। इनके ही स्पर्श से मां के जिस स्पर्श को मैं भूल गया था, उसका एहसास फिर से हुआ था। उस मां से प्यार नहीं करूंगा तो किससे करूंगा..ये देखो..सन्नी अपना बटुआ खोल कर दिखाता है, जिसमें उसने बहुत करीने से शेफाली की तस्वीर सजा रखी थी… बटुआ दिखाता सन्नी शेफाली के बगल में उसके हाथ पर हाथ रख बैठ गया। 

मुझे माफ कर दे बेटा..शेफाली फफक फफक कर रो पड़ी। 

अरे मां… मातृ ऋण से आज तक क्या कोई मुक्त हो पाया है और तुम तो माफी मांग कर ऋण बढ़ा ही दे रही हो…शेफाली के आंचल से खुद को ढकता हुआ सन्नी उसके जमा हुए अपराधबोध को जो की आंखों से बह चले थे पोछता हुआ कहता है।

जो प्यार जो ममता मुझे तुझ पर लुटानी थी, वो तू मुझ पर लुटा कर मातृ ऋण से मुक्त हो गया मेरे बच्चे। लेकिन एक मां होकर ह्रदय में ममता नहीं रख सकी…मुझ पर हर जिम्मेदारी छोड़ जो गलती मेरे पति और मेरी सास ने किया…वही गलती मैं भी कर बैठी..क्या मुझे ईश्वर कभी माफ कर सकेगा…क्या मैं कभी पुत्र ऋण से मुक्त हो सकूंगी…बैठे बैठे ही शेफाली की गोद में सिर रखे सन्नी के माथे को सहलाती शेफाली सोच रही थी।

आरती झा आद्या

दिल्ली

#पुत्र ऋण

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