एक शिक्षिका के मर्डर की कहानी – सुषमा यादव

,,, मैं जब छिंदवाड़ा से ट्रान्सफर होकर इस नए शहर में आई,तो कुछ दिन वहां के स्कूल के स्टाफ की , लोगों की और उस बेहतरीन शहर की यादों में उदास रही,,पर धीरे धीरे वहां के लोगों में जल्दी ही घुल मिल गई,,

,, हमारे स्कूल में सभी लोग बहुत अच्छे थे,, उनमें से एक शिक्षिका को मैंने देखा,, बहुत ही गंभीर,कम बोलनी वाली,, अपने काम से काम रखने वाली,, हंसते बोलते तो देखा नहीं मैंने,, उनके पति नहीं थे,, बहुत पहले ही किसी बीमारी से खतम हो गये थे, उनके बच्चे भी नहीं थे,,उनका मायका उसी शहर में बहुत ही पास था,, वहां वो आती जाती रहती थी,,

,,, वो नियमित अपनी कक्षा में जाती,, बच्चों को लगन से पढ़ातीं थीं,,पर गुस्से में आकर बहुत मारती थी,,, हममें से किसी को भी उनको रोकने टोकने की हिम्मत ही नहीं होती थी, पता नहीं,कब क्या बोल दें,,

,, मैंने एक दिन अपने कुछ नजदीकी शिक्षिकाओं से पूछा,,ये

इतना वेतन पातीं हैं,, इनके पास तो बहुत पैसा होगा,, फिर,, ये किसको वसीयत की हैं,, किसी को तो की होगीं ,है ना ,, एक शिक्षिका जो उनके थोड़ा करीब थीं, बोली,, हां, मैडम, इन्होंने अपनी बहन के बड़े बेटे को अपनी नामिनी बनाया है,, बैंक में,

अपने पेंशन में,सब जगह उसी का नाम है,, अच्छा,तब तो ठीक है,,

कुछ साल बाद हमारे स्कूल में एक और शिक्षिका आई,, उन्होंने उनके साथ खूब दोस्ती बढ़ाई,, धीरे धीरे दोनों एक दूसरे के घर भी जाने लगीं,, एक दिन उन नई मैडम ने मुझसे कहा,,, मैडम,, इनकी दूसरी शादी कराने की कोशिश करूं क्या,, मैंने कहा, ये तो बहुत बढ़िया बात है,,पर आप ही उन्हें अपने विश्वास में लेकर बात करो और तैयार कराओ,, उन्होंने कई लोगों को दिखाया,पर

उनके रूखे और कड़क व्यवहार के कारण बात नहीं बनी,,

अब सबके समझाने पर वो बहुत ही अच्छे ढंग से रहने लगीं,,नित नए नए जेवर खरीदतीं और बदल बदलकर आतीं,, उन्होंने अपना घर भी बहुत बढ़िया बनवा लिया था,,पर दूर था, अकेला भी था,, कालोनी अभी नई नई शुरू हो रही थी,,


वो बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की थी

,,हर सोमवार, एकादशी,, प्रदोष नव रात्रि,का बहुत ही नियम धर्म से व्रत रखती,, और इन दिनों वो नियम से मंदिर जाती,, और हां कार्तिक मास में भोर में ही स्नान, पूजा पाठ हो जाता,,पूरे माह,,माघ में गंगा स्नान, तो अनिवार्य था ही,,,

एक दिन कुछ कारण वश स्कूल में

जल्दी छुट्टी हो गई थी,, मैं दूसरे दिन स्कूल आई ,तो कक्षा में लड़कियों ने बताया,, मैडम,,उस लड़की से रास्ते में कुछ लोगों ने पूछा,कि , आज़ जल्दी छुट्टी क्यों हो गई तो इसने गुस्से से कहा,, कि, वो मैडम मर गई, इसलिए,, चुंकि स्कूल में सभी बच्चों के साथ

मेरा व्यवहार बहुत अच्छा था, तो बच्चे मुझसे बेझिझक होकर बात करते थे,, मैंने उसको अपने पास बुलाया और कहा,,बेटा, तुमने ऐसा क्यों कहा,, वो रोने लगी, और मुझे अपना हाथ दिखाया,, मुझे कल बहुत जोर से छड़ी से पीटा था,पीठ पर, पैरों पर,सब जगह,,तो मैंने गुस्से में आकर कह दिया,, उसके लाल लाल निशान देख कर मेरी आंखों में भी आंसू आ गए,,, मैंने उसे समझाया और कहा,कि वो तुम्हारी गुरु हैं, अपने गुरु जी के लिए ऐसी बात नहीं कहते,, मैं उन्हें भी समझाऊंगी,, पढ़ने के लिए ही तो मारा है, मां भी तो कभी कभी मारती होगी ना,,,,,,मैं उनके पास आई और कहा कि, मैडम, आपने उसे बहुत मार दिया है, अगर उसके अभिभावक आ गये तो बेकार में एक तमाशा बन जायेगा,, वो गई और उस लड़की को सहलाया, मनाया,, शांत कराया,,

***तब हम सबको ये बिल्कुल ही आभास नहीं हुआ था कि उस लड़की के मुंह से गुस्से में निकली

वो बात कुछ ही दिनों में सच होने वाली थी,,

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एक दिन मुझे किसी मैडम ने फोन किया,, यादव मैडम,आप अपने घर में शाम से ही ताला लगा लिया करिए,, और कोई कितना भी जान पहचान वाला हो, खोलना नहीं है,,मैं उस समय अपने दो बुजुर्गों को लेकर रह रही थी,हम तीन के अलावा और कोई नहीं था,, मैंने कहा,पर बात क्या हुई,, ऐसे क्यों बोल रही हो,,जो कुछ मुझे बताया गया,,आप सबको उस दुर्दांत घटना के बारे में बतातीं हूं,,

,,,उस शाम करीब सात बजे एक लूना, उस समय की एक स्कूटी नुमा छोटी सी गाड़ी,,पर सवार होकर उन मैडम की बहन का लड़का अपने एक दोस्त के साथ उनके घर आया, उनकी उम्र शायद बीस साल के लगभग ही रही होगी,, और मैडम की उम्र लगभग पचास के  करीब,या उससे कुछ कम ,मौसी ने खुश होकर दरवाजा खोल दिया,,आओ,बेटा,आओ बैठो,, दोनों बैठ गये,, कुछ देर तक बात चीत चलती रही,, फिर भतीजा बोला,,, मौसी बहुत प्यास लगी है,


हां हां बेटा,अभी लाई,,वो जल्दी से रसोई में गईं और पानी गिलास में भर ही रहीं थीं कि दोनों में आंखों, आंखों ही में कुछ इशारे हुए, और,, पीछे से दोनों ने उन्हें खींचते हुए पलंग पर पटक दिया,, ये सब इतनी जल्दी हुआ कि वो कुछ समझ ही नहीं पाईं,, और दोनों ने तकिए से उनका गला दबाना शुरू किया,, खूब हाथ पैर पटकते, छटपटाते हुए उनका दम निकल गया,,अब जल्दी, जल्दी दोनों ने उनके हाथों से मोटे मोटे सोने के कंगन उतारे , कानों से, गले से भारी भरकर जेवर खींच लिए,, वापस लौट ही रहे थे,कि उस के दोस्त ने मुड़कर देखा, पड़ी हुई निष्चेष्ट तन को,, और भतीजे से मुस्कुराते हुए बोला,तू ,चल बाहर,, थोड़ा पहरा दे,मैं अभी आता हूं,, और वो नराधम, पिशाच,, जंगली जानवरों की तरह उस लाश पर टूट पड़ा,, और अपनी मनमानी करने के बाद दोनों आराम से चले गए,,

,, सुबह जब काम करने वाली बाई आई तो दरवाजा खटखटाया, कोई आवाज नहीं,, उसने दरवाज़े को हाथ लगाया तो वो खुला था, अंदर देखते ही भागी और चिल्लाते हुए बगल‌ वालों को खबर किया,,, उन्होंने स्कूल में और पुलिस को  फोन कर दिया,, स्टाफ के कुछ लोग पहुंच गये थे,

मैं उस समय अस्पताल में भर्ती अपने श्वसुर जी के साथ थी,

,, जैसा कि मुझे बताया गया,, उनके अधोवस्त्र बाहर पड़े थे,,

ये‌ सब देख कर मैडम लोग रोने लगी,, इतना वाहियात नीचता भरा कृत्य,, कमीनें ने एक लाश के साथ, छी छी,थू‌ है‌ ऐसे दुष्ट,पापी पर,,

,,ये सच्ची कहानी उस समय कई पत्रिकाओं, और अखबारों में छपी थी,,,

,, आखिरकार पुलिस ने उन दोनों को जेल भेज दिया, और सब सच उगलवाया,,

,,पर हम सबकी समझ में नहीं आया कि जब वो भतीजा ही  उनकी सब संपत्ति का‌ एक मात्र वारिस था, तो ऐसा घिनौना काम क्यों किया??? क्या जल्दी पैसे और जेवरों के लालच में आकर,, उसने अपने सगे रिश्तों को तार तार कर दिया,,सुन कर ये वारदात तो हम सबका दिल ही दहल गया,, क्या इस कलियुग में अपने ही भरोसे के काबिल नहीं,,

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,,सब‌ स्टाफ को मेरी बहुत ही चिंता रहती थी,, हमेशा रात को मुझे फोन करके आगाह करते रहते,, मैं भी बहुत डर गई थी,, और अभी तक सावधानी रखतीं हूं,,,

,,, कुछ महीने जेल में रह कर दोनों बाहर निकल आए,, मैडम के घर , संपत्ति, पेंशन का वहीं तो आखिर हकदार था,, तो पैसे का खेल निराला मेरे भाई,, पैसा हाथ में, तो सब कुछ अपने वश में मेरे भाई,,

सुषमा यादव, प्रतापगढ़,उ प्र

स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित,,

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