अधिकार छोड़ने का सुख- शुभ्रा बैनर्जी   : Moral stories in hindi

Moral stories in hindi : नौ महीने कोख में बच्चे को रखकर दूसरी मांओं की तरह सुधा भी,दिवाकर जी से हमेशा कहती “तुम पिता हो ना‌,हर समय बच्चों पर अधिकार जताते हैं।मैंने कितनी तकलीफ़ सहकर जन्म दिया है,मेरा अधिकार उन पर तुमसे ज्यादा है।”हर बार दिवाकर जी हंसकर ताना देते”ठीक है भई,मैं अपने अधिकार भी तुम्हें दे दूंगा।

देखना संभालकर रखना अपने अधिकार।”समय बीतने के साथ -साथ सुधा का यह भ्रम भी टूट रहा था कि बच्चों पर मां का अधिकार पिता से ज्यादा होता है। मई -जून की तपती दुपहरी हो,या दिसंबर-जनवरी की कड़कड़ाती सर्दी,एक पिता काम पर जाना कभी नहीं छोड़ता।

बारिश में भीगकर लथपथ जब घर आंतें हैं पिता,तब भी हांथ में बच्चों के लिए कुछ ना कुछ सामान होता है।अपने खून-पसीने से कमाई हुई महीने की तनख्वाह कितनी सहजता से,घर के ख़र्च पूरे करने में लगा देते हैं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही थी,दिवाकर जी बच्चों के भविष्य को लेकर और भी ज्यादा सतर्क रहने लगे थे।

तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई के लिए जमा रहे थे।इस महीने सुधा के हांथों में जब पैसे रखे दिवाकर जी ने,सुधा का पारा चढ़ गया।”ये क्या जी,इतने कम पैसों में घर कैसे चलेगा?दशहरे का त्योहार है,कपड़े लेने हैं।पूजा का सामान लेना है।कैसे चलाऊंगी मैं ?”
“सब हो जाएगा सुधा,बोनस मिल जाएगा पूजा से पहले।तुम सारी खरीदारी तभी कर लेना।”सुधा खीजती रहती पर दिवाकर जी को फर्क ही नहीं पड़ता।बोनस मिलते ही दुकान जाना हुआ था।बच्चों के लिए,सुधा के लिए, माता-पिता के लिए तो तीन -तीन जोड़ी कपड़े खरीद दाएं दिवाकर जी ने,पर अपने लिए हर बार की तरह एक जोड़ी शर्ट -पैंट।इस बार सुधा तैयार बैठी थी।दुकान पर ही‌अपनी साड़ियां वापस करने लगी।दिवाकर जी ने आदतन गुस्से से जैसे ही देखा,बच्चे सुधा को ही समझाने लगे”चलो मम्मी,पापा को गुस्सा क्यों दिलाती है?”
अच्छा तो वह पापा के गुस्से के डर से कुछ ना बोले।
घर आकर मुंह फुलाए काम निपटा रही थी सुधा।रात को अपने कमरे में जाकर दिवाकर जी की तरफ पीठ करके लेट गई।दिवाकर जी सारा माजरा समझ गए थे।प्यार से सुधा का हांथ अपने हांथ में लेकर बोलें”पता है सुधा,मेरे पिताजी एक पैर सेना में खो चुके‌ थे।
नकली पैर के सहारे अपनी घर गृहस्थी चलाई।
मां सिलाई करती थी अपने मायके में,पर पिताजी ने शादी के बाद छुड़वा दिया।हम तीनों भाई -बहनों को राजा की तरह पाला उन्होंने।दशहरे में जो मंहगे जूते वो दिलवाते थे ना,ख़ुद कमाकर भी उतने मंहगे जूते नहीं पहन पाऊंगा मैं।खाने में कभी कमी नहीं की उन्होंने।ख़ुद रफू करा -करा कर मां से एक शर्ट साल भर चला लेते थे।
तब मैं बच्चा था,नहीं समझता था कि उनकी कमाई पर मेरा अधिकार है।आज जब खुद पिता बना हूं ना,तो वहीं आदतें खून के साथ बहती हैं मेरी नसों में।मुझे तो राजकुमारों जैसे पाल लिया मेरे माता-पिता ने।अब मेरी बारी है,कि मैं माता-पिता और बच्चों को जीवन की सारी खुशियां दूं।यही तो कर्तव्य है हर पिता का।”
“और अपनी जरूरतें पूरी करने का अधिकार नहीं है तुम्हारे पास।हम सभी से संवरकर मंदिर-पंडाल जातें हैं।तुम तो बस एक दिन छुट्टी लेते हो,और एक जोड़ी नए कपड़े पहनते हो।मुझे बहुत बुरा लगता है।”सुधा दिवाकर जी के सीने से लगी रहतीं हुई कह रही थी।
“देखो सुधा जब मैं अपने बूढ़े माता-पिता को सज-धज कर पूजा पंडाल में जाते देखता हूं,तुम्हें काली कांजीवरम की मंहगी साड़ी पहने‌ देखता हूं ना,तो असीम शान्ति और सुख मिलता है मुझे।
मेरे दोनों बच्चे कितने स्मार्ट दिखाएं हैं,दादा‌ जी के साथ सज धज कर चलते हुए।तुम लोगों को सजा धजा देखकर मेरा पौरुष संतृप्त हो जाता है।यह मेरा अधिकार है कि तुम सभी को सुख से रखूं।यह मुझसे मत छीनना तुम।”
सुधा निरुत्तर हो गई।अपने कर्तव्य को अपना अधिकार मान लेने वाला केवल पिता ही हो सकता है।अपने जूते बेटे को,अपना रेनकोट बेटे को,कंपनी से मिली घड़ी अपने पिता को,अपनी सबसे प्यारी बिटिया को मनचाहे पैसे देने वाले पिता के चेहरे का संतोष देखकर सुधा आश्चर्य में पड़ जाती।इतना त्याग तो हम मां कभी नहीं कर सकतीं।
कभी ख़ुदा ना खास्ता कुछ कमा भी लिया हो नौकरी करके, तो पहले उसके अहसानों की गाथा सुनाकर पति पर रौब झाड़ने से भी बाज नहीं आती।
दिवाकर जी ने बेटे के शादी लायक होने पर कहा‌ सुधा‌ से”देखो,अब अपने बेटे पर ज्यादा अधिकार जताना छोड़ो,नहीं तो बहुत मुश्किल होगी तुम्हें।” अरे ऐसे कैसे?शादी हो रही है ,बहू आ रही है ,पर मेरा घर है,बेटा मेरा है,कैसे मैं अधिकार छोड़ दूं।इतनी तकलीफ़ झेलकर परिवार बनाया‌ है,अब उस परिवार पर मेरा कोई अधिकार नहीं ,यह कैसी सलाह है।”सुधा जी चिढ़ कर बोलीं।
खैर बेटे-बहू भी आ गए,बेटी की शादी भी हो गई।बेटे की शादी होते ही , तीर्थ पर जाना चाहते थे दिवाकर जी।सुधा नई बहू को गृहस्थी का ककहरा पढ़ाना चाहती थीं।दिवाकर जी अकेले ही‌ चले गए अपने‌ एक रिश्तेदार के साथ।उनके जाने के बाद सुधा‌ शादी में मिले उपहारों की लिस्ट बना रही थीं।बेटी ने अपने भाई-भाभी को हनीमून जाने का टिकट लिफाफे में दिया था।
पर‌ इस दूसरे‌ लिफाफे में क्या है?खोला‌ तो दो एयर टिकट थी चारधाम यात्रा की।दिवाकर जी को याद थी,सुधा की बरसों की इच्छा।पर सुधा‌ने क्या कर दिया।गई ही‌ नहीं पति के साथ।अपने अधिकार के बर्चस्व से निकल‌ ही नहीं पाई वह।
दिवाकर जी को फोन लगाकर माफी मांगना चाहती थी,फोन दिवाकर‌जी ने ही उठाया”क्यों जी, सीधे-सीधे नहीं‌बोल‌सकते थे,फ्लाइट बुक करने की बात।क्या इतना अधिकार‌नहीं मेरा आप पर???
सुधा‌आत्मग्लानि से रो रही थी।दिवाकर जी ने समझाया अगली बार चलेंगे‌ साथ।बेटे की शादी को काफी दिन हो गए थे,अब सुधा को सास के अधिकार भी तो जताने पड़ेंगे।सुबह के नाश्ते,दोपहर के खाने और रात के डिनर में खाना सुधा ही बना रही थी,परोसती थी बहू।दिवाकर जी‌ने समझाया भी कि बच्ची को अपनी गृहस्थी चलाना सीखने दो।
चिढ़ कर कहती सुधा”हां तो मैंने कौन‌ सा‌ हांथ‌पकड़ा‌ है।यह मेरा कर्तव्य है कि बहू को काम काज सिखाऊं पहले ,फिर बैठ जाऊं शांति से।”
दिवाकर जी ने रात को सीधे-सीधे कहा रमा से”तुम अपना कर्तव्य तो कर रही हो,पर एक और बात है जो तुम्हें रसोई नहीं छोड़ने दे रही।तुम्हारा उस रसोई पर अधिकार,अपने बेटे पर अधिकार।इन अधिकारों की बलि वेदी पर अपने रिश्तों की आहुति मत दो सुधा।अधिकारों के प्रति जब तक तुम्हारी लालसा रहेगी,तुम मोह नहीं छोड़ पाओगी।”,
दिवाकर जी की बात सुनकर सुधा रोने लगी।”क्या करूं मैं,बरसों से तुम लोगों को अपने हांथों से बनाकर खाना खिलाया है।रवि को मिर्च तेज पसंद नहीं।रोज़ रात में कुछ मीठा मांगता है।बहू अकेले कर पाएगी कैसे ये सब?सुधा रो रोकर बोलें जा रहीं थीं।तब दिवाकर जी‌ ने समझाया।
ये अधिकार ही अपेक्षा दिलातें हैं और‌ जब अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं,तो हम बच्चों पर उपेक्षा का लांछन लगा देतें हैं।मैंने अपने सारे अधिकार बेटे-बहू और बेटी -दामाद को दे दिया।बस एक तुम पर मेरा पूरा‌अधिकार‌ पहले भी था,अब भी है और‌आगे भी‌रहेगा।बाकी जायदाद , संपत्ति,घर‌,दुकान सब में बराबर बराबर बांट दिया।
अपने अधिकार छोड़कर‌ मैं सुखी महसूस कर‌ रहा‌ हूं।मन स्वच्छ और‌ निष्पाप हो गया‌।अधिकारों से मोह त्यागो सुधा,नहीं तो कलह होगा घर में।अब बच्चों को अपने‌ अधिकार में रखने का समय समाप्त हुआ।यह मान लो कि हमारा वानप्रस्थ आरंभ हुआ।देखना तुम भी सुख पाओगी,अधिकार छोड़कर।
अरे जब अपनी सांसों पर हमारा कोई अधिकार नहीं।जाने कब साथ‌छोड़ दें”””।बस -बस इतनी अपशकुनी बातें ना किया‌ करो‌।तुम्हारी सांसें मेरे अधिकार में हैं।”सुधा‌ ने पति के आंसू पोंछें और कहा “आज तक‌ गुरूदीक्षा नहीं ली,इस बात का बड़ा अफसोस होता था।
आज मैं मन,वचन और कर्म से आपको अपना गुरू मानती हूं।मेरे मन में बसे अधिकार के अंधेरे को दूर कर दिया तुमने।सच कहा तुमने,हम दोनों का ही एक‌दूसरे पर अधिकार है,और किसी पर नहीं।”
“तो कहो वानप्रस्थ की पहली यात्रा कहां से शुरू करें?”दिवाकर जी ने‌ पूछा।”कहां से क्या काश्मीर से।डल झील में शिकारे पर रहने का सुख‌तो भोगना ही है ना तुम्हारे साथ।”सुधा‌मुस्कुराकर लजाती हुई बोली।
सच में अधिकार छोड़ देने से जो आंतरिक सुख मिलता है,वह अधिकार जताने से नहीं।सुधा मन ही मन पति की बात दोहराती हुए कपड़े जमाने लगी।
शुभ्रा बैनर्जी

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