आत्मविश्वास

  पथरीली,कंटको से भरी राह पर हवाई चप्पल पहने रमेश तेजी से चला जा रहा था।पैरो में कांटो की चुभन भी शायद उसे महसूस ही नही हो रही थी। पर पावँ और मष्तिष्क तेजी से चल रहे थे।मष्तिष्क में उठे झंझावात ही रमेश के कदमो को गति दे रहे थे।

       सम्पन्न पिता की संतान रमेश ने जीवन का अपना खुद का बनाया मार्ग चुना था।निर्णय बुरा भी नही रहा, एक मध्यम श्रेणी का उद्योगपति तो वह बन ही गया था।अच्छा भला उसका उद्योग चल रहा था।उसके मुन्ना की शिक्षा,क्षेत्र के नामी स्कूल में चल रही थी।

      एक बार किशोर अवस्था के मुन्ना ने  रमेश से कहा पापा समुंदर बहुत बड़ा होता है ना,उसका दूसरा किनारा दिखायी नही देता है ना।मुन्ना ने कभी समुंदर को प्रत्यक्ष देखा ही नही था,इसीलिए उसकी उत्सुकता चरम पर थी।रमेश ने मुन्ना को थपथपाते हुए कहा,बेटा चिंता क्यूँ करते हो गोवा चलेंगे समुंदर खुद देख लेना।और छुट्टियों में वो मुन्ना और पत्नी सहित गोवा लेकर गया।अब नियम सा हो गया था,सर्दियों में मैदानी इलाको में तो गर्मियों में पहाडी क्षेत्रो में पर्यटन का कार्यक्रम बनने लगा।घर मे खूब खुशहाली थी।

     रमेश वैसे भी अपने नगर का एक प्रतिष्ठित व्यक्ति था, नगर के होने वाले लगभग हर समारोह में उसको निमंत्रण रहता।कई संस्थाओं का वह अध्यक्ष या संरक्षक हो गया था।संपन्नता के साथ सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ रही थी।

      विधि का विधान , उसके उद्योग में उसके दूसरे डायरेक्टर ने  धोखाधड़ी करके काफी मात्रा में धन हड़प लिया।कंपनी भारी लॉस में चली गयी।पता चला तब तक सब कुछ तबाह हो चुका था।रमेश मान सम्मान में लगा रहा और साझीदार कम्पनी को दिवालिया बनाने में।




      फाइनेंसियल इंस्टीट्यूट्स ने कंपनी पर अपना अधिकार कर उसे नीलामी पर लगा दिया। बाजार के लेनदार घर पर हाजिरी लगाने लगे।ऐसी परिस्थिति से कभी रमेश को सामना करना ही नही पड़ा था,और न ही उसे ऐसे हालातों से निपटने का अनुभव था।

     लेनदारों के अपमानजनक व्यवहार और आर्थिक तंगी से टूटे रमेश ने आत्महत्या का रास्ता चुना।उसका मंथन चल रहा था,कि मरने के बाद सब समस्याएं समाप्त।इन्ही सोच विचारों के साथ रमेश नगर के पास की पहाड़ी की ओर लगभग दौड़ा जा रहा था।पहाड़ी से छलाँग और काम समाप्त।

       मस्तिष्क में जीवन की घटनाएं एक के बाद एक उकरती जा रही थी।किस प्रकार उसने अपने बल बूते अपना निर्माण किया था।उसे अपनी पत्नी सुमन और बेटे मुन्ना का चेहरा भी विचारों में साफ दिखाई दे रहा था।उसे याद आया मुन्ना कह रहा था पापा क्या समुंदर का दूसरा किनारा दिखाई नही देता।और रमेश उसे समुंदर दिखाने गोवा ही ले गया था।पर अब जब वो नही रहेगा तब वो मुन्ना को कैसे बता पायेगा,बेटा भले ही समुंदर का दूसरा किनारा ना दिखायी देता हो, पर मनुष्य उसकी छाती पर सवार हो उसके दूसरे किनारे को भी ढूंढ ही लेता है और समुंदर के अहंकार को भी तोड़ने की सामर्थ्य रखता है।

       मुन्ना को कहे वाक्य की याद ने रमेश के बढ़ते कदम रोक दिये।उसने सोचा, अरे उसने समुंदर में अपनी नौका उतारी ही कहाँ,उसने दूसरा किनारा ढूढ़ने का प्रयत्न किया ही कहाँ?

      नियति समझ वो बस आत्महत्या करने निकल पड़ा?उसी क्षण उसके कदम वापस अपने घर की ओर मुड़ गये,एक आत्म विश्वास के साथ।आज उसे अपने भाग्य पर नही कर्म पर विश्वास था।

#नियति 

     बालेश्वर गुप्ता, नोयडा

मौलिक,अप्रकाशित।

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