अपना अपना दर्द – शिप्पी नारंग : Moral stories in hindi

“बीजी”

“हूं…बोलो” आभा जी ने अपनी मेड मालती की आवाज़ सुनकर कहा । दो क्षण तो चुप्पी रही फिर मालती की आवाज आई “मुझे दो दिन की छुट्टी चाहिए।”

आभा जी का हाथ काम करते करते रुक गया। माथे पर त्यौरियां चढ़ाते हुए बोली”तुझे पता है ना संडे को मेरे घर पर किट्टी है और आज मंगलवार है।

बुध और वीर को तू छुट्टी कर लेगी तो कितने दिन बचेंगे तैयारियों के लिए..? गुस्से में आभा बोली । “और छुट्टी क्यों चाहिए तुझे…?” प्रश्न आया।

“वो मेरी बेटी बीमार है दो दिन से बुखार नही उतर रहा तो कल उसे हॉस्पिटल ले कर जाऊंगी सुबह सुबह जाकर नंबर लगवाना पड़ता है इसीलिए छुट्टी चाहिए।” ” नहीं इस हफ्ते तो बिल्कुल नही मिलेगी छुट्टी। तू अपनी सास को भेज दे।

उसके पास ही तो छोड़ कर आती है तो वो नही दिखा सकती क्या..?” “नहीं मुझे ही जाना पड़ेगा वो दिन भर उसका ख्याल रखती हैं यही कम है क्या ? और जो बात डॉक्टर के साथ में कर सकती हूं वो नही कर सकती” मालती ने कहा।

” नहीं….कोई छुट्टी नहीं ” अभी इतना ही कहा आभा जी ने कि रिद्धि की आवाज आई..”क्या हुआ मम्मा, गुस्सा क्यों हो रही हो?” “अरे देख न इस मालती को संडे को मेरी किट्टी है और इस महारानी को दो दिन की छुट्टी चाहिए।

कितना काम रहता है करने को। इन्हे तो बस बहाना चाहिए काम न करने का?” आभा जी गुस्से में बोली। ” बीजी भला मैं अपनी बेटी को क्यों बीमार करूंगी या बहाना बनाऊंगी। वो सच में बीमार है और उसे कल दिखाना है मुझे” बेचारगी से भरी मालती की आवाज आई।

उसकी आंखों में आसूं आ गए। आभा जी कुछ बोलती उससे पहले ही रिद्धि किचेन से बाहर चली गई और दो मिनिट बाद ही वापिस आई। मालती के हाथ में 500/- रखे और बोली “आप जाओ बेटी को दिखा लो। ये दवाई के लिए हैं।

फिक्र मत करो तनख्वाह में से नही कटेंगे। तुम्हारी छुट्टी मंजूर।” रिद्धि ने मालती के कंधे पर हाथ रख कर हंसते हुए कहा। मालती एकदम खुश हो गई कुछ कहने ही लगी थी कि रिद्धि की आवाज आई ” बस बस no dialogue।

आज का काम ख़त्म कर लो फिर चले जाना।” मालती के हाथ स्फूर्ति से चलने लगे। आभा जी ने खा जाने वाली नजरों से बेटी को देखा और गुस्से से अपने कमरे के तरफ चली गई। रिद्धि दो कप चाय बनाकर आभा जी के कमरे की तरफ बढ़ी।

आभा जी रिद्धि को देखते ही एकदम फट पड़ी ” ये क्या हिमाकत थी रिद्धि। बहुत प्यार आ रहा था उस पर। बहाना बना रही थी बेटी की बीमारी का और ऊपर से तुमने उसे 500/- रुपए भी दे दिए। किसने कहा था तुम्हे टांग अड़ाने के लिए ।

अब काम कौन करेगा। दो दिन में कितने काम हो जाते।” आभा जी अनवरत बोले जा रही थी। रिद्धि चुप बैठी रही, सुनती रही।आभा जी के चुप होते ही बोली …”बोल लिया या कुछ और बोलना है ? आपको कैसे पता चला कि वह बहाना बना रही थी ?

दो दिन से आप नोट नहीं कर रहीं कि वह काम दिल से नहीं कर रही है कभी गिलास टूटता है कभी बर्तन हाथ से छूटता है कभी ये गलत तो कभी वो गलत।

उससे गलती क्या होती है आप ऊपर से उसे जली कटी सुनाने लग जाती हो । अपना टाइम भूल गईं क्या जब मैं या भाई बीमार पड़ते थे तो आप ऑफिस से छुट्टी लेकर बैठ जाती थी।

पापा कितना कहते थे कि घबराने की जरूरत नहीं है दादी है ना पर आप कहती थी ना कि नहीं ऐसे समय में बच्चों को मां की जरूरत होती है जबकि आप जानती थी कि दादी हमें कितने प्यार से रखती थी

हमारा ख्याल रखती थी और एक बार तो आपकी प्रेजेंटेशन थी पर भाई बीमार हो गया था आपने तो प्रेजेंटेशन ही ना देने का सोच लिया पर दादी और पापा ने आप को कैसे समझा कर भेज दिया था तब क्या बहाना बना रही थी भाई की बीमारी का… नहीं ना और वैसे भी मम्मा… एक मां सब कुछ कर सकती है,

कह सकती है पर अपने बच्चों की बीमारी का झूठा बहाना नहीं बना सकती है तो आज फिर क्यों आपको लगा कि वह बहाना बना रही है वह भी मां है उसकी बेटी बीमार है आप मां होकर भी एक मां के दर्द को नहीं समझ पा रहीं थी ।

आपकी किट्टी ज्यादा इंपॉर्टेंट हो गई क्या ? क्या काम है मुझे बताओ दोनों मिलकर कर लेंगे, और मम्मा अपने आप को इन लोगों पर इतना निर्भर भी मत बनाओ कि उन्हें लगने लगे कि हमारे बिना तो इस घर का कोई काम हो ही नहीं सकता।” और आभा जी सोचे जा रही थी कि कब उनकी बेटी उनकी मां बन गई।

शिप्पी नारंग

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