रिश्ते की डोर -हरेंद्र कुमार

रघुवीरजी जैसे ही पार्क से आए  – ऊ ऊकरता मोती(डॉगी) उनके पैर चाटने लगा । आज रघुवीरजी अस्वस्थ्य महसूस कर रहे थे इस लिए मोती को पार्क लेकर नहीं गए थे, क्योंकि मोती के साथ दौड़ना पड़ता। यही कोई उनकी उम्र 75 वर्ष होगी ।

तभी कड़क आवाज में रूपेश उनके कमरे में आया और डांटते हुए बोला – क्या डैड , आपको बोला है पार्क जाना छोड़ दीजिए । समय पर नास्ता और खाना खाते रहिए , अब पार्क जाने की जरूरत नहीं है ।

रघुवीर – ठीक है बेटा । कहकर मुस्कुराने लगे ।

कहने के बाद सोचने लगे सुबह पार्क में मिश्राजी तेज चलते क़दमों साथ भी जब राम राम बोलते है तब उनको पीछे मुड़कर कैसे जवाब देता हूं  – राम राम मिश्राजी।

गीता भी बोलती है  – राम राम चाचाजी।

गीता, मिश्राजी की बेटी ,मिश्राजी हमेशा कहते है कि पढ़ने में वह बहुत होशियार है ।

अपने बेटी के साथ मिश्राजी भी रोज सुबह घूमने के लिए नियमित रूप से पार्क आते थे । रघुवीरजी सोचने लगे  – काश मेरा बेटा भी पार्क साथ चलता सुबह मिलने वाले लोगो की दुआ और राम राम समझ पाता । तभी मनमस्तिष्क में बेटे की आवाज गूंजने लगी और सोचने लगे क्या मै पार्क जा सकता हूं कभी भविष्य में ?

अगले दिन रघुवीरजी के शरीर का तापमान बढ़ गया था । तापमान बढ़ते ही उनको गेस्ट हाउस में शिफ्ट कर दिया गया था । कोरोना की वजह से आज कल घर का खाना बहू बनाती थी । कभी मसाले तेज़, तो कभी नमक कम मजाल है जो खाना कभी ठीक से बने ।

दरवाजे पर खाना रखने के बाद बहू आवाज लगाती  – खाना खा लीजिए ।

रघुवीर जी सोचने लगे कितनी  मेहनत से यह बिल्डिंग बनाई थी , गेस्ट हाउस बनाया था अतिथियों के लिए , लेकिन आज मुझे खुद गेस्ट हाउस में रहना पड़ता है । लज्जो उनकी पत्नी की याद आने लगी।  वह कह रही थी इतना धन मत जोड़ों बेटे निकम्मे हो जाएंगे लेकिन आप कहां मानने वाले ।

आज बुखार का दूसरा दिन था , खून का नमूना जा चुका थाशाम तक रिपोर्ट आनेवाली थी । रघुवीर जी चिंतित लग रहे थे । जीवन में यह पहली बार है कि वह परिवार से अलग गेस्ट हाउस में अपना जीवन ऐसे बिता रहे थे मानो नौकर है । परिवार में झाड़ ही मिलती थी फिर भी खुश रहते थे लेकिन धीरे धीरे खुशी भी जाती रही। 

रिपोर्ट शाम  को नहीं आया , बहू खाना लेकर दरवाजे पर रख चुकी थी । बहू, रिपोर्ट आ गई  – रघुवीरजी ने आवाज लगाई।

नहीं  – बहू ने जवाब दिया । रघुबीर जी को सुनाते हुए बोली  – राहुल से कह रही थी, खाना देने चला जा बाबूजी के पास , लेकिन उसको मोबाइल से फुरसत कहां ? लगा रहता है गेम खेलने में , हर सवाल का जवाब तो हमे ही देना पड़ता है न ।

रघुवीरजी को वहीं थाली जो पिछले कुछ दिनों से बार बार नजरो के सामने आ रही थी खाने का मन नहीं कर रहा था लेकिन नहीं खाएंगे तो बीमार पड़ जाएंगे यह भी भलीभांति जानते थे । बहू और बेटे की किटकिट रोज सुनने की आदत डाल ली थी ।

अगले दिन रिपोर्ट आ गई , वह पॉजिटिव रिपोर्ट थी । रघुवीर जी थोड़ा घबराए । एक बड़ी सी  गाड़ी आई उसमे सरकारी हॉस्पिटल के स्टाफ थे PPE कीट वाले ड्रेस पहने थे । आते ही उन्होंने गेस्ट हाउस को अच्छी तरह सेनेटाइजर से छिड़काव करके कोरोनावायरस रहित किया । रघुवीरजी को बड़ी वाली गाड़ी में बैठने को बोला ।

कुछ कपड़े के साथ रघुवीर जी गाड़ी के तरफ बढ़े , बेटे , बहू , नाती , नतिनी बाय बाय ऐसे कर रहे है जैसे वो हमेशा के लिए यमराज के पास जा रहे हो ।

गाड़ी स्टार्ट हुई और हॉस्पिटल के लिए प्रस्थान किया।  जैसे ही हॉस्पिटल पहुंचे देखा उसी वार्ड में गीता भी भर्ती थी । गीता – राम राम चाचाजी ।

राम राम बेटा  – रघुवीरजी के मुंह से अनायास ही बेटा शब्द निकल गया । गीता खुश हो गई ।

रघुवीरजी  – कैसा तबीयत है बेटा।

गीता  – हल्का बुखार है ,रिपोर्ट पॉजिटिव आया है पिताजी ने बोला रिस्क लेना ठीक नहीं है हॉस्पिटल में भर्ती करवा दिया।

जो बेड रघुवीरजी को मिला था ठीक उसके नीचे मोती भी पहुंच चुका था , ना जाने कैसे  उसको पता चल चुका था कि रघुवीर जी इसी वार्ड में है ।

दिन बीतने लगे , दिल की धड़कने तेज होने लगी, कहीं अनहोनी ना हो जाए । संयोग से गीता और रघुवीर जी एक ही दिन हॉस्पिटल में भर्ती हुए थे । आज चौदह दिन हो चुके थे हॉस्पिटल में आए हुए लेकिन रघुवीर जी के घर से कोई मिलने नहीं आया , लेकिन मिश्राजी अपनी  बेटी का हाल पूछने रोज आते थे तब रघुवीरजी जो राम राम कर लेते और कुछ फल फ्रूट , जूस दे देते।

मिश्राजी के घर पर अचानक सभी रोने लगे , मिश्राजी के साथ गीता की मां भी रोने लगी – अब किसको बेटी कहूंगी  दहाड़ मारकर रोने लगे , सभी पड़ोसी दूर से देखकर , कुछ पास आकर पूछने लगे आखिर बात क्या है? । मिश्राजी ने बात बताई बेटी हॉस्पिटल में थी उसकी मृत्यु हो गई कोरोना से, थोड़ी देर पहले ही कॉल आय था हॉस्पिटल से।

पास वाले लोग दिलासा दिलाने लगे , कहने लगे यह होनी है।

होनी को कौन टाल सकता है।

मिश्राजी को शमशान घाट बुलाया गया । प्रोटोकॉल के हिसाब से उन्होंने बेटी का चेहरा देखा ।

लेकिन यह क्या  – यह तो कोई और है ।

वहा उपस्थित डॉक्टर और हॉस्पिटल के स्टाफ पर मिश्राजी गुस्सा हो गए । हॉस्पिटल फोन किया गया तो पता चला गीत नाम की लड़की थी गलती से स्टाफ ने गीता का नाम दे दिया ।

मिश्राजी भागे भागे हॉस्पिटल पहुंचे देखा, गीता का डिस्चार्ज फार्म भरा जा चुका है । बेटी की रिपोर्ट नेगेटिव आ गई थी ।

उनकी नजरें रघुवीर जी को ढूंढ रही थी । वो कही दिखाई नहीं दे रहे थे । मोती भी कहीं नजर आ रहा था ।

तभी बड़ी सी गाड़ी हॉस्पिटल के गेट से अंदर दाखिल हुई । उस गाड़ी से रूपेश उतरा और हॉस्पिटल से अपने बाबूजी के बारे सवाल जवाब करने लगा ।  स्टाफ ने बताया रघुवीरजी थोड़ी देर पहले ही अपने डिस्चार्ज फॉर्म लेकर हॉस्पिटल से जा चुके है।

गीता मिश्राजी से कहने लगी  – चौदह दिन तो कोई मिलने नहीं आया, जब रिपोर्ट नेगेटिव आ गई तब उनको देखने आए है ।

शायद रघुवीर जी को जीवन समझ आ गया था , एक बेटी को बाप और बाप को एक बेटा मिल गया था । गीता को रघुवीर जी ने बेटा ही तो बोला था । तभी मिश्रा जी ने स्कूटी स्टार्ट किया और घर के लिए निकल पड़े । रूपेश रघुवीरजी को दूढ़ने निकल पड़ा ।

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