छाती पर साँप लोटना – top 10 moral stories in hindi

वक्त का पहिया”  

डीजे की तेज आवाज में बजते गानों से घर के अंदर सोए हुए महेंद्र जी और उनकी पत्नी रुक्मणि की आंखे खुल गई

एक दूसरे से नजरों को चुराते हुए दोनों के मन बड़े बैचेन थे

उनके घर से बिल्कुल मिला हुआ दूसरा मकान उनके छोटे भाई राघव का है और कल उसकी बेटी की बारात आनी है उसी की मेंहदी के संगीत का कार्यक्रम चल रहा है, लेकिन जमीन को लेकर हुई गलतफमी के चलते दोनों भाइयों में पिछले दो बरस से बातचीत और आना जाना बिलकुल बंद था.. निसंतान महेंद जी और रुक्मणि जी, छोटे भाई के दोनों बच्चो को बिलकुल अपनी संतान की तरह ही चाहते थे परंतु ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े को लेकर पंचायत भी दो गुटों में बंट गई, मगर कोई हल नहीं निकल पाया, दोनों भाइयों की एकता और प्यार देखकर कुछ पड़ोसी बहुत जलते थे और उनके हृदय पर सांप लोटने लगते…

उन्ही लोगो ने मौके का फायदा उठाया और दोनों भाईयों के बीच की खाई और गहरी कर दी थी..

महेंद्र जी टहलने के लिए बाहर आंगन में निकल आए तभी उनका ध्यान शादी वाले घर की तरफ गया और चौंक उठे, पत्नी रुक्मणि को आवाज देकर बाहर बुलाया….,

खुद भाई के घर दौड़ कर जोर से चिल्लाए “बंद करो ये गाना” सभी हैरानी से उनकी ओर देखने लगे… छोटा भाई गुस्से में बोला… “वाह भैया अब ऐसे बैर निकालोगे क्या”… महेंद्र जी ने बोले छोटे पीछे आंगन में आग लग गई है जल्दी पानी का इंतजाम कर

इतने में सभी ने देखा रुक्मणि जी ने अपने आंगन से पाइप लगाकर आग पर पानी फेंकना शुरू भी कर दिया था

फिर तो आननफानन में सभी मेहमान सुरक्षित स्थान पर भागने लगे सभी को आग बुझाने से अधिक अपनी जान बचाने की पड़ी थी….. पीछे आंगन में बरात का खाना बना रहे एक हलवाई की गलती से वहा रखे ईंधन ने आग पकड़ ली थी और घर के एक बड़े हिस्से के साथ साथ कल आने वाली बरात के लिए बन रहे खाने को भी अग्नि ने भस्म कर दिया था… बहुत देर बाद आग पर तो काबू कर लिया गया मगर अब छोटे भाई को कल बारात की चिन्ता सताने लगी थी..जिन पड़ोसियों को अपना हमदर्द समझे बैठा था, वो तो संकट की घड़ी देखते ही वहा से कब के ओझल हो चुके थे… तभी एक स्नेहिल स्पर्श अपने सर पर महसूस किया तो देखा बड़े भाई महेंद जी और रुक्मणि जी खड़े है उन्हे देखते ही छोटे भाई के आंसू निकल पड़े और रोते रोते बोला..

“आज अगर आप नही होते तो पता नहीं हम लोग जीवित बच भी पाते या नहीं और अपने भाई से लिपट गया…सब मेरी करनी का फल है जो अपने देवता जैसे भाई भाभी का दिल दुखाया.. मुझे माफ कर दो आप दोनो …

अरे छोटे बीती बातें भूल जा,…कल हमारी बिटिया की शादी है उसकी तैयारी में लग…चल बहुत काम पड़ा है ..अब ये शादी मेरे यहां से होगी और ऐसी धूमधाम से करेंगे के दुनिया देखेगी और दोनों भाई गले लग गए…

अगले दिन सही समय पर बारात आई, सारी बात जानकर लड़के वाले भी ऐसी रिश्तेदारी मिलने पर गर्व महसूस कर रहे थे और हां दोनों भाइयों की एकता और प्यार देखकर फिर से कईयों के दिलों पर सांप नही, अजगर लोटने लगे थे।

मुहावरा प्रतियोगिता हेतु

#”हृदय पर सांप लोटना”

कविता भड़ाना 

 कलेजे पर सांप लोटना  

आज मौलि बड़े सबेरे ही उठ गई थी, उसके बुटीक का उद्घाटन समारोह होने जा रहा था। मोहल्ले में सभी को उसने समारोह में बुलाया था। ये सब देख कर पड़ोस में रहने वाली उसकी मुंहबोली चाची के कलेजे पर सांप लोट रहे थे।

मौलि बचपन से ही पढ़ने और घर के अन्य कामों में होशियार थी। उसके बाबा एक सड़क दुर्घटना में अपाहिज हो अपनी नौकरी खो चुके थे। मां बीना दुसरो के घरों में बर्तन मांजती, खाना बनाती और देर रात तक कपड़े सिलती…तब भी किसी तरह उनकी गाड़ी चल रही थी क्योंकि बाबा के इलाज में उन्हें बहुत पैसे लग जाते थे।

बीना की पड़ोसन सविता एक रेडीमेड कपड़ों की दुकान में मशीन चलाने का काम करती थी वह ज्यादा तो नही बस दसवीं पढ़ी थी लेकिन अच्छा कमा लेती थी मौलि ने कई बार अपनी चाची से उसकी दुकान में इसी तरह का काम दिलवाने को कहा पर चाची कहती कि… एक तो लड़की जात, दूसरा दुकान पर जाकर काम करेगी, वंहा दस तरह के लोगों का आना जाना होता है कोई ऊंच नीच हो गयी तो मैं क्या करूंगी,और फिर ये काम बहुत मेहनती है न बाबा न तुम अपनी मां की तरह ही सिलाई झाड़ू बर्तन या खाने का काम करो। ये सुनकर मौलि और बीना को बहुत दुख होता।

जैसे तैसे मौलि ने बारहवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली। उसकी मां जिन घरों में काम करती उनमे से सह्रदय मालिनी मैडम थी उनके पति बैंक में मैनेजर थे।मौलि की कुशलता व तीव्र बुद्धि देखकर उन्होंने ही मौलि को फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने को कहा। अपने घर पर रखकर सिलाई मशीन की अन्य बारीकियां सिखाई बदले में मौलि उनके बच्चों को होम ट्यूशन देती थी।

धीरे धीरे मौलि और बीना का संघर्ष और मेहनत रंग लाई, मौलि ने अपना कोर्स पूरा कर लिया। अब जरूरत थी थोड़े रुपयों की जिससे बुटीक का थोड़ा बहुत समान खरीद जा सके। मौलि ने मालिनी जी के पति की मदद से बैंक से लोन लिया कुछ मशीन कपड़े लेस जैसी बेसिक चीजें खरीदी और एक सहायिका रखकर अपना काम शुरू किया। काम चल निकला तब उसने दो अन्य सहायक और रख लिए। मौलि ने अपनी मां का घरों में काम करना बंद करवा दिया। अब उसकी मां उसके बुटीक में गरीब और जरूरतमंद लड़कियों को निःशुल्क सिलाई सिखाया करती थी।

स्वरचित व अप्रकाशित

मोनिका रघुवंशी

 

हमारे बच्चों से उनका कोई ताल-मेल नहीं ….  

“ सुनिए जी ये जेठानी जी के दोनों बच्चों को किसी सरकारी स्कूल में डाल दीजिए.. हमारे बच्चों के साथ उनका कोई ताल-मेल नहीं है.. समझ रहे हैं ना आप?” रत्ना ने अपने पति से ग़ुस्से में कहा

उधर गलियारे से गुजरती सुनंदा जी ने ये सब सुन लिया और कमरे में जाकर पति की तस्वीर देख आँसू बहाते हुए बोली,“ आपको तो बड़ा नाज़ था ना अपने दोनों बेटों पर .. हमेशा कहते रहते थे देखना ये दोनों हमारा नाम रौशन करेंगे… वो नाम क्या रौशन करेंगे… आप ही मँझधार में छोड़ गए और हमें देवर जी के आश्रय में रहने आना पड़ा.. आज छोटी हमारे बच्चों को किसी दूसरे स्कूल में नाम लिखवाने कह रही है… अब क्या होगा जी।” कहकर वो फफक पड़ी

देवर बीबी की हर दिन की तकरार सुन भाभी से बोले,“ भाभी ये दोनों बच्चे पढ़ने में बहुत होशियार है.. इन्हें अच्छे स्कूल में डाल देता हूँ ताकि अच्छी पढ़ाई हो सके आप क्या कहती हैं?”

“ अब तो हर फ़ैसला आपको ही लेना है देवर जी.. भैया रहते तो मुझे ये सब सोचना नहीं पड़ता… बस उस स्कूल में ही डालिएगा जहाँ पेंशन के पैसे से ज़्यादा ना लगे।” सुनंदा जी ने देवर की मंशा जानते हुए भी कहा

सुनंदा जी के दोनों बच्चों का दाख़िला प्राइवेट स्कूल से हटा कर सरकारी में कर दिया गया सुनंदा जी बस देखती रह गई ।

बच्चे वहाँ भी अच्छे नम्बर ला रहे थे… सब दोनों की तारीफ़ करते रहते ये सब सुन रत्ना की छाती पर साँप लोटने लगता।

“ देखो रत्ना बच्चों को जहाँ पढ़ना होता वो पढ़ ही लेते .. ये जो भाभी के बच्चों को देख तुम्हारी छाती पर साँप लोट रहा है ना उससे बाहर निकलो और अपने बच्चों पर ध्यान दो।” रत्ना के पति ने समझाते हुए कहा

जब वार्षिक परीक्षा में सुनंदा जी के बच्चों ने अपनी अपनी कक्षा में अव्वल आने की बात घर पर कहीं तो रत्ना की छाती पर साँप लोटने लगा वो आव देखी ना ताव ये सुनते अपने बच्चों को मारते हुए कहने लगी,“ देख रहे हो ये दोनों उस स्कूल में भी जाकर कमाल कर रहे और तुम दोनों अच्छे स्कूल में पढ़ने के बाद भी जैसे तैसे पास हो रहे।”

“ ये क्या कर रही है छोटी… ऐसे बच्चों में तुलना करने से वो क्या पढ़ लेंगे… स्कूल कोई भी हो बस लगन और मेहनत होनी चाहिए… काश तुम बच्चों में ये भेदभाव ना कर सबको साथ पढ़ने देती तो आज तुम्हें ये सब कहने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती ।” सुनंदा जी बच्चों को बचाते हुए बोली

“ हम भी अब पढ़ेंगे बड़ी माँ ,भैया की तरह बस हमें माँ की मार से बचा लो।” रत्ना के बच्चे सुनंदा जी से चिपटे हुए बोले

रत्ना को भी एहसास हो रहा था वो बस ईर्ष्या में आकर सुनंदा के बच्चों का भविष्य बर्बाद करने चली थी पर भविष्य अपने ही बच्चों का बिगाड़ रही थी ।

रश्मि प्रकाश

स्वरचित

 

ईमानदारी की रोटी  

सुमित और रजत दोनों एक साथ बड़े हुए थे। एक ही कॉलेज से पढ़ाई पूरी की पर दोनों की सोच में ज़मीन आसमान का अंतर था जहां सुमित ईमानदारी और अपनी मेहनत पर भरोसा रखता था, वहीं रजत किसी भी तरह से आगे बढ़ने में विश्वास करता था।

संयोग की बात थी दोनों की नौकरी भी एक ही सरकारी विभाग में लग गई। दोनों की शादी भी हो गई,समय अपनी गति से चल रहा था। सुमित और रजत दोनों एक ही विभाग में एक जैसे ही पद पर थे पर दोनों के रहन-सहन में बहुत अंतर था। जहां रजत ने दो नंबर की कमाई से बहुत सारी सुख-सुविधा एकत्रित कर ली थी वहीं सुमित अभी भी सादा जीवन उच्च विचार वाली बात पर अमल करता था। रजत की सुख-सुविधा का घमंड उसकी पत्नी में भी साफ दिखता था। वो जब देखो तब अपने रहन-सहन का बहुत गुणगान करती थी और विशेष रूप से अपनी बातों से सुमित की पत्नी को तो कई बार नीचा भी दिखा देती थी।

ज़िंदगी ऐसे ही आगे बढ़ रही थी अब रजत ने नई कार भी खरीद ली थी। ये देखकर सुमित के पत्नी से रहा नहीं गया उसकी छाती पर सांप लोटने लगे। उस दिन गुस्से में आकर उसने सुमित को बहुत उल्टा-सीधा बोला। सुमित बस ये कहकर चुप हो गया कि ईमानदारी की रोटी में जितना सुकून है,वो बेईमानी में नहीं।

इस बात को अभी तीन-चार दिन ही बीते थे कि सुबह-सुबह पूरी कॉलोनी में अफरा तफरी का माहौल था। हुआ ये था कि बहुत सारी पुलिस और सरकारी गाडियों ने रजत के घर को घेर लिया था। उसके घर आयकर विभाग का छापा पड़ा था क्योंकि किसी ने उसके रिश्वत लेने के कारनामों का सबूत के साथ कच्चा चिट्ठा खोल दिया था। अगले दिन के समाचार पत्र में भी रजत के काले कारनामों के चर्चे थे। कल तक जो लोग उसकी ऐशोआराम की ज़िंदगी से प्रभावित थे आज वही उसके खिलाफ उल्टा-सीधा बोल रहे थे। उसके काले कारनामों ने उसके परिवार की भी गर्दन शर्म से झुका दी थी। आज सुमित की पत्नी को अपने ईमानदार पति पर गर्व था।

डॉ. पारुल अग्रवाल,

नोएडा

 

  छाती पर साँप लोटना   

अपनी देवरानी ऊषा की चारों काबिल बेटियों को देखकर सुधा के कलेजे पर साँप लोटने लगते।ईर्ष्या,द्वेष से उसका सर्वांग सुलग उठता। चार-चार बेटों की माँ बन जाने पर सुधा को बहुत घमंड हो गया था।उसे लगता कि भगवान ने उसे चार बेटे देकर चार कंधा देनेवाला भेज दिया है।वह अपने चारों बेटों को हमेशा लोगों की नजरों से बचाने की कोशिश करती।वह अपने चारों बेटों को खुद स्कूल पहुँचाती और लाती।

एक दिन उसकी देवरानी ने कह दिया -” दीदी! मेरी तरह आप भी इन बच्चों को क्यों नहीं स्कूल के लिए रिक्शा या बस करवा देतीं हैं।आपको परेशान भी नहीं होना पड़ेगा।”

बेटों के घमंड में चूर सुधा ने कहा-“ऊषा!तुम्हें क्या पता?तुम्हें तो केवल बेटियाँ ही बेटियाँ हैं!बेटियों को कोई नजर नहीं लगती,नजर तो बेटों को ही लगती हैं।”

जेठानी सुधा की व्यंग्यपूर्ण बातों से ऊषा का मन कसैला और आहत हो उठा।उसने अपने पति को सारी बातें बताई। उसके पति ने कहा -“ऊषा!तुम भाभी की बातों को दिल से लगाकर दुःखी मत हो।अगर उनके लिए चारों बेटे अजूबा हैं,तो मेरी भी बेटियाँ अजूबा और अनमोल हैं!”

सचमुच वक्त के साथ जहाँ ऊषा की चारों बेटियाँ पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी कर रहीं हैं,वहीं सुधा के चारों बेटे माँ के अत्यधिक लाड-प्यार के कारण ज्यादा पढ़-लिख नहीं सके और आज अपना गुजर-बसर भी मुश्किल से कर रहें हैं।ऊषा की काबिल बेटियों से जब-जब सुधा का सामना होता है,तो उसके कलेजे पर साँप लोटने लगता है।

सचमुच ईर्ष्या बहुत बुरी बला है।

समाप्त।

लेखिका-डाॅक्टर संजु झा(स्वरचित)

मूल्यांकन  

निधि हमेशा अपनी क्लास में फर्स्ट आती जिसे देखकर उसके माता- पिता खुशी से फूले नहीं समाते। उसके पिता तो पूरे मुहल्ले में मिठाई बँटवाते उनका सपना उसे ऊँचे पद पर देखना था और निधि उनकी चाहतों पर खरी उतरी भी लेकिन विनय के घरवालों को उसका जॉब करना पसंद नहीं था अतः उन्होंने यह कहकर कि उनके घर की बहुएं नौकरी नहीं करतीं उसके पंख काट दिये।

 

वह विरोध करना चाहती थी पर उसे तो पता ही नहीं चला कि कब उसके पिता ने विनय के पिता को यह वचन दे दिया कि निधि नौकरी नहीं करेगी इस शर्त के साथ विवाह संपन्न हो गया और उस वेदी में उसके उन्मुक्त आकाश में पंख पसार कर उड़ने के सपने भी खाक हो गये।

उसके ससुराल वाले हमेशा उसे जली- कटी सुनाते रहते। सास तो रात- दिन यही कहती तुम्हारे बस का कुछ नहीं है तुमसे कोई काम ढंग से होता ही नहीं। न जाने क्या करती रहीं मायके में.. अरे.. कोई लच्छन तो सीखा होता।

अब वह कैसे बताये कि उसकी योग्यता को तो उनके पति के वचन निगल गये और पिता ने अपनी बेटी को ऊँचे घर की बहू बनाने के सपने की भेंट चढ़ा दिया पर हर चीज़ की लिमिट होती है। वह यह सुन सुन कर थक गई तो अपने आपको उनके सामने प्रूव करने की चाह मन में उपजने लगी और उसने एक स्कूल में संपर्क किया जहाँ उसके सर्टिफिकेट देखकर ही तुरंत ही उसको जॉब मिल गई।

जब निधि ने घर आकर यह बताया तो सभी उसका मजाक बनाने लगे.. शक्ल देखी है अपनी.. पढ़ाने के लिए बहुत योग्यता की जरूरत होती है खेल नहीं है टीचर बनना।

अरे जाने दो न मांजी.. चार दिन बाद ही स्कूल वाले घर का रास्ता दिखा देंगे तब अपनी औकात अपने आप समझ में आ जायेगी।

निधि का पढ़ाने का तरीका बहुत अच्छा था वह दिनोंदिन बच्चों की पहली पसंद बनती जा रही थी जिसे देखो वही निधि मैम के गुण गाता। उसकी यह प्रसिद्धि उसके घरवालों के कानों तक भी पहुँचने लगी थी।

आज उसे ” बेस्ट टीचर” का अवार्ड मिलने जा रहा था जिसके लिए स्कूल की तरफ से उसके पूरे परिवार को आमंत्रित किया गया था जब उसकी सास ने यह देखा तो उनकी छाती पर सांप लोटने लगे उन्होंने क्या समझा था उसे और उनकी इसी जलन ने उसे कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया।

स्वरचित एवं अप्रकाशित

कमलेश राणा

छाती पर साँप लोटना 

सुशीला के पति राजेंद्र बैंक में कार्यरत थे । उनके दो बच्चे हैं । लड़के ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और एम एस करने के लिए अमेरिका चला गया था । सुशीला सबकोखुश होकर बताया करती थी कि उनका बेटा विदेश में पढ़ता है । उस समय उनके ख़ानदान में सबसेपहले इनका बेटा ही अमेरिका गया था ।दो साल बाद बेटी भी शादी पति के साथ केनडा चली गई थी।

पढ़ाई पूरी करने के बाद बेटे को नौकरी मिल गई थी । वह वहीं का हो गया शादी भी हो गई थी । दोतीन बार पति पत्नी अमेरिका और केनडा बारी बारी से जाकर आ गए थे । उम्र के बढ़ने के साथ वे वहाँजा नहीं पा रहे थे । बीमारियों ने भी अपना पंजा फैलाना शुरू कर दिया था । एक देवरानी के दोनोंबच्चे उनके साथ में रहते हैं और एक देवरानी का बेटा मुंबई में ही रहता है । उन्हें देख कर सुशीला कोमहसूस होता है कि मेरा बेटा ही यहाँ नहीं रहता है दूसरी देवरानियों के तो ऐश हैं बहुओं से काम करालेती हैं ।

जब भी वे सब मिलने आते सुशीला की छाती पर साँप लोटने लगता था । सब कहते थे कि भाभी बेटेको बुला लो तो कहती थी कि नहीं अब तो बच्चे भी हो गए हैं वे वहीं पर बस गए हैं क्यों बुलाना? वहाँतक ठीक है पर जलन का तो कोई इलाज नहीं है ना ।

स्वरचित

के कामेश्वरी

“बहू भी तो किसी की बेटी है “

” भाभी बहू को अपनी मुट्ठी मे करके रखना ऐसा ना हो वो बेटे को ले अलग हो जाये आप तो जानती हो ना आजकल की बहुओं को !” सुलोचना जी अपनी भाभी से बोली जिन्होंने अभी एक महीना पहले ही बेटे का विवाह किया है।

” नही दीदी बहू तो बहुत प्यारी है उसने तो अपनेपन से मुझे ही मुट्ठी मे कर लिया है !” नलिनी जी हंस कर बोली।

” मम्मी जी मैं ऑफिस जा रही हूँ शाम को तैयार रहिएगा बाज़ार चलने को !” तभी नलिनी जी कि बहू दिशा ऑफिस के लिए निकलते हुए बोली।

” ये क्या भाभी बहू पैंट कोट पहनती है तुम रोकती क्यो नही उसे ?” सुलोचना जी दिशा के जाते ही बोला।

” दीदी ऑफिस कोई साडी पहन कर तो जाएगी नही वैसे भी मेरी रिया ( बेटी) भी तो ऑफिस ऐसे ही जाती है ना तो दिशा के ऐसे जाने मे मुझे क्या हर्ज होगा।” नलिनी जी बोली।

” भाभी वो बेटी है ये बहू बहू को थोड़ा कायदे से रहना चाहिए बेटी के साथ उसकी तुलना नही हो सकती। पर लगता है आपने तो उसे बहुत छूट दे रखी है ।” सुलोचना जी मुंह बनाते हुए बोली।

” दीदी वो बहू है तो क्या उसको अपनी मर्जी से जीने का भी हक नही जैसे मैने रिया को कभी नही टोका इसे भी नही टोकूंगी किसी की बेटी ही किसी और की बहू होती है फिर क्यो बहू से भेदभाव किया जाता है । वैसे भी रिया तो कल को अपने ससुराल चली जाएगी पर ये मेरे साथ सारी जिंदगी रहेगी फिर क्यो इसके ऊपर बंदिश लगाकर मैं अपने रिश्ते बिगाड़ूं !” नलिनी जी बोली।

तभी दिशा दरवाजे से अंदर आई और सीधे नलिनी जी के गले लग गई । ” थैंक यू मम्मी जी …आज गाडी की चाभी ना भूली होती तो जान ही नही पाती कि मैं एक माँ के घर से निकल दूसरी माँ के घर आई हूँ !” दिशा नम आँखों से बोली।

” पगली कही की चल जा देर हो रही है !” दिशा के आँसू पोंछ उसका माथा चूम नलिनी जी बोली।

सास बहु का प्यार देख सुलोचना जी की छाती पर साँप लोट गये।

दोस्तों सास बहू का रिश्ता इतना भी बदनाम नही जितना कुछ लोगो की सोच ने बना दिया है। अगर दोनो खुले दिल से एक दूसरे को अपनाये तो यकीन मानिये ये रिश्ता सबसे खूबसूरत हो सकता है।

आपकी दोस्त

संगीता

छाती पर सांप लोटना

अरे विनित, क्या हुआ बड़के का कहीं सलेक्शन हुआ य़ा नहीं??

नहीं भाईसाहब , अभी तो कहीं नहीं… बेचारे पड़ोसी दयालजी निराश होते हुए बोले..

तो फिर कब तक उसका बोझा ढोगे ,, 29 साल का हो गया… छुटके शिवम की तरह कहीं किसी दुकान पर लगवा दो.. तुम कहो तो मैं बात करूँ ??

नहीं भाई साहब ,, ऐसी बात नहीं हैं,, मैने कहा था विशाल से कि अब कोई काम धन्धा शुरू कर ले… पर कहता पापा एक साल और दे दो… अबकी बार हो जायेगा… बस इसलिये ज्यादा दबाव नहीं डालता… शिवम का तो पढ़ने में मन ही नहीं लगता था इसलिये उस पर पढ़ाई का दबाव नहीं डाला… अपनी मर्जी से कपड़े की दुकान पर काम करने लगा हैं… पर जो बच्चा पढ़ना चाहता हैं… उसे तो मौका देना ही चाहिए…. हमें नहीं मिला ज्यादा पढ़ने का समय…आप तो सब जानते ही हैं कि पिताजी के अचानक से चले जाने से पांच बहनों , एक भाई की ज़िम्मेदारी मेरे कांधो पर आ गयी… इसलिये काम में लग गया … ज़िन्दगी भर मलाल रहा कि पढ़ नहीं पाया .. सब भाई पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी में लग गए … पर अब ऐसा मौका अपने बेटे को देना चाहता हूँ… बंशी वाले की कृपा से अब रोटी पानी की कोई कमी नहीं हैं.. वैसे भी इतने साल सही, वहां एक साल और सहीं …

वो सब तो ठीक हैं विनित… पर कब इसका ब्याह करोगे … उम्र ज्यादा हो गयी तो अच्छे रिश्ते भी नहीं मिलेंगे…. हर बच्चा एक जैसा नहीं होता … देखो मेरे तीनों बच्चें 24-25 साल में ही सरकारी नौकरी में लग गए …अब कुछ नहीं हो पायेगा विशाल पर…पड़ोसी प्रकाश जी मूछों पर ताव देते हुए बोले…

तभी दयाल जी कुछ बोलते उससे पहले छोटा बेटा शिवम दौड़ते हुए आया और हांफते हुए बोला .. पापा आपने आज का अखबार देखा… भईया की फोटो आयी हैं… भईया का आईएएस में नंबर आ गया … बहुत अच्छी रैंक आयी हैं तभी अखबार में भी फोटो आयी हैं… देखो देखो…

दयाल जी डबडबायी आँखों से अखबार देखने लगे… अरे हाँ रे , ये तो अपना विशाल ही हैं…

तो क्या मैं झूठ बोल रहा था … आप भी ना पापा.. देखो अंकल आप भी… शिवम प्रकाश जी की तरफ अखबार दिखाते हुए बोला…

प्रकाश जी की छाती पर तो जैसे सांप लोट गए .. मुंह में दबा गुटका ना तो थूक पा रहे थे , ना ही निगल पा रहे थे प्रकाश जी….

पूरे मोहल्ले वालों ने विशाल को अपने कांधो पर बैठाकर फूलों की माला पहनाकर भव्य स्वागत किया …. आज़ विशाल की मेहनत रंग जो लायी थी ….

मीनाक्षी सिंह की कलम से

अगरा

स्वरचित मौलिक

छाती पर साँप लौटना

“मम्मा ओ मम्मा”। शुभा ने अखबार में सुकन्या के कलेक्टर बनने की खबर पढ़ते ही चिल्लाना शुरू कर दिया।

“क्या बात है। इतना शोर क्यों मचा रही हो”। कमरे में आकर मालती ने कहा।

“मम्मा। यह देखो। सुकन्या की फोटो। वह कलेक्टर बनकर इस शहर में आ रही है। कितनी खुशी की बात है”।

“सच में बहुत ही खुशी की बात है। बचपन से ही पिता के जाने के बाद उसने बहुत दुख उठाए हैं। वो तो तेरी कनिका आंटी ने हिम्मत नहीं हारी। उसी का ही तो यह सुफल है। यह खबर पढ़कर तो सुकन्या की ताई की छाती पर तो साँप लोट गया होगा”।

“क्या मतलब मम्मा”।

“मतलब यह है कि सुकन्या की तरक्की देखकर उसकी ताई ईर्ष्या से जल गई होगी। तुझे तो पता है, बचपन से ही सुकु पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। साथ ही वह हर प्रतियोगिता में भी बढ़-चढ़कर भाग लेती थी। इसी कारण ताई उसे बहुत तंग करती थी, ताकि वह शौर्य और वनिता से पीछे रहे”।

“जी मम्मा। पर देखो न आज सुकन्या अपनी मेहनत के बल पर कितना आगे बढ़ गई। शौर्य और वनिता तो कुछ खास नहीं कर पाए।

एक साधारण-सी नौकरी ही कर रहे है”।

“बिलकुल सही कहा शुभा। तू ज़रा बाज़ार से सुकन्या के स्वागत के लिए फूल मालाएँ तो ले आ। तब तक उसकी ताई को यह खुशखबरी सुना आऊँ”।

“मम्मा आप भी”। छोड़िए भी”।

“सुकू और कनिका को तंग करने वालों के लिए इतना तो बनता ही है”।

अर्चना कोहली “अर्चि”

नोएडा (उत्तर प्रदेश)

 

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