बहू भी बेटी ही होती है – प्रियंका त्रिपाठी ‘पांडेय’

अपने इकलौते बेटे मनीष की शादी की तैयारीयों में सरोज जी इतना व्यस्त थी कि उन्हे अपनी भी सुध नही थी। बेटे की शादी में कोई कमी न रह जाए इसलिए बड़ी तन्मयता से हर चीज पर ध्यान दे रही थी। हंसते गाते सब काम निपटा रही थी। होने वाली बहू माही के लिए तो वे चुन-चुन कर खरिदारी कर रही थी। तभी उनकी एक रिश्तेदार ने कहा सरोज तुम इतना प्रसन्न हो रही हो जैसे घर मे बहू नही बेटी आ रही है। सरोज जी ने कहा हां बेटी ही तो आ रही है क्या बहू बेटी नही होती।बहू भी बेटी ही होती है।

पूरे विधि विधान से शादी सम्पन्न हुई। वर-वधू घर मे प्रवेश करते है। मनीष की बहन सौम्या के तो खुशी से पैर ही नही टिक रहे थे जमी पर।

माही के आने से पूरा घर खुशियों से महक रहा था। सरोज जी ने माही को कभी भी महसूस ही नही होने दिया कि वे सांस है, हमेशा मां की तरह उसके साथ खड़ी रही।

माही भी बेटी की तरह सबके प्रति समर्पित रही, अपनी सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाती थी। मनीष जैसा पति और सरोज जी जैसी मां पा कर तो माही स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती थी।

माही अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती थी किसी के प्रति उसका दायित्व छूट न जाए खासतौर पर सरोज जी के स्वास्थ्य का और उनके खाने पीने का विशेष ख्याल रखती थी।घर मे चारो तरफ खुशियां ही खुशियां थी।जो भी आता वह यही कहता यह घर नही प्यार की बगिया है, जहां से प्यार की खुशबू ही आती रहती है।

कहते हैं ना अच्छे वक्त के जाते और बुरे वक्त के आते देर नही लगती। प्यार की खुशबू से महकती इस बगिया को जैसे किसी की नजर लग गई…

एकदिन मनीष आफिस जाने के लिए तैयार हुआ, जाने से पहले रोज की तरह आज भी मां से मिलने गया, मां के पास बैठ कर हंसी मजाक करने लगा, माही भी बगल में खड़ी थी। मनीष जैसे ही आफिस जाने के लिए उठा  चकराकर भूमि पर गिर गया उसी समय उसकी मौत हो गई।



मनीष की असमय मृत्यु से सभी स्तब्ध रह गए। सरोज जी को गहरा सदमा लगता है और वे बेहोश हो जाती हैं। ऐसे में माही अपने दर्द को सीने में दबाकर एक मजबूत स्तंभ बन कर खड़ी हो जाती है।सरोज जी को बिस्तर पर लिटाकर उनकी देखभाल करने लगती है।

सौम्या माही से कहती है, भाभी भैया हमें छोड़कर क्यों चले गए। हमारे घर को किसकी नजर लग गई। माही सौम्या की बाते सुनकर अपने आंसुओं को रोक नही पाती, दोनो एक दूसरे को पकड़कर रोने लगती है।

भोर हुई चारों तरफ सन्नाटा पसरा था। घर मे सभी थे बस मनीष नही था। माही सरोज जी के पास बैठी उनके सिर में ठण्डा तेल लगा रही थी…. और इसी इंतजार मे थी कि किसी तरह मां को होश आ जाए। सौम्या चाय बना कर लाती है।

माही से कहती है,- “भाभी चाय पी लो रात से मां के पास बैठी हो आपके भी सिर में दर्द हो रहा होगा। माही चाय पी रही थी तभी देखती है कि सरोज जी के हाथों में कम्पन होती हैं। माही मां…मां कह कर पुकारती है,सरोज जी को होश आ जाता है। सरोज जी की नजरें सबसे पहले माही को देखती हैं। माही को इस रूप मे देखकर उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगते है,वे उठती है और माही को अपनी छाती से लगा लेती है। माही भी मां की छाती से लगकर रोने लगती है। 

सरोज जी कहती है,- “मत रो मेरी बच्ची मत रो। मैं हूं ना…मैं तुझे ऐसे नही रहने दूंगी। सरोज जी भगवान से कहती हैं… भगवान मुझे हिम्मत दो जिससे मैं अपनी बच्ची का जीवन संवार सकूं।”

सरोज जी जानती थी कि माही को बचपन से ही डांस का शौक था। इसलिए वे माही को डांस स्कूल भेजने लगती है जिससे उसका मन लगा रहे। उसे हर डांस प्रतियोगिता मे भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करती थी। 

सरोज जी हर क्षण बस माही के बारे मे ही सोचती रहती थी। एकदिन सरोज जी ने माही से कहा, -“माही मैं तुम्हे इस घर से विदा करना चाहती हूं।” 



माही कहती है, -“मां क्या मै आप पर बोझ हो गई हूं?”

सरोज जी कहती हैं,- “नही-नही माही बेटियां माता-पिता पर बोझ नही होती। वे तो माता-पिता की जिम्मेदारी होती है। मुझे मेरी जिम्मेदारी निभा लेने दे।” 

माही कहती है,- “मां आपने अपनी सब जिम्मेदारियां पूरी कर ली है। अब जिम्मेदारी निभाने की बारी मेरी है। मैने मनीष से वादा किया था कि मै मां का सदैव ख्याल रखूंगी।”

सरोज जी कहती हैं,- “मैं तो बूढ़ी हो चुकी हूं।आज नही तो कल इस दुनिया से चली जाऊंगी। किन्तु तेरे सामने तो अभी पूरी जिंदगी पड़ी है।”

माही कहती है,- “मां अगर ऐसी बात है तो मै शादी करने के लिए तैयार हूं। परन्तु मेरी एक शर्त है…”

सरोज जी कहती हैं,- “हां…हां बोल माही! मै हर शर्त पूरी करने को तैयार हूं ।”

माही कहती है,- “मां यदि आप मुझे मनीष से अच्छा पति और आप से अच्छी मां लाकर दे सकती है, तो मै सहस्र शादी करने को तैयार हूं।”

“सरोज जी निरुत्तर हो जाती हैं।”

 माही कहती है,- “मां यदि मुझे मनीष जैसा पति पाने के लिए सात जनम भी इन्तजार करना पड़े तो मै इन्तजार करुंगी। और यह इन्तजार मैं आपके पास ही रह कर करना चाहती हूं।”

सरोज जी कहती हैं,- “माही इतना बड़ा त्याग तो मेरी जनि बेटी भी न करती। धन्य हो गई मै तुझ जैसी बेटी को पाकर।”

सौम्या को दो जुड़वा बेटियां हुई थी। माही ने उसकी एक बेटी को गोद ले लिया और उसी बच्ची को अपने जीवन काल लक्ष्य बना लिया।

#त्याग

प्रियंका त्रिपाठी ‘पांडेय’

प्रयागराज उत्तर प्रदेश

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