समय का चक्र – अनुराधा श्रीवास्तव “अंतरा”

“तू अब तक यहीं बैठी है, चल जा यहाँ  से।”

“माॅ जी ऐसा मत करिये। मैं कहा जाउॅंगी। अब यही मेरा घर है। मुझे अन्दर आने दीजिये। मैं जिन्दगी भर आपकी नौकरानी बन कर रहूंगी।’’ कामिनी अपनी सास के पैर पकड़कर गिड़गिड़ाने लगी। 

“हमे नौकरानी नहीं, पैसा चाहिये। जाओ अपने बाप से एक लाख रूपये लेकर आओ तभी घर में घुसने दूंगी वरना अपने बाप के घर पर ही रहो। यहाॅं लड़कियों की कमी नहीं है।’’सास ने कामिनी को खुद से दूर करते हुये अपना हुकुम सुना दिया। 

कामिनी ने अपने पति की ओर आस भरी नजर से देखा तो उसने भी अपनी माॅं के फैसले का समर्थन करते हुये अपना मुॅंह फेर लिया। लाख मिन्नतों के बाद भी कामिनी की सास ने उसे घर में नहीं आने दिया। कामिनी जैसे तैसे अपने मायके पहुंची और अपने पिता को सारा हाल कह सुनाया। कामिनी का परिवार इतना सभ्रान्त नहीं था कि वह इतनी जल्दी एक लाख रूपये का इन्तजाम कर पाते। आखिरकार कामिनी के पिता ने अपना घर बेंचकर एक लाख रूपये का इन्तजाम किया और कामिनी की सास के हांथ में रखते हुये हांथ जोड़कर कामिनी को अपने घर में रखने की याचना की। कामिनी ये सब देख रही थी लेकिन कुछ नहीं कर सकती थी। उसका घर बसाने के लिये उसके पिता ने अपना घर उजाड़ दिया था।

कामिनी वर्तमान में लौटती है। आज उसकी बेटी की शादी है। दरवाजे पर बारात खड़ी है। लड़के का पिता दहेज की माॅंग पर अड़ा है और माॅंग पूरी न होने पर बारात वापस ले जाने की धमकी दे रहा है। कामिनी का पति हाॅंथ जोड़कर बारात वापस न ले जाने की गुहार कर रहा है लेकिन लड़के के पिता का दिल नहीं पसीज रहा। कामिनी की सास औरतों के बीच खड़े होकर लड़के वालों को दहेज लोभी कहकर कोस रही हैं लेकिन कामिनी के चेहरे पर कोई भाव नहीं हैं, न चिन्ता, न अवसाद, न क्रोध …. वो तो बस इस क्षण को बस बीतते हुये देख रही है जैसे कोई पुरानी फिल्म का कैसेट दोबारा किसी ने चला दिया हो….. बस पात्र बदल गये हैं। कामिनी धीरे से बुदबुदायी, “दोहरे चेहरे ’’ और एक भीनी सी मुस्कान उसके चेहरे पर आकर तुरन्त वापस लौट गयी।

अनुराधा श्रीवास्तव “अंतरा”

#दोहरे_चेहरे

मौलिक 

स्वरचित

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