साथ : Moral stories in hindi

Moral stories in hindi : राकेश दफ्तर से घर आया तो उसने देखा उसकी पत्नी सीमा पूजा की तैयारियों में लगी हुई थी।
आज सीमा का हरितालिका तीज का व्रत था जिसकी वजह से उसने चौबीस घंटे का निर्जला उपवास रखा हुआ था।

राकेश ने सीमा से चाय माँगी तो उसने उसे थोड़ी प्रतीक्षा करने के लिए कहा।
बस इतना सुनते ही राकेश का गुस्सा फूट पड़ा और उसने चिल्लाते हुए कहा “दफ्तर से आदमी थका हुआ आया है और यहाँ किसी को चाय-पानी देने की भी फुर्सत नहीं है।”

सीमा डबडबायी आँखों से राकेश को एक नजर देखकर रसोई में जा ही रही थी कि तभी उनकी बेटी ऋचा ट्यूशन से वापस लौटी और राकेश के गुस्से की वजह समझते ही उसने सीमा से कहा “माँ तुम पंडित जी के आने से पहले थोड़ी देर आराम करो। मैं ये सब सँभाल लूँगी।”

जब ऋचा ने चाय-नाश्ता लाकर अपने पापा के सामने रखा तब राकेश ने दुलार से कहा “अरे बिट्टो तुम रसोई में क्यों गयी? ये सब काम तुम्हारे माँ के हैं उसे ही करने दिया करो।”

“पापा, घर तो हम सबका है ना, फिर काम सिर्फ माँ का क्यों है? वो सुबह से भूखी-प्यासी अकेली काम कर रही है। अब जब मैं और आप घर वापस आ चुके हैं तब क्यों न हम माँ का थोड़ा सा हाथ बँटा दे।” ऋचा ने सहजता से कहा तो राकेश एक बार फिर अकड़ दिखाते हुए बोला “बिल्कुल भी नहीं। घर के अंदर की जिम्मेदारियां सिर्फ तुम्हारी माँ की हैं। इसलिए ये सब वही करेगी।”

ऋचा कुछ और कहती इससे पहले ही रात के खाने में क्या बनाना है, ये आदेश देकर राकेश अपने मित्र के यहाँ चला गया।

उसके जाने के बाद ऋचा ने सीमा से कहा “माँ, मैं बचपन से देखती आ रही हूँ कि तुम कभी पापा की गलत बातों का विरोध नहीं करती हो। जिसके लिए तुम इतना कठिन उपवास करती हो उसी का तिरस्कार झेलती हो। उन्हें कोई कद्र नहीं है तुम्हारी, फिर भी तुम उन्हें एक शब्द क्यों नहीं कहती हो?”

“क्या करूँ बिट्टो मैं ऐसी ही हूँ। ये सोचकर मैं तुम्हारे पापा को कभी प्रतिउत्तर में कुछ नहीं कहती हूँ कि इससे बेवजह का क्लेश होगा, घर की शांति भंग होगी। इससे अच्छा है चुपचाप अपने कर्तव्यों में लगे रहो। शायद एक दिन सब ठीक हो जाये लेकिन तुम ऐसी मत बनना बिट्टो। तुम अपनी मुस्कान, अपने सम्मान से कभी समझौता मत करना।” कहते हुए सीमा रो पड़ी।

“जब बच्चे छोटे और नासमझ होते हैं तब माता-पिता उन्हें सही रास्ता दिखाते हैं। वैसे ही बच्चों का भी फर्ज है कि अगर उन्हें लगे कि उनके माता-पिता कुछ गलत कर रहे हैं तब वो उन्हें रोके। अब तुम देखना माँ तुम्हारी ये बिट्टो क्या करती है।” अपनी माँ के आँसू पोंछते हुए आत्मविश्वास के साथ ऋचा ने कहा और रसोई में चली गयी।

जब राकेश घर वापस आया तब उसने ऋचा को खाना बनाते हुए देखा।
इससे पहले कि इस बात पर वो सीमा से कुछ कहता, ऋचा उससे बोली “पापा, मैं अपनी इच्छा से माँ का हाथ बँटा रही हूँ। उसने मुझसे कुछ नहीं कहा है।”

राकेश बिना कुछ बोले अपने कमरे की तरफ चला गया और हाथ-मुँह धोकर खाने की मेज पर आकर बैठ गया।

जब ऋचा उसके लिए खाने की थाली लेकर आयी तब राकेश ने स्नेह भरे स्वर में उससे कहा “आज तुमने पहली बार खाना बनाया है। इसलिए बताओ मेरी लाडली बिटिया को क्या उपहार चाहिए।”

“बस एक वचन चाहिए मुझे पापा कि आप मेरा विवाह उससे कीजियेगा जो मेरे भूखे रहने पर स्वयं भी खाना न खा पाये।” ऋचा ने सीमा की तरफ देखते हुए कहा।

अपनी बिट्टो की ये बात सुनकर आज पहली बार राकेश को सीमा के प्रति अपने गलत व्यवहार का अहसास हुआ।
सहसा वो कुर्सी से उठा और सीमा के पास जाकर बोला “आज हमारी बेटी ने मेरी आँखें खोल दी हैं सीमा। मुझे क्षमा कर दो। आज से, अभी से मैं हर कदम पर तुम्हारा साथ दूँगा।
आधा ही सही लेकिन अब इस उपवास में मैं भी तुम्हारे साथ हूँ और अगले वर्ष से मेरा ये उपवास आधा नहीं पूरा होगा।”

सीमा की आँखों में आज पहली बार खुशी के आँसू थे।
उस सीधी-सरल स्त्री को मानों उसके व्रत का फल मिल गया था।

उधर ऋचा मुस्कुराते हुए मेज पर से खाना हटाकर फ्रिज में रख रही थी।
अपने पापा की आँखों में शर्मिंदगी और पश्चाताप के मिले-जुले भावों को देखकर अपनी माँ की खुशियों के प्रति अब उसका मन आश्वस्ति से भर उठा था।
©शिखा श्रीवास्तव

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