सास बहू का रिश्ता : Saas bahu ki kahani

“अंतरा ! एक कटोरी खीर और देना। 

बहुत स्वादिष्ट बनी है ! “

“अच्छा…

 भैया लगता है खीर कुछ ज़्यादा ही अच्छी बनी है ! तभी आप और मांगकर खा रहे हो !”

श्रृष्टि ने एक पूरी अपने प्लेट में डालते हुए कहा।

निर्मला जी को भी खीर अच्छी लगी थी और सृष्टि को भी।

सुमित की बात सुनकर सृष्टि ने भी खीर की तारीफ करते हुए कहा,

“वाकई भाभी !

 खीर बहुत अच्छी बनी है !”

” और नहीं तो क्या… !

 मैं तो कहता हूं कि मां !

आप भी अंतरा से ऐसी खीर बनाना सीख लो। वरना आप तो बहुत ही पनियाला खीर बनाती हो !”

“अच्छा भैया ! 

भाभी के हाथ का खाना खाकर आप मां के हाथ के खाने के स्वाद को भूल गए !”

श्रृष्टि ने यूं ही मज़ाक किया।

तो सुमित भी यूं ही चुहल के अंदाज में बोल पड़ा।

“वो बात नहीं है बहना !

 पर अंतरा बिलकुल परफेक्ट खाना बनाती है। और इसकी बनाई हुई खीर तो एकदम मलाईदार होती है। 

मैं तो कहता हूं कि,

अंतरा मां से भी अच्छा खीर बनाती है ! “

दोनों भाई बहन इस बात से बिलकुल अनभिज्ञ थे कि यह सब सुनकर निर्मला जी पर क्या गुजरती होगी…

 और आज तो अंतरा की बहन अंशिका भी आई हुई थी सो सुमित कुछ ज़्यादा ही उत्साहित था। और अपनी रौ में बोले ही जा रहा था कि श्रृष्टि का ध्यान निर्मला जी की ओर गया।

वह कुछ असहज महसूस कर रहीं थीं।

शायद बहू के बहन की उपस्थिति से वह कुछ विचलित सी हो गई थीं। वह नहीं चाहती थी कि सुमित उनकी तुलना कल की आई हुई उनकी बहू अंतरा से करे।

 और वह भी बहू की बहन के सामने।

पर…

 सुमित ने शायद इस पर ध्यान नहीं दिया था और बोल पड़ा,

“श्रृष्टि ! 

मैं तो कहता हूं कि तू भी अंतरा से खाना बनाना सीख ले !”.

सुमित ने इतना बोलकर श्रृष्टि की तरफ़ देखा तो उसने आंखों से कुछ इशारा किया जिसे सुमित नहीं समझ पाया और उसने खीर की तारीफ जारी रखी।

तभी अचानक निर्मला जी खाने पर से बिना कुछ बोले ही उठ गईं।

जाते जाते श्रृष्टि ने उनकी भर आई आंखों को देख लिया था।

उसने मां का हाथ पकड़कर कहा,

” मां ! क्या हुआ ?

 आप खाना छोड़कर यूं चली क्यों आईं?

 और ऐसे क्यों रो रही हैं?”

तो मां ने रोते-रोते कहा,

” बेटा ! 

बचपन में तुम्हारे पिता के गुजर जाने के बाद मैं ने जैसे तैसे करके घर का खर्चा चलाया और तुम दोनों भाई बहनों को पढ़ा लिखा कर बड़ा किया।

 तब घर में इतना दूध नहीं बचता था कि मैं खीर में ज्यादा दूध मिलाती। इसलिए मैं पहले चावल को पानी में पका लेती थी। तब उसमें दूध मिलाती थी। इसलिए तुम्हें कभी खीर इतनी स्वादिष्ट नहीं लगी जितनी कि अंतरा ने बनाई है !”

मां की बात सुनकर सुमित की आंखें भी भर आईं और उसने कहा,

“ओह मां ! 

मुझे नहीं पता था कि आपने अपने मन के अन्दर इतना सारा दुख जब्त करके रखा है। 

आपने मुझे और श्रृष्टि को कभी पता ही नहीं लगने दिया !

“”क्या बताती बेटा !

 यह जीवन सुख दुख और अभाव प्रभाव का अनवरत खेल ही तो है। 

हर किसी की लाइफ में कोई ना कोई दुख होता ही है ! “

मां और कुछ कहती लेकिन रुंधे हुए गले से उनसे और कुछ बोला ना गया।

तभी पीछे से कमरे में आती हुई अंतरा ने भी उनकी बात सुन ली और कहा,

“सुमित !

 मैं समझती हूं कि मितव्ययिता से घर चलाने में अम्मा जी को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा होगा।

 अब तुम अम्मा जी का दिल कभी मत दुखाना !”

सुमित का मन भी यह सुनकर भर आया था।

तभी सृष्टि ने माहौल को हल्का बनाते हुए कहा,

“अब दुख भरे दिन बीते रे भैया;

सुख भरे दिन आयो रे… ! “

फिर सबकी समवेत हंसी से घर गुलजार हो उठा।

कई बार दुख के दिनों की परछाई सुख के दिनों में भी याद रहती है और आज ऐसा ही तो हुआ था।

तभी निर्मला जी अतीत में जाकर अपने दिनों को याद करके दुखी भी हुई थीं और थोड़ी सी विचलित भी हो गई थीं। 

आज एक एक करके उन्हें वह बातें याद आ रहीं थीं जब पति के जाने के बाद कैसे कैसे उन्होंने बड़ी मुश्किल से दोनों बच्चों की परवरिश की थी और अपने आपको भी किसी तरह इज्जत की जिंदगी जीने के लिए तैयार किया था। 

खुद को बचाना और बच्चों को बेहतर भविष्य देना उनके लिए आसान नहीं था।

इस क्रम में उन्हें आर्थिक अभाव के दिन भी देखने पड़े थे।

वैसे भी आर्थिक विपन्नता कई सारी खुशियों को लील लेती है।

इंसान जिंदगी की रोज की रोजमर्रा की परेशानियां में इतना उलझ जाता है कि वह अपने बारे में तो सोच भी नहीं पाता।

निर्मला जी ने भी तो कभी अपने बारे में

नहीं सोचा। 

ना दिन देखा ना रात देखा। बस लगी रही बच्चों को बेहतर भविष्य देने में ।आज सृष्टि की शादी हो गई थी और उनका बेटा सुमित भी सेटल हो गया था। उनके मन में एक संतोष था कि चाहे उन्होंने जितने भी संघर्ष किए हों…

जिन्दगी ने उन सबका प्रतिफल दोनों बच्चों के रूप में उन्हें दे दिया था।

जो उनके बच्चे अपनी मां के संघर्ष की कद्र करते थे और उनका सम्मान भी।निर्मला जी की किस्मत अच्छी रही कि उनकी बहू अंतरा भी उनका ख्याल रखती थी।

वैसे …

आज निर्मला जी को यह बात बुरी लगी थी कि सुमित ने उनकी बहू अंतरा की बहन के सामने यह बात फिर से कह दी थी। जिसे सुनकर वह पहले भी कई बार आहत हो चुकी थीं।

दरअसल अंतरा की बहन अंशिका भी उसी शहर में में हॉस्टल में रहती थी।

रविवार को अकसर वह अपनी दीदी के घर आ जाया करती थी।

इस रविवार को श्रृष्टि और उनका दामाद शिशिर भी आए थे।

 जो श्रृष्टि को पहुंचा कर चले गए थे।

ऐसे समय में सुमित के ऐसा बोलने पर कुछ देर के लिए उनका मन दुखी हो गया था और थोड़ी देर के लिए वह परेशान भी हो गई थीं।

पर…

जब उन्होंने देखा कि इस बात को किसीने ज्यादा तूल नहीं दिया और सुमित को भी अपनी बोली हुए बात की गलती का एहसास हो गया तो निर्मला जी फिर से सामान्य हो गईं।

निर्मला जी की बहू अंतरा शुरू से घर के सारे कामों में निपुण थी। और खाना बनाना उसे बहुत पसंद था। 

वह इतना स्वादिष्ट खाना बनाती थी कि सुमित से उसकी तारीफ किए बिना रहा नहीं जाता था ।। सुमित को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि इस बात से उसकी मां को तकलीफ होती होगी।

दरअसल …..

निर्मला जी भी एक कुशल गृहणी थीं और घर का रखरखाव सुनियोजित ढंग से करती थीं।

परंतु… 

एक सड़क दुर्घटना में पति श्रीधर जी के आकस्मिक निधन के बाद उन्हें उन्हीं के ऑफिस में लोअर डिविजन क्लर्क की नौकरी मिली थी। 

और फिर बड़ी मुश्किल से उन्होंने गृहस्थी की गाड़ी अकेले खींची थी। 

ऐसे में उन्हें बिल्कुल समय नहीं मिलता था कि बच्चों को रोज के सामान्य खाने के अलावा कुछ स्पेशल बनाकर खिला सकें । 

और कई बार तो इतने पैसे भी नहीं होते थे कि वह अलग से से कुछ खर्च कर पाती। 

उनका एक ही उद्देश्य था …

 कैसे भी दोनों बच्चे पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़े हो जाएं।

और इसके अलावा सृष्टि की शादी भी उनके लिए बहुत बड़ी समस्या थी।क्योंकि चाहे समाज कितनी भी उन्नति कर जाए। 

आज भी बेटी की शादी में दहेज ना भी दो तो सामान और गहने तो दे नहीं होते हैं।

 इन्हीं का जुगाड़ करते करते विमला जी ने बहुत ही कंजूसी से घर चलाया था और सही दिमाग से से काम लिया था।

 तभी आज यह चार कमरे का घर भी बनवा पाई थी। और बेटी की शादी भी करवा पाई थी।

श्रृष्टि भी एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब करती थी और दो साल पहले सुमित भी सेटल हो गया था।

अब जाकर जिंदगी ने उन्हें थोड़े सुकून के पल दिए थे। ऐसे में सुमित जब तब अपनी पत्नी के बनाए खाने की, 

उसके रखरखाव की, 

और उसकी कार्यकुशलता की तारीफ करता था तो ना जाने क्यों उनका मन आहत हो जाता था।

उन्हें लगता था कि …

सुमित उनकी और अंतरा की एक तरह से बराबरी कर रहा है। 

और उन्हें यह बताने की कोशिश कर रहा है कि,

उसकी मां अच्छा खाना नहीं बनाती थी। 

और और उसकी मां घर भी बहुत अच्छे से संभाल कर नहीं रखती थी।

यह सब सुनकर निर्मला जी सुमित से कहना चाहती थी कि…

अंतरा तो सिर्फ घर संभालती है। कोई नौकरी तो नहीं करती ना… !

मैंने तो दोनों काम एक साथ किया है।

लेकिन यह सारी बातें उनके मन में ही रह जाती थी।

वैसे भी यह सिर्फ आज के आंसू नहीं थे। 

बल्कि पिछले काफ़ी समय से यह दर्द उन्होंने अपने सीने में दबा रखा था।

देखा जाए तो अंतरा के आने के बाद से ही सुमित ने ऐसा कहना शुरु किया था।

सुमित की शादी को लगभग एक साल होने आया था। 

इस एक साल में सुमित ने अक्सर अपनी पत्नी के बनाए खाने की और बाकी चीजों की प्रशंसा कर करके एक तरह से दुख के साथ छोटी सी द्वेष की भावना भी पैदा कर दी थी निर्मला जी के मन में।

जो आज आंसुओं के सैलाब के रुप में बाहर आ गया था।

वह तो यह बात बहुत अच्छी थी कि अंतरा बहुत समझदार थी और स्थिति को उसने बहुत ही कुशलता से संभाल लिया था।

अंतरा ने आज निर्मला जी के दर्द पर रुई के शीतल नरम फाहे की तरह अपने मृदु स्वाभाव, 

कोमल आवाज और सहानुभूति पूर्ण शब्दों को रखकर दूर कर दिया था।

और इसके साथ ही…

आज श्रृष्टि की सकारात्मक सोच ने सबका मन भी बदल दिया था और माहौल भी।

और … 

सबसे बड़ी बात कि…

सुमित भी अपनी मां का दर्द समझ गया था।

जब अपने साथ होते हैं और एक दूसरे का दुख समझते हैं तो दुख का पैरामीटर बदलता रहता है।साथ रहते हुए एक दूसरे की प्रशंसा करना एक सामान्य सी बात है।लेकिन ….

तुलनात्मक प्रशंसा ….??

वह भी सास और बहू में ….??

सुमित तो जैसे आग से खेल रहा था ।

वह तो अच्छा हुआ कि अंतरा ने बड़ी समझदारी से बात को बढ़ने से रोक दिया।

और श्रृष्टि ने माहौल को सामान्य बना दिया।

वरना तो पता ना जाने कब तक निर्मला जी के मन में यह बात गांठ बनकर चुभती रहती और वह अपनी बहु और बेटे से सामान्य व्यवहार नहीं कर पाती।

समय रहते रिश्ते को संभाले लेना।

और एक दूसरे की बात को दिल से ना लगाना।

दूसरे की मनःस्थिति को समझकर व्यवहार करना।

कटु वचन ना बोलकर शांति से अपनी बात रखना ही रिश्ते की खूबसूरती है और इस तरह से ही निभाए जाते हैं।

समाप्त

लेखक – ललित राणा

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