दोहरा चेहरा (हाथी के दाँत खाने के कुछ तो दिखाने के कुछ) – के कामेश्वरी

रामचंद्र जी एक छोटे से गाँव में स्कूल टीचर थे । उनकी दो बेटियाँ और एक बेटा था । पत्नी राधिका पति के कमाए हुए पैसों से ही बच्चों को पढ़ाते हुए उसने अपने घर को स्वर्ग बना लिया था । घर में सुख शांति थी। बड़ी बेटी की शादी भी उन्होंने अपने तरीक़े से कुछ गहने कपड़े देकर अच्छे से कर दिया था । अब उन्हें छोटी बेटी रजनी के शादी की फ़िक्र हो रही थी । वह डिग्री की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक ऑफिस में नौकरी कर रही थी । 

उस दिन स्कूल से वे घर आए उनके फ्रेश होने के बाद चाय देते हुए राधिका ने कहा कि मेरी बहन एक रिश्ता लेकर आई है रजनी के लिए माता-पिता दोनों ही नौकरी करते हैं अकेला लड़का है वह भी एक कंपनी में नौकरी करता है । उनका खुद का घर भी शहर में है।  इससे अच्छा रिश्ता कहाँ मिलेगा । 

रामचंद्र ने कहा कि— ठीक है । एक बार रजनी से भी पूछ लो । 

राधिका ने कहा— वह बच्ची है उसे क्या मालूम है । हम जैसा कहेंगे वैसा ही सुनेगी । उसे मैं समझा दूँगी आप जाकर उनसे बात कर लीजिए । 

माता-पिता को नहीं मालूम था कि रजनी किसी को प्यार करती है। अब बात बढ़ गई थी तो रजनी ने शादी के लिए मना किया परंतु माँ के आगे उसकी एक न चली। उसने सोचा कि उनसे मिल लेती हूँ बाद में मना कर दूँगी । 

उन्होंने दो दिन बाद आने की ख़बर दी । राधिका बहुत ही खुश हो गई थी । वे लोग समय पर आ गए थे जैसे ही रजनी ने लड़के को देखा वह आश्चर्यचकित रह गई क्योंकि वह तो वरुण है दोनों ने एक दूसरे को देखा और चुप ही रहे ।




 उसके माता-पिता ने रामचंद्र से बातें की और इन दोनों से कहा कि तुम दोनों एक-दूसरे से बात करके अपनी राय हमें बताएँ । उन्हें मालूम ही नहीं था कि वे दोनों एक-दूसरे को पहले से ही जानते हैं और शादी करना चाहते हैं । 

जैसे ही वे छत पर पहुँचे रजनी ने कहा कि मैं तो सिर्फ़ अपने माता-पिता की बात मानकर आ गई थी सोचा बाद में पसंद नहीं है कह दूँगी । वरुण ने कहा सेम हियर मैंने भी सोच लिया था कि बाद में मना कर दूँगा । चलो कोई बात नहीं है हमारी इच्छा पूरी हो रही है हम हाँ कह देते हैं ऐसा सोचा और नीचे आकर कह दिया था कि हमें मंज़ूर है । इनके हाँ कहते ही मिठाई बँट गई थी और सब एक-दूसरे को बधाई देने लगे।

 वरुण की माँ ने कहा कि — चलिए जब बच्चों ने हामी भर दी है तो हम आगे की बातें कर लेते हैं ।

रामचंद्र जी ने कहा कि— ठीक है मैंने आपको पहले ही बता दिया है कि मैं एक स्कूल में टीचर हूँ । अपनी हैसियत के हिसाब से मैं शादी कर दूँगा । 

वरुण की माँ ने भी कहा कि— देखिए समधी जी हमारा एक ही बेटा है घर बार और थोड़े से खेत खलिहान हैं हमारे और आप जानते हैं कि हम दोनों नौकरी करते हैं। आप सोच समझ कर बेटी की शादी कर दीजिए । मैंने भी बहू के लिए गहने तैयार करके रखे हैं । वरुण की माँ सावित्री जी अनकहे ही बहुत सारी बातें कह दी थी । 

रामचंद्र जी ने सोचा ठीक है इस लड़की के ब्याह के बाद तो और कोई ज़िम्मेदारी नहीं है तो उन्होंने अपनी हैसियत से बाहर जाकर खर्च करने की कोशिश की थी । सावित्री ने शादी के दस दिन पहले रामचंद्र जी को ख़बर भेजी थी कि हम इन दोनों की शादी मंदिर में सिंपल तरीक़े से करेंगे । 

रामचंद्र जी को समझ में नहीं आ रहा था कि लास्ट मिनट में क्या हो गया है । रामचंद्र जी ने शादी के दिन जो भी गहने बनवाया था लड़की को पहनाया था। 

उन्होंने देखा सावित्री जी ने बहू को गहनों के नाम पर सिर्फ़ एक काला पोत दिया था वह भी आधे तुले से ज़्यादा नहीं था । 




सोचा कोई बात नहीं है जो भी है वह तो बहू का ही होगा दिखावा पसंद नहीं करते होंगे । शादी के बाद बेटा बहू को लेकर सावित्री अपने घर पहुँची तो घर आए लोगों को चाय क्या पानी भी नहीं पूछा और सबको भेज दिया था । 

ससुराल पहुँच कर रागिनी को पता चला कि उनके पास कुछ भी नहीं है। सासुमाँ सिर्फ़ दिखावा कर रही थीं यहाँ तक कि उन्होंने अपना मंगलसूत्र तुड़वाकर बहू के लिए काला पोत बनवाया था । वे नहीं चाहतीं थीं कि सबको उनकी हालत का पता चले इसलिए मंदिर में शादी करवाई थी। रजनी को ग़ुस्सा आया था कि मेरे पिता से बहुत कुछ माँग लिया था पर खुद की हालातों के बारे में नहीं बताया था वाह रे सासु माँ आप तो दोगली निकली इसीलिए कहते हैं कि “हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और होते हैं । 

उसने वरुण को आड़े हाथों लिया था कि आपको अपने घर के हालात मालूम नहीं थे क्या आपकी माँ ने तो मेरे माता-पिता के सामने बहुत डींगें हाँकी थी । 

वरुण ने कहा- प्लीज़ रजनी मुझे माफ़ कर दो हमारा घर माँ ही चलाती हैं।  मुझे तो घर के हालातों के बारे में कुछ भी नहीं मालूम है शायद तुम्हें विश्वास ही नहीं होगा मैं कुछ नहीं जानता हूँ पर यह सच है । मैंने अपनी पढ़ाई हॉस्टल में रह कर की है नौकरी जब लगी तब यहाँ पहँचा हूँ । रजनी ने कहा कि यह काला पोत मैं नहीं पहनूँगी क्योंकि आपकी माँ ने अपना मंगलसूत्र तुड़वा कर बनवाया था । वरुण ने कहा ठीक है तुम शांत रहना मैं सब ठीक कर दूँगा । 

रजनी तो दोहरी मानसिकता में जी रही थी । माता-पिता के सामने सास का असली चेहरा लाकर उन्हें दुखी नहीं कर सकती थी साथ ही अब ससुराल उसका घर है और वरुण से वह बहुत प्यार करती है इसलिए उसने सोचा चुपचाप रहना ज़्यादा बेहतर है और उसने अपनी ज़िंदगी से समझौता कर लिया था। 

दोस्तों हमारे समाज में ऐसे कई लोग मिल जाते हैं जो लोगों को एक दिखाते हैं और होते कुछ और हैं । रागिनी को अच्छा पति मिल गया था इसलिए आज वह खुश है परंतु बहुत से परिवार इस छलावे से टूट भी जाते हैं । 

स्वरचित मौलिक 

#दोहरे चेहरे 

के कामेश्वरी

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