बहू नहीं बेटी है मेरी

सुनीता जी के घर में पूरा चहल-पहल था क्योंकि उनकी बेटे की शादी जो होने वाली थी घर में सारे मेहमान आ चुके थे अगले दिन ही बारात जाने वाली थी। सुनीता जी के पति का देहांत एक कार एक्सीडेंट के दौरान हो गया था तब से उन्होंने अपने पति के सारे बिजनेस को खुद हैंडल करती थी वह ज्यादा पढ़ी-लिखी तो नहीं थी लेकिन उन के तौर-तरीके पढ़े-लिखों से भी ज्यादा मॉडर्न था उनको देखकर कोई भी नहीं कह सकता था कि वह सिर्फ मैट्रिक पास हैं।

सुनीता जी काफी अच्छी अंग्रेजी भी बोल लेती थी।  इतना अच्छा से अपने बच्चों को पालन पोषण किया कि आज इतने ऊंचे ऊंचे पद पर पहुंच गए थे, एक बेटा उनका डॉक्टर था तो दूसरा बेटा चार्टर्ड अकाउंटेंट, जिसकी शादी कल होने वाली थी।

सुनीता जी को शुरू से ही बेटी बहुत पसंद थी लेकिन उनके नसीब में बेटी नहीं थी सिर्फ दो बेटे ही थे। वह हमेशा यही सोचती थी कि जब वह अपने बेटे की शादी करेंगी तो अपनी बहू को वह बेटी की तरह रखेंगी लेकिन उनका सपना बड़े बेटे से पूरा तो नहीं हो सका क्योंकि उनका बड़ा बेटा अमेरिका में डॉक्टर था और वहीं पर एक एन आर आई लड़की से शादी कर के सेटल हो गया था।  अब उनकी आंख उनका छोटा बेटा मोहित जो जयपुर में ही चार्टर्ड अकाउंटेंट था और वह अपने मम्मी के ज्यादा करीब भी था।

अगले दिन बारात गई धूमधाम से शादी हुई और उनकी प्यारी दुल्हन आशिमा का घर में गृह प्रवेश हो चुका था।  कुछ दिनों के बाद सुनीता जी सोच रही थी कि अब घर की जिम्मेवारी बहू पर देकर वह सिर्फ अपना ध्यान बिजनेस पर देंगी।  जब वह घर को पूरी तरह से संभाल लेगी तो वह उसको अपने साथ बिजनेस में भी ले जाएंगी और फिर इन सब से रिटायर होकर एक सन्यासी की जीवन जिएंगी।

ऐसे करते-करते महीना बीत गया अब समय था आशिमा को घर की जिम्मेदारी सौंपने का उन्होंने अपनी बहू को आवाज़ लगाई।   बहू के आने तक सुनीता जी अपने स्मृतियों में खो गई जब वह नई नई बहू बनकर इस घर में प्रवेश किया था।



उनके शादी के अभी 1 दिन भी नहीं बीते थी तब तक उनकी सास ने कैसे अपने कमरे में उनको बुलाया था और उसके बाद इस घर के नियम कानून समझाने लगी देखो बहू आज के बाद तुम्हें इस घर को संभालना है।  सुनीता जी ने अपने आप को बहुत ही गौरवान्वित महसूस किया कि शादी के पहले दिन ही उनकी सास ने उनको घर की जिम्मेवारी सौंप दिया।

लेकिन कुछ देर के बाद उन्हें पता चला कि उन्हें तो जिम्मेवारी नहीं दिया जा रहा है बल्कि एक नौकरानी को जब रखा जाता है तो उसे घर का सारा काम समझाया जाता है बस वही उनके साथ किया जा रहा है।  चंद मिनट भी नहीं लगे बहू से नौकरानी बनने में।

अब घर का काम करते-करते कब सुबह से शाम हो जाता था यह सुनीता जी को भी पता नहीं चलता था।  कहने को तो उनकी शादी कितने अमीर घर में हुई थी लेकिन उनकी हैसियत इस घर में एक नौकरानी से ज्यादा नहीं था।  सुनीता जी के पति कौशल भी जब मर्जी सुनीता जी को पीट देते थे जरा सी भी गलती होने पर वह हमेशा सुनीता जी को मरते पीटते रहते थे। वह हमेशा शराब के नशे में रहते थे।

धीरे धीरे शराब और जुए में इस घर को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया था कुछ दिन के बाद समय ऐसा आया कि घर में खाने-पीने के भी लाले पड़ने लगे।  लेकिन उनके सासू मां का स्वभाव में कहीं भी भी परिवर्तन नहीं आया था। घर में खाने को एक दाना नहीं होता था लेकिन खाने के टेबल पर सबको राजशाही भोजन ही चाहिए था।

सुनीता जी के पति के एक्सीडेंट के बाद कितनी मुश्किल से उन्होंने इस घर को संभाला। और उसी समय उन्होंने निश्चय किया कि वह अपने बच्चे को इतना लायक बनाएंगी कि यह जमाना उन पर गर्व करेगा और अपनी बहू को तो अपने जैसे बहू कभी नहीं बनने देंगी।

सुनीता जी  अपनी स्मृतियों में ही खोई हुई थी तभी उनकी बहू आशिमा  ने उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा माँ जी बोलिए किस लिए बुलाया आपने।



सुनीता जी बोली बेटा जी बैठो आप यहां,  देखो अब मैं चाहती हूं कि आपको आए हुए भी इस घर में 1 महीने से ज्यादा हो गया है इसलिए अब आप  इस घर की जिम्मेवारी लो। सुनीता जी घर की चाबियां पकड़ाती हुई आशिमा को घर चलाने के सारे तौर तरीके समझा दिया।

घर में किस दुकान से घर का सारा सामान आता है, नौकरों की तनख्वाह कितनी है, हर चीज आशिमा को  सुनीता जी ने प्यार से समझा दिया और बोला बेटा जी अब इस घर की सारी जिम्मेदारी आप पर है अगर आपको कोई भी दिक्कत होता है तो आप मुझसे बेहिचक पूछ सकती हैं।

आत्मा को सचमुच ऐसी साथ पाकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस हो रहा था।  उसे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि किसी के साथ ऐसी भी हो सकती है।

आशिमा भी धीरे-धीरे इस घर के तौर-तरीके को समझ गई थी और बहुत जल्दी ही सब कुछ अपने अंडर में कर लिया था सुनीता जी को अपने बहू पर फक्र हो रहा था जैसा बहू की कल्पना उन्होंने की थी बिल्कुल आशिमा वैसी ही थी सुनीता जी की बिल्कुल ही प्रतिबिंब।

कुछ सालों बाद सुनीता जी ने सब कुछ छोड़कर मथुरा में उन्होंने एक  विधवा और असहाय महिला के लिए एक छोटा सा आश्रम बनाया और वहां पर ही रहने को निश्चय किया।

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