बदनुमा दाग ( भाग 2)- माता प्रसाद दुबे : Moral stories in hindi

Moral stories in hindi : “वह अपने कमरे में है बेटा! शांति देवी प्रभात को कमरे की ओर दिखाते हुए बोली। “ठीक है अम्मा!अभी मैं आपके और बाबूजी के पास आता हूं ” कहकर प्रभात अपने कमरे में चला गया गीता चुपचाप खड़ी प्रभात की ओर देख रही थी।

रात के ग्यारह बज रहे थे, रामप्रसाद जी के कमरे में प्रभात गीता मौजूद थे, शांति देवी ने सारी बातें रामप्रसाद जी को बताई जिसे सुनकर रामप्रसाद जी के माथे पर से पसीने की बूंदें टपकने लगी। “यह सब तुम्हें किसने बताया?” रामप्रसाद जी शांति देवी से सवाल करते हुए बोले।

” मैंने बताया है बाबूजी” प्रभात ने सारी बातें रामप्रसाद जी को बताई जिसे सुनकर वह सिर पकड़कर चुपचाप बैठ गए। मालती राकेश नाम के एक लड़के जो उसी के कालेज में पढ़ता था, उससे प्रेम करती थी,वह काफी पैसे वालें परिवार का लड़का था,दो साल पहले उस पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ था,मगर पैसे के दम पर सबूतों से छेड़छाड़ बयान बदलवाकर वह अदालत से बरी हो गया था,

पीड़ित परिवार ने उसके खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की थी। यह सारी जानकारी प्रभात को राकेश के बारे में छानबीन करने पर पता चली थी जिसे उसने अपने पिता रामप्रसाद जी मां शांति देवी को विस्तार पूर्वक बताईं।

“क्या हमारी बेटी मालती! मेरे सम्मान को मटियामेट करके उस पर दाग लगाना चाती है?” रामप्रसाद जी गंभीर होते हुए बोले। “हमारी परवरिश और संस्कारों में तो कोई कमी नहीं है,फिर मेरी बेटी ऐसा कैसे कर सकती है,उसने इतना बड़ा कदम उठाने से पहले हमें एक बार भी नहीं बताया?” कहते हुए शांति देवी की आंखों से आंसू टपकने लगें।

“इतना ही नहीं है अम्मा! मालती कयी दिन कालेज भी नहीं गई,वह राकेश के साथ चली जाती थी,और कालेज की छुट्टी के समय के बाद घर आती थी ” कहकर प्रभात गहरी चिंता में डूब गया।
दूसरा प्रहर शुरू हो गया था,दो बज रहे थे, मालती अपने कमरे में चुपचाप फोन पर राकेश से बात करते हुए धीरे-धीरे हंस रही थी।

“मालती! दरवाजा खोलो” रामप्रसाद जी मालती के कमरे का दरवाजा खटखटाते हुए बोले। मालती रामप्रसाद जी की आवाज सुनकर सकपका गई उसने तुरंत फोन बंद कर दिया और दरवाजा खोलते हुए बोली। “क्या हुआ पापा! दरवाजा खोलते ही मालती चौक गयी उसके सामने पूरा परिवार खड़ा हुआ था।

“राकेश!से बात कर रही थी इतनी रात में” रामप्रसाद जी गुस्साते हुए बोलें। ” नहीं पापा! मैं तो सो रही थी ” मालती अंजान बनते हुए बोली। “झूठ मत बोलो,हमें तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी,क्या कमी रह गई है हमारी परवरिश में,जो तूं हम सब के मुंह में कालिख पोतना चाहती है?” शांति देवी गुस्से से चीखती हुई बोली।

“इसमें हमारी परवरिश का दोष नहीं है शांति,दोष जमाने का है जिसमें सम्बन्ध बनाना फैशन बन गया है, मोबाइल टीवी फिल्मों में रिश्तों की दुकान खुली है,खुलापन नशे में झूमना,जिसका प्रभाव खासकर लड़कियों को गुमराह कर रहा है ” रामप्रसाद जी शांति देवी को चुप कराते हुए बोले। मालती चुपचाप खड़ी रामप्रसाद जी की बातें सुन रही थी। “मालती! हमें सब कुछ पता हैं,झूठ बोलने से किसी चीज का हल नहीं होता”

प्रभात मालती की ओर देखते हुए बोला। मालती कुछ देर तक शांत खड़ी सबकी बातें सुनती रही। “बाबूजी! अम्मा! मैं राकेश से प्रेम करती हूं,हम लोग एक साल से एक दूसरे को जानते हैं,हम शादी करना चाहते हैं” मालती सभी लोगों की तरफ़ देखते हुए बोली। “क्या तुम ऐसे इंसान से शादी करना चाहती हों,

तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है” प्रभात गुस्से में चीखता हुआ बोला। रामप्रसाद और शांति देवी हैरत भरी नजरों से मालती की ओर देख रहें थे। दरवाजे के एक कोने पर खड़ी गीता सब कुछ देख रही थी,मगर वह एक भी लफ्ज़ नही बोली।

“भैया आपको गलतफहमी हुई है, राकेश को अदालत ने निर्दोष मानकर बरी कर दिया है” मालती राकेश का पक्ष रखते हुए बोली। “उच्च अदालत में उसके खिलाफ केस चल रहा है” प्रभात मालती को समझाते हुए बोली।

“वहा भी राकेश को कुछ नहीं होगा,वह ऐसा कर ही नहीं सकता उसे फंसाया गया है” मालती दुबारा राकेश का पक्ष लेते हुए बोली।

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बदनुमा दाग ( भाग 3)

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माता प्रसाद दुबे
मौलिक स्वरचित अप्रकाशित कहानी लखनऊ

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