तीसरी पारी – शुभ्रा बैनर्जी : Short Moral Stories in Hindi

Short Moral Stories in Hindi : बहुत अनोखा है ईश्वर के न्याय का अंदाज।कल तक औरों को यही कहकर हौसला देती थी प्रभा कि धीरज धरना सीखो,ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं।आज लगभग तीन साल के बाद , यूनिफार्म वाला क्रीम रंग का कोट पहने ऑटो में बैठकर फिर से स्कूल जा रही थी वह।सपने में भी नहीं सोचा था कि,ऐसे वापसी होगी उसकी।

सोलह वर्ष की आयु में पिता को खोकर उनकी जगह घर चलाने की जिम्मेदारी लें ली थी उसने। सरस्वती मां की कृपा सदा से रही उस पर।उसी के पहली कक्षा के शिक्षक अध्यक्ष थे,उस विद्यालय के।तुरंत नौकरी मिल गई थी, विद्यालय में।

घर पर भी ट्यूशन करती थी वह।कुछ और काम तो उसको आता ही नहीं था।अपनी मेहनत और लगन की बदौलत अच्छे शिक्षकों में नाम होता था उसका। सम्मान भी खूब मिला,जिससे आत्मसम्मान बढ़ता गया प्रभा का।

पांच साल तक नौकरी करने के बाद जब शादी तय हुई तो,सभी सहकर्मियों ने शर्त लगाई थी कि अब आपको नौकरी करने नहीं दिया जाएगा, ससुराल में।प्रभा ने भी भारी मन से छोड़ा था विद्यालय।

ससुराल में दो चार महीने तो अच्छे से कटे, पर फिर खाली हांथ बैठना सुहाया नहीं उसे।ससुराल में शायद ही किसी औरत ने नौकरी की होगी,पर प्रभा की सास को तो जैसे भगवान ने अलग सांचे से बनाया था।

पहले घर पर ट्यूशन करने की अनुमति सहज ही दे दी उन्होंने,फिर एक अच्छे कान्वेंट में अवसर मिलने पर सहर्ष अपनी स्वीकृति दी थी।भोर में उठकर रसोई के सारे काम निपटा कर,हड़बड़ी में दौड़ती -भागती ऑटो में बैठकर प्रभा ने अपनी दूसरी पारी शुरू की।

अगले बीस सालों में बहुत कुछ हुआ।ससुर लकवाग्रस्त होकर आठ साल बिस्तर पर रहे।प्रभा ने नौकरी नहीं छोड़ी।बच्चों के बीच रहकर वह अपना सारा दुख भूल जाती थी।आंखें दिखाकर उन्हें डराने की कला में जैसे माहिर थी प्रभा ,वैसे ही निःस्वार्थ प्रेम बांटने में कभी कंजूसी नहीं की थी उसने।

विद्यालय के मुख्य दरवाजे पर पहुंच कर वह मानो स्वर्ग में होती।उसी विद्यालय में दोनों बच्चे पढ़कर निकल गए। आंधी-तूफान,बारिश,बीमारी उसका विद्यालय जाना नहीं रोक पाए।

पति की आकस्मिक किडनी की बीमारी में भी ,कोविड की वजह से आनलाईन पढ़ाती रही वह।हद तो तब हो गई ,जब एक दिन पति को डायलिसिस के लिए ले जाने पर ,सासू मां बगीचे में पैर फिसलकर गिर गईं।

कूल्हे की हड्डी टूटी थी।प्रभा फिर भी नहीं हारी।पति को रायपुर में बेटा भर्ती करवाने गया,प्रभा सासू मां की देखभाल करती रही।अचानक एक दिन बेटे ने फोन किया ” मम्मी ,पापा को संभालना अब मेरे लिए बहुत मुश्किल हो रहा है। बार-बार आपको याद कर रहें हैं।

जल्दी से आ जाओ ।”बेटी के भरोसे सासू मां को छोड़कर जब रायपुर पहुंची,पति वैन्टीलेटर पर थे।बेटे ने बताया कि हालत ठीक नहीं है।वहीं एक हफ्ता रुकी थी प्रभा।पी पी टी पर आनलाईन क्लास लेना नहीं भूली वह।एक हफ्ते के बाद घर लौटी और अगले ही दिन बेटे ने बताया पापा नहीं रहे।

अब प्रभा के लिए तय कर पाना मुश्किल हो रहा था,कि क्या करे? रिश्तेदार आए और पति की तेरहवीं के अगले दिन ही चले भी गए।ननदों ने एक बार भी‌ यह बोलने की ग़लती नहीं की कि,मां को ले जातें हैं अपने साथ, या यहां कुछ दिन रुक जातें हैं।बेटी का इंटर्नशिप भी आ गया और उसे जाना पड़ा।

अब घर में रह गए बेटा,सास और प्रभा।बेटे को भी अपनी नौकरी बहाली के लिए,सारा – सारा दिन भटकना पड़ रहा था।प्रभा पंद्रह दिनों के बाद विद्यालय पहुंची।पिछले जन्म के पुण्य ही होंगे जो सिस्टर्स ने हमेशा उसका साथ दिया।घर आकर देखा ,काम वाली बाई नहीं आई थी।सास सुबह से उसी डायपर को पहने थी,प्रभा को देखते ही रोने लगी।

प्रभा समझ गई थी कि अब उसका नौकरी पर जाना संभव नहीं।जिस मां ने अपनी परिवार की परंपरा के विरुद्ध जाकर अपनी बहू को नौकरी पर भेजा।जिसने अपने दोनों नाती- नातिन को पाल-पोस कर इतना बड़ा कर दिया।जिस मां ने थक कर लौटी हुई प्रभा के हांथ में पानी का गिलास बिना मांगे पढ़ाया।

जो मां  अपनी बहू के बैग में टिफिन और पानी रखना कभी नहीं भूली।जिसने हमेशा प्रोत्साहित किया कुछ अच्छा और नया करने के लिए,आज उस सास को नहीं,उस मां को जरूरत है अपनी बेटी की।अगले ही दिन प्रभा त्यागपत्र के साथ विद्यालय गई।

प्रिंसिपल ने समझी सारी परेशानियां। हिम्मत देते हुए बोलीं”तुमने जो निर्णय लिया है,उसके लिए साहस चाहिए।तुम्हारा स्कूल है,जब तुम्हें सही लगे तब आना।तुम हमसे कभी अलग नहीं होगी।

अब प्रभा की सारी भाग-दौड़ बंद हो चुकी थी।स्कूल ना जाना किसी अभिशाप से कम नहीं था।ऐसा लग रहा था जैसे अवसादग्रस्त हो जाएगी प्रभा।उसे तो और कुछ में आनंद ही‌ नहीं आता था।रोते हुए दिन कट रहे थे उसके।

एक दिन बेटी ने उसकी नसों में हौसला और भर दिया यह कहकर”मम्मी ,सोलह साल की उम्र से भाग रही हो ना तुम,बिना रुके,बिना थके।यह भी तो ठीक नहीं।अब थोड़ा ख़ुद को समय दो।जो शौक थे तुम्हारे,उन्हें पूरा करो।

आराम करो अब कुछ दिन।यह पूर्ण विराम नहीं तुम्हारे जीवन का,अल्प विराम है।”बेटी ने मानो उसकी अंधेरी हुई ज़िंदगी में उम्मीद की नई किरण जगा दी।सच ही तो कह रही है वह,अब इस अल्पविराम की जरूरत थी ,ईश्वर को पता था सही समय।

प्रभा अपने लेखन के शौक को निखारने लगी। अच्छी-अच्छी किताबें पढ़ने लगी।घर पर रहकर मां की सेवा करने का पुरस्कार यह मिला कि असंभव सा लगने वाला उनका चलना सच हो गया।उसकी दिन भर की बक-बक से ,मां भी अपने इकलौते जवान बेटे की असमय मृत्यु का दुख संभालने लगी।दो साल होने को आ रहे थे।अभी तक किसी को विश्वास ही नहीं हो पाया था कि प्रभा अब नहीं जाती विद्यालय।

जून ख़त्म होने वाला था,जुलाई से कक्षाएं शुरू हो जाएंगी।प्रभा विद्यालय में तो नहीं थी पर सभी से जुड़ी थी।तीस जून को ही प्रिंसिपल सिस्टर का फोन आया “अब और देर नहीं,प्रभा।

अब तुम्हारी वापसी का समय हो गया है।पूरे समय के लिए ना सही आधे दिन के लिए ही ज्वाइन कर लो।सुबह देर से आ सकती है,मां को दवाई वगैरह लेकर,और दोपहर में जल्दी चले जाना।हमें तुम्हारी जरूरत है।

“प्रभा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।ऐसी कोई अति विशिष्ट श्रेणी में तो नहीं ही आती है वह।उसकी जरूरत है विद्यालय को,मतलब वह खत्म नहीं हुई अभी।उसकी निःस्वार्थ सेवा और प्रेम का बीज अंकुरित ही नहीं तरुवर बन चुका है।

आज के जमाने में जब अपनों को अपनों की जरूरत नहीं,ऐसे में इतने बड़े संस्थान को उसकी जरूरत है,यह अपने आप में प्रभु का प्रसाद है।प्रभा ने बेटे और बेटी को बताया”मैं कल से स्कूल जा रही हूं।ऑटो वाले को बोल देना।”

दोनों बच्चों को पता था यही मेरी कामना थी ,है और रहेगी। स्कूल से दूर होकर मैं निष्प्राण ही थी।

“ऑटो आ गया” ,सासू मां ने कहा। भाग-दौड़ फिर शुरू हो गई।अब प्रभा को ख़ुद ही अपना टिफिन और पानी रखना पड़ रहा है।सासू मां लाठी लेकर ही सही पर चल रहीं हैं।घर भी संभाल लेंगी पहले की तरह।

प्रभा ने आज तीसरी पारी की शुरुआत की है।

शुभ्रा बैनर्जी

(v)

Leave a Comment

error: Content is Copyright protected !!