कारगिल एक प्रेमकथा (भाग 3 ) : Moral stories in hindi

Moral stories in hindi : अब तक आपने पढ़ा……

पचमढ़ी के निकट झिरपा ग्राम में ग्राम प्रधान महेश्वर तिवारी की बड़ी बेटी वंदना के विवाह समारोह में वंदना के होने वाले पति पंकज गौतम का मित्र एक सुमधुर गीत सुनाता है, जिसे सुनकर वंदना की छोटी बहन जो कि शिमला में नौकरी करती है, के दिल में हलचल पैदा हो जाती है… अब आगें
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उर्वशी निश्चय कर चुकी थी कि संगीत प्रोग्राम खत्म होते ही वह उस युवक से मिलकर उसे उसके इस बेहतरीन गायन के लिये उसे शुभकामनायें देगी, और इसी बहाने उसकी उस युवक से जान पहचान भी बढ़ सकती है… मग़र वहां उपस्थित लोगों का जमावड़ा उस युवक को बधाइयां देने के लिए इतना आतुर था कि, वह सब उस युवक को उसी गीत को पुनः सुनाने के लिए अनुरोध कर रहे थे, उन सबके शोर के बीच में संकोचवश उर्वशी उस युवक से मिलकर बात करने के लिए हिम्मत ही न कर सकीं।
देर रात तक चले प्रोग्राम के कारण उर्वशी को सोने में देर हो गई, आज उसे आखिरी बार अपनी बहन वंदना के साथ गप्पे लड़ाते हुये सोने जाना था, क्योंकि सुबह ही तो उसकी विदाई थी.. ऊर्वशी बहुत भावुक हुये जा रहीं थी।
उन दोनों बहनों ने भावनाओं में बहते हुए सारी रात बात की, शादी के बाद ऐसा करना, ऐसा नहीं करना, रोज़ फ़ोन करना मत भूलना, जीजू से झगड़ा मत करना, ससुराल वालों को इज्जत देना… उम्र में दो वर्ष छोटी उर्वशी आज वंदना को यूँ समझा रही थी जैसे कि वह उसकी बड़ी बहन या माँ हो…
अगले दिन जल्दी सुबह उठते ही विदाई का कार्यक्रम प्रारंभ हो चुका था, वंदना अपने पिता और बहन उर्वशी से लिपट लिपट कर रो रही थी।
उसके साथ साथ उर्वशी भी आँसू बहाए जा रही थी, बड़ा की भावुक दृश्य था वह…
बहन की विदाई के पलों में उवर्शी को उस युवक से बात करने की बात भूल ही गई..जब वंदना दीदी और पंकज जीजाजी की बारात वाली बस उस गाँव से रवाना होने लगी, तब उर्वशी ने आख़िरी बार उस युवक को भी देखा, जो बस की खिड़की टकटकी लगाये उसे ही देख रहा था, मानों उसकी मौन आँखें कुछ कहना चाहती हों।
वंदना दीदी की विदाई के बाद तो उर्वशी को घर काटने को दौड़ रहा था.. वंदना दीदी का कमरा, कॉपी पुस्तकें, कपड़े, घर की वस्तुओं को देखकर उर्वशी को वंदना दीदी का अस्तित्व उस घर मे अब भी नज़र आ रहा था, इधर घर पर विवाह में आये हुये मेहमानों की विदाई का दौर चल रहा था, इसलिए पिताजी उन सबकी विदाई में व्यस्त थे।
दो दिन बाद ही उर्वशी को भी शिमला के लिए वापस निकलना था, लिहाजा घर में सबकी विदाई के बाद उसने भी अपने जाने की तैयारी शुरू कर दी थी।
अगले दिन वंदना दीदी का फ़ोन सुनकर उर्वशी चहक उठी उन दोनों ने बहुत देर तक बात की, उसके बाद जब पंकज जीजाजी ने वंदना दीदी से कहा कि वह भी अपनी साली साहिबा और ससुर जी से बात करना चाहतें हैं, तब जाकर वंदना दीदी ने झेंपते हुये फ़ोन पंकज जीजाजी को दिया।
बहुत खुश थी वंदना दीदी, पंकज जी और अपने ससुराल वालों के साथ, इसलिए उर्वशी उसकी तरफ से निश्चिंत होकर अपने गंतव्य स्थान शिमला जाने की तैयारी में लग गई।
भले ही माँ को गुजरे लगभग 15 वर्ष हो चुके थे मग़र तिवारी जी अपनी बेटियों की तैयारी जिस तरह से करतें थे, शायद ही कोई माँ अपनी बेटी की विदाई के समय ऐसा तैय्यारी कर पाती।
खाना बनाने वाली “महाराजिन” से बेटियों के आने से पहले ही तरह तरह के अचार- मुरब्बे, बड़ी-पापड़ आदि बनवाकर रख लेते थे, जब बेटियों के जाने का वक्त होता तो वही बरनी में भर-भरकर दे देते.. साथ ही घर की दाल हैं, कहकर उड़द, मूंग, सत्तू, घर का घी आदि न जाने कितनी तैयारी करके विदा करतें थे तिवारी जी।
दो बैग तो तिवारी जी के पैक कराये सामान से ही भर जाता था।
उर्वशी को पता था कि इसमें से अधिकतर सामान तो उसे शिमला के लोकल मार्केट से ही मिल जाता, फिर स्टेशन पर कुली का दोनों तरफ़ का खर्चा और ऑटो वाले का सामान देखकर अतिरिक्त किराया मांगने का खर्चा मिला लें तो यह दो बैग के सामान से ज्यादा मूल्य का ही होगा, मग़र पिताजी का वह सामान कोई सामान नहीं था.. वह तो प्यार था उनका अपनी बेटियों के लिए.. फिर उर्वशी भला कैसे मना कर सकती थी अपने पिताजी को..
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उस दिन पिपरिया से दिल्ली के लिए ट्रेन नियत समय ही चल रही थी। उर्वशी को ट्रेन में बिठाते वक्त पिताजी की आँखे भर आईं थी.. ट्रेन में बैठते थी उर्वशी खिड़की से पीछे दौड़ते पेड़ों, ज़मीन, नदी नाले को देखकर अपने अतीत की यादों में खो जाती हैं।
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अगले अंक की प्रतीक्षा करें कल तक …
✍️ स्वलिखित
अविनाश स आठल्ये
सर्वाधिकार सुरक्षित

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