आपकी बेटी हमारे घर की लक्ष्मी है: short moral story in hindi

संगीता जी रोज की तरह पार्क में टहलने के लिए तैयार हो रही थीं। उन्होंने बाबूजी को आवाज लगाई। जल्दी चलिए आने के बाद मुझे सौ काम करने होते हैं। बाबूजी अपना कुर्ता पहन रहे थे कुर्ते के ऊपर वाला बटन टूटा हुआ था।

उन्होने संगीता जी से कहा-” आज बेटी रहती तो यह बिना बटन का कुर्ता पहनने ही नहीं देती। “

संगीता जी बोलीं-“क्या करूँ मुझे ठीक से दिखता  नहीं है फिर भी लाइये जैसे तैसे टांक देती हूँ।”

तभी मोबाइल पर किसी का कॉल आया ।बाबूजी चहक कर बोले- लो अभी याद कर रहा था न बेटी को आ गया उसका फोन! लो संगीता बात करो क्या बात है आज सुबह सुबह माँ- बाप को याद कर रही है बिटिया। “

संगीता जी ने फोन अपने हाथ में लेते हुए कहा -” आप जाइए टहलने मैं तो आज अपनी बेटी से बातें कर दिन की शुरुआत करूंगी। “

बाबूजी अकेले ही बाहर निकल गए और संगीता जी बेटी से बातें करने लगीं। कुशल मंगल पूछते हुए उन्होंने कहा-” बेटा तेरी सास कैसी हैं?”

-” अच्छी हूँ समधीनी जी !बहुत खुशी हुई कि आप बेटी के साथ ही साथ मेरी भी चिंता करती हैं। मैंने ही कहा था बहू को आपसे बात कराने के लिए। “

संगीता जी एकदम से डर गईं। उनकी थोड़ी सी आवाज लड़खड़ा गई। बोलीं -” हमसे या हमारी बिट्टू से कोई भूल हो गई है समधीनी जी!! “

-” अरे! आप ऐसे क्यूँ कह रही हैं। आपकी बेटी मेरी कोई नहीं लगती है क्या? वह तो मेरे घर की लक्ष्मी है जी। “

संगीता जी भाव विभोर होकर बिट्टू की सास की बातें सुन रही थीं। उन्हें तो यह डर था कि यह जानते हुए कि बिट्टू तीसरी बार भी बेटी को जन्म देने वाली है कहीं कोई खड़ी -खोटी ना सुनाने लगे।

उन्होंने बहुत मना किया था बेटी को कि मत लो तीसरा चांस! दुनिया में बहुत लोग हैं जिनके सिर्फ दो बेटियाँ हैं। लेकिन बिट्टू नहीं मानी। तीसरे महीने दामाद जी के साथ जाकर चुपके से जांच करवा लिया। पता चला फिर से लड़की है। वह नहीं चाहती थी पर  दामाद जी बड़े दिल वाले निकले। उन्होंने बिट्टू  की  एक नहीं मानी और कहा कि कुछ अच्छा सोच कर ही भगवान ने एक और लक्ष्मी भेजने का निर्णय लिया होगा।  

बेटी को बहुत अच्छा ससुराल और सास -ससुर भी मिले थे। बिट्टू ने बताया था कि उन लोगों ने बच्चा हटवाने के लिए साफ मना कर दिया।

तबसे संगीता जी के मन में बिट्टू के सास- ससुर तथा ससुराल वालों का इज्जत और भी बढ़ गया था । आज की दुनिया में कहां मिलता है ऐसा शिक्षित और सुलझा हुआ परिवार..।

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संगीता  जी विचारों के भंवर में डूब -उतरा रही थीं कि बिट्टू की सास ने टोका-” चुपचाप रहने से नहीं होगा आपको इस बार जल्दी ही आना पड़ेगा। अकेले मुझसे बहू का देख रेख कैसे हो पाएगा। दोनों छोटी बच्चियां भी तो हैं उन्हें भी तो सम्भालने में आपकी मदद चाहिए। “

पिछे खड़े बाबूजी सब कुछ सुन रहे थे उन्होंने इशारे में हाँ करने के लिए कहा। संगीता जी झट से बोल पड़ी-” हाँ हाँ हम जल्दी ही आ जायेंगे आप चिंता मत कीजिए। सब अच्छा होगा।” कहकर फोन रख दिया।”

  “आप सच में जायेंगे बिट्टू के ससुराल?” 

हाँ क्यूँ नहीं जायेंगे। हम नाती नातिन में कोई अन्तर नहीं करते। हमारे लिए बेटी के साथ साथ उसके बच्चे भी उतने ही प्रिय हैं। तुम जाने की तैयारियां कर लो हम महीने दिन पहले ही जायेंगे।

संगीता जी खुशी -खुशी बेटी के यहां ले जाने वाले सामानों की तैयारियां करने लगीं। बाबूजी को बाजार भेज कर फल मिठाई कपड़ा सब मंगवा लिया। पंद्रह दिन पहले ही बिना कोई सूचना दिये दोनों बिट्टू के ससुराल चल पड़े।

  दरवाजे पर पहुंचे तो घर के अंदर से  जोर- जोर से डांटने की आवाज आ रही थी। संगीता जी डर गईं उन्होंने सशंकित नजरों से बाबूजी के तरफ देखा। अंदर से तो बाबूजी भी हिल गये थे। पर वो पुरुष थे  न अपनी कमजोरी नहीं दिखाते हैं। पता नहीं क्यूँ यही एक वरदान प्रकृति ने औरतों को नहीं दी है।

बाबूजी ने आगे बढ़कर कांपती हाथों से कॉल बेल बजाया। बिट्टू की छोटी ननद ने दरवाजा खोला। सामने इन दोनों को देख हंसने लगी। पैर छूकर प्रणाम किया और वहीं से चिल्ला कर बोली-” भाभी देखो कौन आए हैं ?”

संगीता जी ने डरते -डरते पूछा -” बेटा अभी अभी कुछ हुआ था क्या? “

छोटी ज़ोर से हंस पड़ी बोली-” आंटी आप डर गईं थीं क्या? 

माँ ने भाभी के लिए बादाम भिगोय थे और मैंने उसे खा लिया था। हा- हा- हा…।”

यह हर दिन का ड्रामा है। माँ रोज भाभी के लिए कुछ न कुछ छुपा कर रखती हैं और मैं चट कर जाती हूँ। “

ननद की बातों को सुनकर दोनों पति पत्नी ने इत्मीनान की सांसे ली। वाकई बेटी बड़ी भाग्यशाली है जो इतना सुंदर और उच्च विचारों वाला ससुराल मिला था। लोग पहली ही बेटी को देख नाक -भौ सिकोड़ने लगते हैं। यहां जानते हुए भी कि तीसरी बेटी ही है  इतना केयर कौन करता है। संगीता जी ने चैन की साँस लिया और घर के अंदर चली गई।

घर वालों ने जमकर आदर सत्कार किया। बिट्टू भी बहुत खुश थी। माँ- बाप को और क्या चाहिए । दिन पंख लगा कर बीतने लगा। देखते-देखते वह सुबह भी आई। बिट्टू को प्रसव पीड़ा शुरू हो गया था। दामाद जी जाकर एम्बुलेंस लेकर आये। दोनों समधन बिट्टू को लेकर अंदर बैठ गईं। बाकी सभी लोग दूसरी गाड़ी से हॉस्पीटल पहुंचे।

दो नर्से आई और बिट्टू को लेकर लेबर रूम में चली गईं। सब बाहर इंतजार करने लगे। संगीता जी के माथे पर पसीने को देख बिट्टू की सास ढाढस बंधाने लगीं-” आप क्यूँ चिंता कर रहीं हैं हमारे घर लड्डू गोपाल आ रहे हैं!”

संगीता जी का माथा ठनका फिर भी उन्होंने अपने मन को समझाया। भले लोग कोई भेद नहीं करते। बहुत खुश हैं बच्ची की आने की खुशी में!”

तबतक नर्स दौड़ कर बाहर आई और हाथ आगे बढ़ाते हुए बोली-” माँ जी पहले नेग फिर बताऊंगी खुशखबरी!”

बिट्टू की सास ने झट पर्स में से पाँच सौ का नोट निकाला और देते हुए बोलीं…नानी से भी ले लो। “

संगीता जी ने भी पाँच सौ का नोट निकाल कर नर्स को देने लगीं ।नोट लेकर नर्स बोली लक्ष्मी जी आई हैं आपके घर में!”

जितनी तेजी से नर्स की जुबान से लक्ष्मी शब्द निकला था उससे भी तेजी से बिट्टू की सास ने उसके हाथ से पाँच सौ का नोट छीन लिया। नर्स भौचक्का होकर इधर-उधर देखने लगी। बिट्टू की सास ने कहा-” क्या कह रही हो तुम? 

बेटी हुई है!

नहीं नहीं तुम्हें देखने में गलती हुई होगी। मेरे बेटे ने तो कहा था कि इस बार लड़का होगा। जाओ ठीक से देखकर आओ। “

“लेकिन समधन जी आपको तो पता ही था न कि लड़की होने वाली है!”

“नहीं तो!”

सास भागते हुए ससुर जी के पास गई। पता नहीं क्या क्या बड़बड़ाने लगी। दोनों को देख कर लग रहा था कि वे पागल की तरह करने लगे थे।

संगीता जी समझ नहीं पा रहीं थीं कि जब ये लोग पहले से जान रहे थे कि लड़की होगी तो फिर ऐसी प्रतिक्रिया क्यों दे रहे हैं? संगीता जी ने बाबूजी को बुलवाया। वह मिठाई का थैला लिए अंदर आ रहे थे। बिट्टू की सास ने उनके हाथों से मिठाई का डब्बा छीनकर धड़ाम से नीचे पटक दिया। और जोर -जोर से चीख कर बोलीं-” कोई नहीं खाएगा आपका मिठाई आप को पता था कि आपकी बेटी लड़की पैदा करने वाली है फिर भी हमें नहीं बताया।

संगीता जी आश्चर्य से सबको देखने लगीं। उनकी नज़रे दामाद जी को ढूंढ रही थीं। आसपास के सभी लोग इनका ड्रामा देख रहे थे। अजीब सा माहौल बन गया था। तभी बिट्टू के पति हाथ में दवा की थैली लिए आ रहे थे। उनको देखते ही बिट्टू की सास आग बाबूला हो गईं।

चिल्ला कर बोलीं-” क्या रे मेरी ही औलाद होकर मुझसे छल करता है। परायों को बताया कि लड़की है पर हमें नहीं!और हम नौ महीने तक उपले ( गोबर) में घी सुखाते रहे। “

दामाद जी कुछ नहीं बोले बस संगीता जी को बिट्टू के पास जाने का इशारा किया। अपनी बेटी के लिए ऐसे कडवे बोल सुनकर उनकी आँखों में विक्षोभ के आंसू भर आए थे। जिस बेटी को उन्होंने परी की तरह नाजो में पाला था। उसके लिए आज बेटी जनने पर उसकी सास कहावतें कह रही थीं । छी :…छी:  किस तरह  के  खोखले रिश्ते हैं। और यह कैसे निभ पायेंगे। 

वह बाबूजी के साथ अंदर चली गईं जहां बेटी अभी तक बेहोश थी। 

दो दिन तक बिट्टू के ससुराल से कोई मिलने नहीं आया। बिट्टू जार -जार रोने लगी। उसने जब कारण पूछा कि क्यों छुपाया आपने  माँ पिताजी से। तो दामाद जी ने बताया कि-” मुझे पता था कि सबकी प्रतिक्रिया क्या होगी।”

 माँ पिताजी दबाव बनाने लगते बच्ची को हटवाने के लिए। लेकिन मैं यह पाप नहीं करना चाहता था और न तुम्हें हत्यारि माँ बनने देना चाहता था। औलाद -औलाद होती है  वह बेटा या बेटी नहीं… । 

और जहाँ तक मेरे रिश्तेदारों की बात है तो जो होता है वह अच्छा ही होता है। कम से कम पता तो चल गया कि हमारे रिश्ते कितने खोखले हैं। उन्हें बेटे बहू की खुशी से मतलब नहीं था। पोता होने से मतलब था। लेकिन वो यह भूल चुके हैं कि मैं अब सिर्फ उनका बेटा नहीं… एक बाप भी हूँ और कोई मेरे सामने मेरी औलाद में अन्तर करे यह नहीं हो सकता।”

“माँ जी अब कुछ दिनों के लिए बिट्टू आपके घर पर रहेगी उसके बाद मैं अपने बच्चों के लिए अलग आशियाना ढूंढ लूँगा ।”

स्वरचित एवं मौलिक

डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा

मुजफ्फरपुर,बिहार

#खोखले रिश्ते

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