ममत्व की डोर – डॉ. पारुल अग्रवाल

अवनी अपने सपनों की दुनिया में खोई हुई थी, तभी मां ने झंझोड कर हिलाया और बोला उठ जा बेटा नहीं तो मेडिकल कॉलेज जाने में देर हो जायेगी। वैसे तो उसे अपनी नींद से समझौता करना गवारा ना था पर फिर भी कुछ बनने के एहसास ने उसको उठा ही दिया। तैयार होकर वो निकली ही थी कि उसने देखा आज उसके मौहल्ले की आंटी लोगों का समूह पानी भरने के ऊपर लड़ाई ना करके एक जगह झुंड बना कर खड़ा था, साथ में कुछ पुरुष ओर अन्य सम्मानित लोग भी खड़े थे। उसे भी लगा कि अवश्य ही कोई गंभीर बात है नहीं तो आंटी लोगों का समूह जिसे वो दुनियादारी गैंग कहती थी क्योंकि उनका काम दूसरों की ज़िंदगी में टांग अड़ाना था इतना चुपचाप नहीं होता। वैसे तो उसे अपने कॉलेज जाने में देर हो रही थी उसकी नर्सिंग की प्रायोगिक परीक्षा भी थी। फिर उसने घड़ी की तरफ देखा, अभी थोड़ा समय था।

अब वो भी अपने मौहल्ले के लोगो के पास चली गई। वहां पहुंचने में देखती है कि कोई अपनी नवजात पैदा हुई बच्ची को मौहल्ले के चबूतरे पर छोड़ गया था। बच्ची बहुत प्यारी थी। उसकी बिछावन और कपड़ों को देखकर भी लग रहा था कि वो किसी अच्छे परिवार से संबंध रखने वाली युवती की भूल का नतीजा थी। उसने इस तरह के किस्सों के विषय में अपने अस्पताल में बहुत सुना था पर आज हकीकत में सामना पहली बार हुआ था। उसने देखा बच्ची भूखी है, आस-पास जो लोग झुंड बनाकर खड़े थे उनको बच्ची की कोई चिंता नहीं थी। उन लोगों को तो बस आज के समाज में नुक्ताचीनी करने का एक मौका मिल गया था। उसने उन लोगों को वहां से हटाया और उस बच्ची को उठाकर अपने सीने से लगा लिया।




उसकी इस हरकत को देखकर कुछ आंटियां उस पर चिल्लाने लगी कि ये क्या कर रही है लड़की? पता नहीं किसका पाप है जो तू अपने सीने से चिपटा रही है। इस पर अवनी ने बहुत ही शांतिपूर्वक बोला कि आंटी जी शायद आप लोगों को दिख नहीं रहा कि बच्ची काफी समय से ठंड में बाहर है और भूखी भी है।बेहतर होगा कि हम पाप-पुण्य छोड़कर बच्ची की तरफ ध्यान दें। ऐसा कहकर वो उसको उठाकर अपने साथ अस्पताल ले गई जहां पर वो नर्सिंग का कोर्स कर रही थी। 

उसके निकलते ही आंटी लोगों को अब अवनी के विषय में और उसके ज़िद्दी स्वभाव के बारे में बात करने का एक मौका मिल गया। अवनी पूरे रास्ते उस बच्ची को अपने सीने से लगाए रही क्योंकि जब तक उसका अस्पताल में एक बार चेकअप नहीं हो जाता तब तक उसके शरीर को ठंड से बचाने के केवल यही उपाय था। आज अवनी को इस छोटी सी नवजात को अपने सीने से लगाकर एक अलग से अनुभव हुआ।उसके मन में कहीं ना कहीं एक रिश्ता जन्म ले रहा था।

वो विज्ञान की छात्रा रही थी, अब नर्सिंग की पढ़ाई के दौरान उसने कई सारे नवजात शिशु को पैदा होते देखा पर आज का ये एहसास अनूठा था। उसके मन-मस्तिष्क में विचारों का झंझावात चल ही रहा था इतने में अस्पताल आ गया। वो बच्ची को शिशु छाया वार्ड में एडमिट कराके, बच्चे के गार्जियन में अपना नाम लिखाकर अपने नर्सिंग विभाग में अपनी प्रायोगिक परीक्षा देने आ गई। किसी तरह से उसने परीक्षा दी पर उसका मन उसी नन्हीं सी जान में अटका था। परीक्षा के बाद वो तुरंत उस बच्ची के पास पहुंच गई क्योंकि अस्पताल में सब जानने वाले थे इसलिए बच्ची के चेकअप में कोई समस्या नहीं आई। उसको अन्य साधनों से दूध भी दे दिया गया था। 




बच्ची अब पूरी तरह स्वस्थ थी। समस्या थी तो उसको रखने की। वहां पर उसके साथी और वरिष्ठ लोगों ने बच्ची को पुलिस के सुपुर्द करने की बात की और साथ-साथ ये भी कहा कि अगर बच्ची के किसी सगे संबंधी का पता नहीं चलता तो इसको फिर पुलिस ही अनाथाश्रम में दे देगी। अनाथाश्रम की बात सुनकर तो अवनी के पैरों के नीचे की ज़मीन ही सरक गई।

उसको ऐसा लगा कोई उसके अपने ही शरीर के हिस्से को उससे दूर करने की बात कर रहा है। तभी उसे अपने  अपने चाचा के बेटे जो पुलिस में ही था उसकी याद आई। उससे बात की और उस बच्ची के घरवालों को ढूंढने की रिपोर्ट लिखवा दी। साथ ही साथ जब तक उस बच्ची का कोई ठिकाना नहीं पता चलता तब तक के लिए बच्ची को अपने घर ले आई।

घर पर उसके पहुंचने से पहले ही पड़ोस की आंटी लोग उसकी मां को सब बता चुकी थी।वो वैसे ही बहुत घबराई हुई थी।वो जानती थी कि अवनी बहुत जिद्दी है,कहीं वो बच्ची को घर ले आई तो अनर्थ ही हो जायेगा। वो ऐसा सोच ही रही थी कि वास्तव में अवनी बच्ची को लिए घर में घुसती है। अवनी के कुछ कहने से पहले ही उसकी मां बोलना शुरू कर देती हैं की क्यों लेकर आई है इसको? अब क्या जवाब देते फिरेंगे हम पूरे समाज को? कल को कौन करेगा तेरे से शादी इस बच्ची के साथ।

अवनी ने बड़े ही सपाट शब्दों में जवाब दिया कि वैसे तो अभी पुलिस इसके घर वालों का पता लगाने की कोशिश कर रही है पर अगर नहीं पता चलता तो मैं अब बालिग हो चुकी हूं, इसको कानूनन गोद लेकर पालूंगी। रही बात शादी की तो उसमें अभी समय है, फिर जो अगर मुझसे असल में  प्यार करता होगा वो इस बच्ची को भी अपनाएगा। 

वो अपनी मां को ये भी कहती है कि आपको याद होगा बचपन में,मैं कुत्ते के छोटे से पिल्ले को तो ठंड में घर के बाहर छोड़ नहीं पाती थी, फिर ये तो इंसान है। आज मैंने जब इसको अपने सीने से लगाया तो मेरे को एक अलग ही रिश्ता इस बच्ची से महसूस हुआ। उसकी ऐसी दलीलों से उसकी मां को भी चुप करा दिया।

अगले दिन ये खबर और अवनी जैसी नवयुवती का इस तरह से बच्ची को घर लाना लोकल समाचार पत्र की सुर्खियां बन गया था। पुलिस भी मुस्तैदी से उस नवजात के घर वालों का पता लगाने में जुट गई थी। आखिर तीन दिन में ही उसके घर वालों के विषय में जानकारी मिल गई थी। उस बच्ची की मां ने जब अवनी के विषय में पढ़ा तो उसको अपनी ओछी हरकत पर बहुत पछतावा हुआ।

उसको लगा जब अवनी उम्र में उससे कम होने के बाबजूद और उसकी बच्ची को बिना पैदा किए पूरे समाज का सामना कर सकती है तो वो क्यों नहीं, आखिर उसने तो उसे जन्म दिया है। उसकी भूल की सजा उसकी बच्ची को क्यों मिले? ये सब सोचकर वो पुलिस के पास पहुंचती है। अपनी गलती की माफी मांगती है। पुलिस भी सीसीटीवी फुटेज़ और डीएनए जांच के आधार पर बच्ची को उसकी मां को सौंप देती है।

बच्ची को तो अपनी मां के पास ही जाना था पर वो चार दिन की दूधमुंही बच्ची भी अवनी के साथ एक रिश्ते की डोर में बंध गई थी। तभी वो अपनी असली मां की गोद में आते ही रोने लगती थी और अवनी की गोद में चुप हो जाती थी। भारी मन से अवनी उस नन्ही परी को उसकी मां को सौंप देती है।

उसके जाने के बाद वो मन ही मन बहुत खालीपन महसूस करती है क्योंकि ममत्व का एक रिश्ता तो उन दोनों के बीच बन ही गया था। पर उस नन्हीं सी जान को अनाथाश्रम नहीं जाना पड़ा और वो सुरक्षित हाथों में पहुंच गई अवनी ये ही सोचकर तस्सली कर लेती है।

दोस्तों कैसी लगी मेरी कहानी? अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। कुछ रिश्तें हमारी सोच से परे कब आकार ले लेते हैं,पता ही नहीं चलता। शायद इसी का नाम ज़िंदगी है। वैसे भी मानव मन अपने आस-पास के रिश्तों का ताना बाना ममत्व की डोर से बुन ही लेता है। ये एक ममत्व की डोर ही तो है,जो यशोदा का स्थान देवकी से भी ऊपर करती है। 

नोट: इस कहानी का वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। इस कहानी का उद्देश्य एक रिश्ते के पनपने के पीछे कई सकारात्मक पक्षों को उजागर करना है।

#एक_रिश्ता 

डॉ. पारुल अग्रवाल,

नोएडा

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