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“यशोदा” – डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा

“कौन है यह?”

” जी माँजी ” एक बच्चा है ।”

“हाँ वो मैं देख रही हूँ, लेकिन इसे अपने साथ क्यूँ लाई हो?”

“माँजी यह बच्चा चौराहे पर अकेला बैठा रो रहा था।इसके आसपास कोई नहीं था इसीलिए इसे अपने साथ लेकर चली आई। जब तक इसके माँ -पिता नहीं मिल जाते तब तक इसे यहीं रहने दीजिये।”

  दादी ने अपनी आंखों को फैलाते हुए कहा-“अपने पाँच बच्चे कम पड़ रहे थे क्या जो एक और आफत उठा लाई सड़क पर से।”

“माँ जी ऐसे मत कहिये! यह किसी न किसी के कलेजे का टुकड़ा होगा। शायद बिछुड़ गया है। कल मैं इसे अपने साथ अपने स्कूल लेकर चली जाऊँगी। हो न हो इसके माँ -बाप ढूंढते हुए वहां आ जाये।”

“हाँ -हाँ ठीक है लेती जाना यहां भीड़ बढ़ाने की जरूरत नहीं है। वैसे ही दस लोगों के खर्चे उठाना पहाड़ उठाने के बराबर है ।उसपर एक और बोझ कौन उठाएगा।”

माँ और दादी की बात सुनकर हम सारे बच्चे बाहर निकल आए। देखा तो लगभग पांच साल का दुबला -पतला सा बच्चा मैले- कुचैले और कहीं-कहीं से फटा हुआ कपड़ा पहने हुए खड़ा था ।आंसुओं के कारण उसकी आँखें सूजी हुई थी। बाल बिखरे हुए थे। भूख से उसके होंठ सूख गए थे। माँ ने उसे पलटकर देखा उसके मुरझाए चेहरे को देख वो दुःखी हो गई। दादी को समझा बुझाकर माँ उसे लेकर अंदर आ गई।

मेरे सारे भाई बहन उसको देख नाक- भौ सिकोड़कर अपने अपने कमरे में चले गए। माँ ने उसे नहला धुला कर छोटे भाई की पुरानी टीशर्ट और पैंट पहना दिया। जो कुछ बचा खुचा खाना रसोईघर में पड़ा था उसे बैठाकर खिलाया। सबने बच्चे से सौ बार उसका नाम पूछा था पर वह कुछ भी नहीं बोल रहा था। सिर्फ माँ -माँ कर रोने लगता था। माँ उसे जैसे- तैसे ढाढस बांधाकर चुप करा रही थी।

रात में जब सोने की बारी आई तो समस्या खड़ी हो गईं कि इसे कहां सुलाया जाए। सब अपने- अपने कमरे में जाकर सो गये। मैं दादी के साथ सोती थी। उनके साथ मेरे अलावा किसी और को मजाल नहीं था कि सो जाए क्योंकि पांचो भाई -बहन में मैं ही थी जिनपर उनको साफ- सफाई से रहने का भरोसा था।

माँ रसोई से काम समाप्त कर बाहर आई तो देखा वह बच्चा आंगन में बिछे चौकी पर बैठा ऊंघ रहा था।

माँ अभी कुछ सोच ही रही थी तभी दादी का हुक्म हुआ-” क्या सोच रही हो बहू?  इसे बाहर सीढियों के नीचे खाट डालकर एक सूजनी और एक चादर देकर सुला दो पता नहीं किस जात -धर्म का है यह। “



माँ का दिल एकदम से कचोट गया। मन में सोचने लगीं “माँजी भी हद कर देती हैं। एक तो बेचारा बच्चा है उसपर से माँ-बाप से बिछड़ा है और उसे सीढ़ी के नीचे  कैसे…..।”

पर वह कर भी क्या सकती थीं । दादी का हुक्म पत्थर की लकीर जो था । झिझकते हुए माँ ने लगा दिया बिस्तर सीढ़ी के नीचे।  बच्चा लेटते ही माँ के लिए रोने लगा। लेकिन कहते हैं न कि ‘भूख न जाने बासी भात और नींद न जाने टूटी खाट’ थका हुआ था। माँ के ममता भरे हाथों का स्पर्श मिलते ही सो गया।

सभी सो गए लेकिन माँ जगी हुई थी। जब वह दादी के कमरे में मच्छरदानी लगाने आई तो दादी ने उन्हें हिदायत देते हुए कहा -” देखो सुबह होते ही उसे वहां से उठा कर बाहर बरामदे में सुला देना।”

माँ बहुत बेचैनी में दिख रही थी। शायद वह दादी के सोने का इंतजार कर रही थीं। जैसे ही निश्चिंत हो गईं कि दादी सो चूकी हैं माँ धीरे से बच्चे को उठाकर अपने कमरे में लेकर आ गई और अपने बिस्तर पर लिटा दिया। खूब सबेरे सबके जागने से पहले ही बच्चे को जगाकर उसे मूंह हाथ धुला कर दूध बिस्किट खिला दिया और माँ के पास ले चलने का भरोसा दिलाकर  बाहर बरामदे में बैठा दिया।

  अगले सुबह माँ उसे अपने साथ स्कूल लेकर जा रही थी तो दादी ने जोर देते हुए कहा-” यह झमेला वापस लेकर मत आना समझी! अपने बच्चों के लिए तो समय नहीं निकाल पाती इसका तिमारदारी कैसे करेगी!”

शाम को हम सब भाई -बहन दरवाजे पर खेल रहे थे तभी माँ स्कूल से वापस चली आ रही थी। सब खुश थे कि चलो बला टल गया। दादी अपनी रुद्राक्ष की माला हाथ में लिए बैठी फेर रही थीं बोलीं-“छोड़ आई न उसे…अच्छा किया, कल से लग रहा था जैसे किसी ने कलेजे पर कोई बोझ लाद दिया है ।”

दादी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पायी थी कि बच्चा माँ के पीछे से दिख गया दादी को जैसे करंट लगा हो। चीख कर बोली-” तू फिर उठा लाई इसे….रास्ते के कूड़े को। “



“माँजी भगवान के लिए कुछ मत कहिये। इतना भी नफरत ठीक नहीं है। बच्चे की क्या गलती है। कोई लेने नहीं आया इसे तो मैं क्या करती? अनाथ हो जाता बेचारा। जब तक कोई लेने नहीं आ जाता …।”

” तू क्या करती? …छोड़ देती जहां से लाई थी। यशोदा मइया बनने चली है! किस जात का है यह भी पता नहीं है। “

“माँजी, मैं भी एक माँ हूँ और  ममता जात-पात ,ऊंच-नीच का भेद नहीं जानती। मुझको यह गंवारा नहीं था कि मैं एक असहाय बच्चे को रास्ते पर छोड़ दूँ।”

दादी गुस्साकर बोली-“परवरिश कौन करेगा इसका? मेरा घर है यह अनाथाश्रम नहीं है समझी!”

“आप चिंता मत कीजिए माँजी … मैं करूंगी इसका परवरिश। मैं परआश्रित नहीं हूँ। जहां पाँच बच्चे पाल रही हूँ वहां एक और सही”- माँ ने दृढ़ता से कहा और बच्चे का हाथ पकड़ घर के अंदर लेकर चली गई। माँ उसे कृष्णा बुलाती थीं और वह अपनी यशोदा मइया का सबसे प्यारा नन्दलाला था।

पहले कुछ सालों तक दादी का व्यवहार उसके प्रति सौतेला रहा।  वक्त गुजरा हम सब बड़े हुए। शादी- ब्याह , नौकरी -चाकरी के चक्कर में सब के सब परदेसी हो गए।

दादी और माँ के लिए यदि कोई सहारा था तो वह कृष्णा ही था। सबसे छोटा था इसलिए अभी स्कूल में ही था । बुढ़ी दादी के लिए तो वह साक्षात कृष्णा ही था। पढ़ने लिखने के साथ -साथ वह दादी की सेवा में लगा रहता। उसका प्रेम देख दादी की आंखें आंसुओं से भर जातीं वह भावुक होकर माँ को कहती -” बहू  देखना तेरा कृष्णा ही मुझे भवसागर पार कराएगा। ” 

#प्रेम 

स्वरचित एंव मौलिक

डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा

मुजफ्फरपुर,बिहार

 

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