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वो कहती नहीं तो क्या उसे दर्द नहीं होता..? – निधि शर्मा 

“अरे यार मालती मुझे चाय पीने की इच्छा हो रही थी तुम क्या खाना खा रही हो..? अगर देर नहीं हो रही तो एक कप चाय पिला दो बाद में खाना खा लेना। दुकान पर जाना है बाहर की चाय मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगती। बहुत काम है मुझे वैसे भी तुम तो घर में रहोगी कभी भी खाना खा सकती हो।” अभय अपनी पत्नी मालती से कहता है। 

मालती एक आदर्श पत्नी की तरह मुस्कुराते हुए अपनी प्लेट खुद से दूर की और बोली “जी बिल्कुल मैं बाद में खा लूंगी आपके लिए चाय अभी बना कर लाती हूं।” तभी मालती की बेटी रेनू आई और प्लेट को अपनी मां की तरफ खिसकाते हुए बोली “मां आप खाना खाओ पापा के लिए मैं चाय बना देती हूं।” उस वक्त मालती को लगा मानो एक बेटी ने मां के दर्द को समझा।

    रेनू के पिता अभय बोले “अरे नहीं बेटा तुम छुट्टियों में आई हो आराम करो। तुम्हारी मां तो ऐसे ही बैठी रहती है वो चाय बना देगी।” रेणु की दादी भी वहीं बैठी थी, वो बोली “हां हां बहू चाय बना देगी थोड़ी देर हो जाएगी खाने में तो क्या बिगड़ जाएगा! बहू को आदत है जाओ बहू मेरे लिए भी एक कप चाय बना दो।”

    रेनू ने बड़े आश्चर्य से दोनों को देखा और बोली “औरतों को घर में कितने काम होते हैं ये आप सब कब समझेंगे? मां को भी दर्द होता है पर मां को तो रुकते और रोते हुए मैं देखी ही नहीं हूं। क्या आप लोगों के जीवन में मां के होने का बस यही एक महत्व है कि वो घर के और हमारे सभी काम करती है..?”

     रेनू की दादी बोली “तुम्हारी मां कोई दुनिया का अनोखा काम नहीं करती..! घर के सारे काम औरतें ही करती आई है तो इसमें महत्व और दर्द की बात कहां से उठ जाती है और कौन सा सारा काम वो हाथों से करती है हर काम के लिए तो मशीन ले रखा है।”

    अभय हंसकर बोले “सही कह रही हो मां, सुविधा के अनुसार हर मशीन घर में लाकर रख दी है। अब फिर भी बेटी शिकायत कर रही है इसका मतलब है कि मां ने इसके पास हमारी खिलाफ शिकायत की होगी.! बेटा तुम्हारी मां को घर में क्या तकलीफ है खाने के लिए खाना, कपड़ा और हर सुविधा सब कुछ तो मिल रहा है और क्या चाहिए।”




 मालती बोली “ये कैसी बातें कर रहे हैं..! घर संभालना और होममेकर बनना मेरी खुद की पसंद थी। किसी ने मुझ पर दबाव नहीं डाला और ना ही मेरे माता पिता ने अपना पल्ला झाड़ा, मुझे उन्होंने इतना पढ़ाया लिखाया कि मैं चाहती तो नौकरी कर सकती थी। पर क्या आपके जीवन और इस घर में मेरी जगह एक काम वाली बाई की तरह है इससे ज्यादा क्या मैं महत्व नहीं रखती..?”

     मालती की सास बोली “बहू बात को तूल क्यों दे रही हो किसके कहने का वो मतलब नहीं था। आज बेटी को देखकर तुम्हें भी जोश आ गया तुम तो इतना बोलती नहीं थी! तुम्हें ऐसा कौन सा काम करती हो जो दूसरी औरत नहीं करती घर के काम करना तो औरत की जिम्मेदारी होती है।” 

 मालती बोली “मम्मी जी मैं नहीं चाहती मेरी बेटी को गलत संदेश मिले कि एक औरत जो घर गृहस्थी संभालती है उसकी कोई पहचान नहीं होती है। औरत  खाली दीवारों को अपनी यादों से, अपने प्यार से एक मकान को घर का रूप देती हैं। जो इन बातों को इन एहसासों को महसूस नहीं कर सकते उन्हें आखिर लोग क्या सिखाएं, और जब ये बातें समझ में आती है तब तक वक्त बहुत बीत जाता फिर अफसोस के सिवा हाथ कुछ नहीं आता है।” और वो चुपचाप अपना खाकर वहां से उठ गई।

   अभय भी दुकान चले गए।  दुकानदारी पूरी करके जब रात को लौटे तो मालती ने हर रोज की तरह सबको खाना परोसा और सबके खाने के बाद खुद भी खाना खा रही थी। रेनू बोली “मां अक्सर लोगों को गलतफहमी हो जाती है कि अगर औरत नहीं बोलती तो लोग उसे दर्द नहीं होता हैं! अपने लिए भी बोलना सीखो, आप घर संभालती हैं कोई गुलामी नहीं करती हैं इस घर में आपका क्या महत्व है आपको भी दर्द होता है ये इन्हें बताना बहुत जरूरी है।” इतना बोलकर रेनू मुस्कुराते हुए अपने कमरे में चली गई।

       खाना खाकर जब मालती अपने कमरे में गई तो अभय बोले “आज तुमने सबके सामने मां से जीस तरह से बात की, वो तुम्हें नहीं करनी चाहिए थी। घर का काम करती हो अच्छी बात है पर लोगों को इसके लिए तुम सुना नहीं सकती हो।”




मालती बोली “आपकी मां भी एक औरत है पर न जाने क्यों वो औरत के दर्द को भूल गई है..! जिस दिन परिवार के सभी लोग ये समझ लेंगे कि घर की बहू भी थकती है, उसे भी पैरों में जो दर्द होता है और उस घर में उसकी भी एक खास जगह है क्योंकि सबकी खुशी के लिए औरत अपने हर दर्द भूल जाती है और फिर भी उसका महत्व ना दिया जाए तो उसे कितनी तकलीफ होती है ये आप नहीं समझेंगे।”

     मालती जब कमरे से बाहर निकली उसकी आंखें नम थी। बेटी ने मां के चेहरे को देखा और वो पिता के पास जाकर बोली “पापा अगर एक पति अपनी पत्नी की तकलीफों को नहीं समझेगा तो वो और किसी से क्या उम्मीद करेगी। घर में काम करने वाली औरत का महत्व घरवाले नहीं देंगे तो और कौन देगा ?”

   अभय बेटी से बोले “बेटा मैं नहीं बोलता उसको इतने सारे काम करने के लिए।” बेटी बोली “अगर कल को आपका दमाद अपने जीवन में मुझे महत्व न दें और मैं दुखी रहूं तो क्या आपको अच्छा लगेगा..? जिस तरह से संसार में वायु देव अगर अपना काम करना छोड़ दें तो सबकी सांसें रुक जाएंगी, मां अगर हमारे कामों को प्राथमिकता देना छोड़ दे तो सोचिए हमारी क्या हालत हो जाएगी।” इतना बोल कर वहां से चली गई।

   रात में जब मालती काम करके अपने कमरे में आई और अपने सर को दीवार में टिकाई। अभय धीरे से उसके सर को दबाने लगे, मालती हड़बड़ा कर बोली “ये क्या कर रहे हैं आप, मम्मी जी देखेंगी तो क्या बोलेंगी।”




    अभय बोले “औरत का महत्व घर में क्या होता है ये उसके न होने पर ही पता चलता है। वो बेवकूफ लोग होते हैं जो अपनी जिंदगी में औरत को महत्व नहीं देते हैं क्योंकि बिना औरत के तो हर मर्द अधूरा होता है।” मालती की आंखों में खुशी के आंसू थे और अभय बड़े प्यार से उसके आंसू को पोछते हुए उसे अपने होने का एहसास दिला रहे थे।

रेनू को खुशी हुई कि उसके पिता ने अपने जीवन में अपनी पत्नी का महत्व जाना। अब उसकी मां अकेली नहीं है उसके आंसुओं को पहुंचने वाला उसके पिता का मजबूत कंधा उसके साथ है। रेनू अब निश्चिंत हो गई कि उसकी मां के दर्द को समझने वाला कोई है।

कोशिश सही तो बदलाव आता है। अभय अब मालती का हमेशा ध्यान रखते थे और अपनी मां को भी इस बात के लिए समझाते थे कि एक औरत के मान सम्मान के साथ उसके घर में उसके महत्व को भी समझना चाहिए।

दोस्तों एक मां, पत्नी घर के काम अपनी खुशी से हमारे लिए करती है। इस बात के लिए उनका जितना आभार प्रकट करें उतना कम है, घर के प्रति एक औरत के साथ-साथ उसके परिवार के सदस्यों की भी जिम्मेदारी होती है कि उस औरत को घर में मान सम्मान के साथ उसके दर्द को भी समझा जाए इससे ज्यादा और कुछ नहीं चाहती।

आप इस बात से कितने सहमत हैं कृपया कमेंट द्वारा मेरे साथ साझा करें बहुत-बहुत धन्यवाद

#दर्द

 

निधि शर्मा

 

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