वक्त वक्त की बात  – आरती झा आद्या

पार्वती कल तुम्हें भी मेरी रिटायरमेंट पार्टी के लिए ऑफिस चलना है….अधिकारी सुरेंद्र श्रीवास्तव ने कहा।

मुझे क्यों…पार्वती ने आश्चर्य से सुरेंद्र की ओर देखा।

ऑफिस कर्मचारियों की इच्छा है तो मुझे हां करना पड़ा…बहुत ही दुःखी होते हुए सुरेंद्र ने कहा।

ओह तभी.. पार्वती कहती है लेकिन सुरेंद्र बिना कोई ध्यान दिए चाय के साथ मोबाइल एंजॉय कर रहा था।

कोई ढंग की साड़ी डालना… चाय से पहले सुरेंद्र का फरमान जारी हो गया।

पार्वती एक नजर सुरेंद्र पर डाल अपने काम में लग गई।

सुरेन्द्र सर से हमें काफी कुछ सीखने मिला। काम के साथ साथ इनकी जिंदादिली काबिलेतारीफ़ है… सुरेंद्र का गुणगान चल रहा था और सुरेंद्र की बगल वाली कुर्सी पर बैठी पार्वती अठाईस साल पहले की दुनिया में विचरण कर रही थी।

पता नही क्या दिखा मां बाबूजी को तुममें…एक से एक रिश्ते आ रहे थे, पर नहीं बराबरी में रिश्ते होने चाहिए कहकर तुम्हें मेरे सिर मढ़ दिया उन्होंने… सुरेंद्र की पोस्टिंग की जगह पर ये पार्वती का गृह प्रवेश था।

सास ससुर के पास रहते हुए बीए पास पार्वती बहुत हद्द तक ये समझ गई थी कि सुरेंद्र को वो बिल्कुल पसंद नहीं है। वो तो अपने साथ लाना भी नहीं चाहता था, लेकिन माता पिता के आगे उसकी एक न चली। 

माता पिता की जिद्द पर ही एक बार उसे लेकर उदयपुर गया था और उस चार दिन के ट्रिप में यही बताता रहा कि पार्वती के कारण उसका समय बर्बाद हो रहा है, वो तो तीन चार बार यहां आ चुका है।



पार्वती जो जाने से पहले बहुत उत्साहित थी, उस दिन ही उसे ये अहसास हो गया कि उसके साथ की, उसके सपनों की , इच्छा की सुरेंद्र की नजर में कोई कद्र नहीं है। उसे याद आ रहे थे वो दिन जब वो सोचा करती थी कि छोटी हो या बड़ी हर खुशी को पति के साथ जिएगी। कितना शौक था उसे सिनेमा देखने, घूमने जाने का। उसके रिश्तेदार , सहेलियां “अधिकारी पति मिला है” कहकर कितना रश्क कर रही थी। किस्मत की बहुत भली है, जो बिना दान दहेज के इतना बढ़िया रिश्ता चल कर आया है। यहां सच्चाई ही कुछ और है। शादी के पहले जहां खड़ी थी, आज भी वही खड़ी है। उस दिन उसने सोच लिया कि इस अपमान से बेहतर है अपनी इच्छा सीमित रखी जाए।

कोई इतनी जोर से हंसता है क्या… मिसेज अनिता को देखो, सीखो बड़ी सोसाइटी में किस तरह हंसते हैं, बोलते हैं। मिसेज अनिता कुछ सिखाती क्यों नहीं आप इसे…सोसाइटी की पार्टी में सुरेंद्र के कहे ये शब्द पार्वती को अंदर तक बेध गए थे।

सबका अपना अपना व्यक्तिव है, मैं अनिता भाभी नहीं हूं और न ही बनना चाहती हूं…दबे शब्दों में ही पार्वती ने प्रतिकार किया।

अनिता को सुरेंद्र की शह मिल गई थी और खुद के बनाव श्रृंगार का अभिमान भी था। जब तब पार्वती पर कटाक्ष करने शुरू कर दिए थे उसने। अनिता के व्यंग्य वाणों से कब पार्वती छलनी होना शुरू हो गई और कब वो चुप चुप रहने लगी, उसे खुद ही पता नहीं चला। सबसे ज्यादा तो पार्वती को ये बुरा लग रहा था…वो कम बोलती है,कम हंसती है, सुरेंद्र के साथ कहीं भी आने जाने से मना कर देती है लेकिन सुरेंद्र ने न ध्यान दिया और न ही उसे कोई फर्क ही पड़ा। समय अपनी गति से चलता रहा, सुरेंद्र और पार्वती दो प्यारे बेटों के मम्मी पापा बन गए। लेकिन पार्वती के प्रति सुरेंद्र का व्यवहार कटा कटा ही रहा। बच्चे स्कूल जाने लगे। अब पार्वती के पास समय भी बहुत बचने लगा।

खाली समय काटने दौड़ता था। उसे समझ नही आ रहा था कि क्या करे। एक दिन उसने अखबार में एक एनजीओ के बारे में पढ़ा, जिसमें अनाथ बच्चों को पढ़ाने के लिए बिना तनख्वाह के शिक्षक चाहिए था। अंधा क्या चाहे दो आंख। उसी समय वो ड्राइवर के साथ एनजीओ चली गई। अब उसे जीवन का ध्येय मिल गया था।

क्या बात है श्रीवास्तव साहब, आजकल भाभी जी समाज सेवा में लगी हैं…ऑफिस के किसी अधिकारी ने कहा।

आं… हां..उसे पसंद है…चुकी सुरेंद्र कुछ जानता नहीं था तो उससे कुछ बोलते नहीं बना।



ये सब क्या है पार्वती… सुरेंद्र ने घर आते ही पूछा।

पार्वती ने उसे आश्चर्य से देखा क्योंकि पानी पिला दो, खाना लगा दो…बच्चे कहां है के अलावा सुरेंद्र उससे कोई बात करता ही कहां था।

तुमने एनजीओ का चस्का कब से पाल लिया। मेरे पास इन सब चीजों के लिए फालतू पैसे नहीं हैं। अनिता भाभी को देखो और अधिकारियों की पत्नियों की तरह किट्टी जाओ, क्लब जाओ…खबरदार जो तुमने मेरी कमाई एनजीओ के लिए उपयोग किया… सुरेंद्र अपनी टाई ढीली करता बोलता है।

पहली बात तो आप जो घर खर्च के लिए पैसे देते हैं। उसमें से बचाए हुए पैसों से मैं अपनी इच्छा पूरी करती हूं, चाहे वो एनजीओ ही क्यूं न हो और उस पैसे पर मेरा पूर्ण अधिकार है… पहली बार पार्वती ने सधे शब्दों में प्रतिकार किया।

भाभीजी आप भी कुछ बोलिए.. माइक पार्वती की ओर बढ़ाते हुए सिन्हा जी ने कहा।

आप लोगों ने सब कुछ कह ही दिया भाईसाहब। कुछ बचा ही नहीं…मुस्कुराती पार्वती माइक लौटाती कहती है।

देखा मेरी कितनी कद्र है… गाड़ी में बैठते हुए सुरेंद्र पार्वती की ओर उड़ती नजर डालते हुए कहता है।

रोज रोज एनजीओ जाना जरूरी है क्या पार्वती…मेरे साथ भी बैठो, बातें करो… एक सप्ताह के बाद ही अकेलेपन से ऊब कर एनजीओ के लिए निकलती पार्वती से सुरेंद्र कहता है।

सुरेंद्र साहब वक्त वक्त की बात है, कभी आपके पास मेरे लिए वक्त नहीं था। मेरा हंसना बोलना भी अखरता था आपको, क्या आप मेरे वो वक्त फिर से वापिस कर सकते हैं, नहीं ना। आज मेरे पास इन सब बातों के लिए वक्त नहीं है। कोई भी वक्त वापिस नहीं आता है। सभी को अपने अकेलेपन के समय से खुद ही लड़ना होता है। एनजीओ के इन्हीं बच्चों ने उस समय मुझे अकेलेपन से निकाला था। मेरे चेहरे पर फिर से हंसी लेकर आए थे। मैं इनके और वो मेरे खिलखिलाने के वजह बने थे। इसलिए मेरा सारा वक्त उनके लिए ही है… कहकर पार्वती चली गई।

सच वक्त वक्त की ही बात है। प्रेम और सामंजस्य का वक्त लौट कर नहीं आता। जिसने इसे नहीं समझा, उसे जैसे तैसे वक्त काटना होता है। काश ये बातें समय रहते समझ आ जाए… सुरेंद्र बैठे बैठे खुद से दो चार होते सोच रहे थे।

#वक्त 

आरती झा आद्या

दिल्ली

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