वो खट्टी मीठी यादें – नीरजा नामदेव

ये मेरी शादी के बाद की घटना है इधर शादी के बाद नाश्ता या खाना बनाने से पहले सासू मां से क्या बनाना है, कैसे बनाना है पूछ कर बनाना पड़ता है तो मैं भी ऐसा ही करती थी। सासू मां क्या बनाना है के साथ ही मात्रा भी बता देती थी और बनाने की विधि भी। उस अनुसार में खाना बनाती थी। लगभग तीन चार महीने बाद की बात है  जब मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने कहा कि चावल बना लेना हम लोग चावल पसा(माड़  निकाल कर) के बनाते हैं। कभी-कभी कुकर में बना लेते हैं। तो उस दिन उन्होंने कहा कि कुकर में बना लेना और इतनी कटोरी चावल और इतना पानी डाल देना। मैंने जो उन्होंने बताया था वैसे ही किया ।मुझे लग तो रहा था कि पानी की मात्रा थोड़ी ज्यादा है लेकिन मैंने सोचा शायद इस चावल में ज्यादा पानी लगता होगा। चावल बन गया उसके बाद जब खाने की बारी आई थी तो मैंने कूकर खोला। ऊपर का चावल तो ठीक था एक दो चम्मच निकालने के बाद देखा नीचे का चावल थोड़ा गीला हो गया था। मैं नई नई थी तो थोड़ा संकोच भी हो रहा था बताने में। बाबू जी खाना खाने बैठ गए । मैंने उनको खाना परोसने से पहले बताया कि भात थोड़ा गीला हो गया है मैं फिर से चावल बना लेती हूं। लेकिन इसमें कम से कम 15-20 मिनट का समय तो लग ही जाता।मैं उनके कुछ कहने का इंतजार कर रही थी कि आगे क्या करना है तभी बाबू जी बोले कोई बात नहीं तुम भात में दूध और शक्कर मिलाकर दे दो।मैं लेकर आई तो बाबूजी बड़े मजे लेकर खाने लगे और हंसते-हंसते कहते जा रहे थे आज तो दूध भात खाने को मिल रहा है।सबको कहने लगे तुम लोग भी  दूध भात खा लो। ऐसे करके मैं तो दूध भात खा लूंगा बाकी सब भी खुश हो दूध शक्कर डालकर बड़े मजे ले ले कर भात खाने लगे। मुझे उन सबको देखकर अच्छा लगा।

    बाद में सासू मां ने बताया कि यहां इन लोगों को भात में दूध शक्कर डालकर खाना पसंद है ।कभी कभी शौक से खाते हैं।चलो आज इसी बहाने इन्होंने खा लिया।           बाद में भी जब मन करता था तो बाबूजी दूध शक्कर लेकर खाते।                एक और ऐसी ही घटना याद आ रही है।एक दिन में भात का माड़ निकालकर  किनारे रख रही थी तो अचानक पता नहीं कैसे भात बनाने वाला बर्तन मेरे हाथों से छूट गया और पूरा गरम-गरम भात जमीन पर गिर गया। आवाज आई तो सब आ गए।  मैं घबरा गई ।मेरा जी धक धक करने लगा। मुझे इस बात का डर लग रहा था कि पूरा भात जमीन पर गिर गया है। लेकिन किसी ने भी मुझे इस बात के लिए कुछ नहीं कहा बल्कि सब यही पूछने लगे कि “तुम्हें लगी तो नहीं है, तुम्हारे पाँव जले तो नहीं है। कोई बात नहीं। तुम इधर आओ। पहले अपने पैर को देखो। फिर मेरे पैरों में पानी डाला। ज्यादा तो जला था। थोड़ा सा भात ही मेरे पैरों पर गिरा था। फिर भात को समेटकर जीव-जंतुओं को दे दिया गया। मुझे तो लग रहा था कि  मुझसे गलती हो गई है मुझे डांट पड़ेगी पर ऐसा नहीं हुआ।

मौलिक

नीरजा नामदेव

छत्तीसगढ़

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