तिरस्कार** –    बालेश्वर गुप्ता

   देखो रामू काम निबटा कर, ड्राइंग रूम से ये टूटी कुर्सी हटा कर पीछे कर देना, वहां से ये दिखायी नही देगी।

ठीक है बाबू सरकार, बस थोडी देर में ही रख दूंगा।

     रमेश अपने 55 वर्षीय नौकर रामू को उक्त निर्देश देकर ऑफिस चला गया।रमेश की पत्नी दो वर्षीय बेटे के साथ अपने मायका गयी हुई थी सो घर मे रमेश और रामू काका ही थे।

     घर का काम पूरा करके रामू ने उस टूटी कुर्सी को सीढियो के नीचे के स्थान पर रख दिया।

      शाम को रमेश ने ऑफिस से वापस आकर देखा कि रामू काका द्वारा कुर्सी उसके बताये स्थान पर न रख दूसरे स्थान पर रखा है।रमेश के क्रोध का पारावार नही रहा।जोर से चिल्ला कर रमेश ने रामू काका को आवाज दे बुलाया और जोर से डांटते हुए कहा, रामू मैंने तुमसे कुर्सी इस स्थान पर रखने को बोला था तो तुमने इसे दूसरे स्थान पर क्यूं रखा?रामू काका अब मैं देख रहा हूं कि तुम आजकल अपनी मनमर्जी की करने लगे हो।

       नही नही बाबू सरकार वो कुर्सी यदि यहाँ रखते तो मुन्ना को खेलते समय चोट लग सकती थी, इसी वजह से मैंने कुर्सी सीढ़ियों के नीचे अलग से रखी है।

    अब रामू अब तुम जबान भी लड़ाओगे,हमारा अपमान भी करोगे, हमें मूर्ख भी साबित करोगे।लगता है तुम्हारे दिन इस घर में पूरे हो गये हैं।

     ऐसा ना कहो बाबू सरकार,आगे जैसा कहोगे वैसा ही करूँगा।बाबू अब इस उम्र में कहाँ जाऊंगा।माफ कर दो बाबू सरकार, माफ कर दो।

       आंखे पोंछता रामू रमेश के सामने से हटकर रसोई की ओर जाते सोच रहा था क्या मैंने बाबू सरकार का अपमान किया है?मैंने तो उन्हें भी गोद खिलाया है और अब बाबू सरकार के बेटे को भी गोद खिलाता हूँ।कैसे उनका अपमान का सोच भी सकता हूं?

     रामू काका अब भी बाबू सरकार के अपमान पर सोच रहे थे ।रामू काका जैसो को अपने तिरस्कार का अहसास कहां है??

    पता नही अपमान किसका हुआ,बाबू सरकार का या फिर रामू काका का?

           बालेश्वर गुप्ता

                   पुणे(महाराष्ट्र)

मौलिक एवं अप्रकाशित

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