शहर में घर – हरेन्द्र कुमार 

दीना नाथ जी रेटियार्ड होकर घर आ चुके थे। गृह मंत्रालय में क्लर्क का काम करते थे। अच्छी खासी रकम मिली थी सेवा- निवृत्ति (रिटायरमेंट) के बाद। गृह मंत्रालय में ऊपर की आमदनी भी थी।

नौकरी करते वक्त उन्होंने गांव में बारह बीघा जमीन खरीद ली थी। दो लड़का और एक लड़की का परिवार था उनका। सभी बच्चो की पढ़ाई लिखाई के बाद शादी हो चुकी थी। सादा जीवन और समाज सेवा के लिए पूरे गांव में प्रसिद्ध थे।

दोनो बेटे अभी साथ ही रहते थे। वह खेती करते थे , बाबूजी के तनख्वाह से घर चलता था। उन दोनो की कमाई का जरिया खेती ही था। बड़ी मुश्किल से एलआईसी में दो पैसा जमा कर पाते थे। मां भी साथ रहती थी। दोनो बेटो का एक बेटा और एक बेटी थी।

संध्या के समय सभी परिवार के सदस्य बैठे हुए थे , मंत्राण कर रहे थे सेवा- निवृत्ति वाले पैसे का क्या करे?

नमिता बोली :- देखो जी, शहर में घर होता तो कितना अच्छा होता , गांव में जमीन तो है ही।

मां ठीक कह रही है बाबूजी :- दोनो बेटे के मुंह से अनायास ही एक साथ आवाज निकली।

ठीक कह रही हो , बैजू की मां :- अपने बड़े बेटे के नाम के संबोधन के साथ दिना नाथजी ने बोला।

पूरे पंचायत में यह आग की तरह खबर फैल गई , दीना नाथ का परिवार अब शहर में रहेगा। गांव की बहुमंजिली इमारत अब लगता है वीरान हो जायेगा? गांव का जमीन बेचेंगे क्या ? घर वाला जमीन बेचेंगे क्या ? …..जितने लोग उतनी सोच और सबकी अपनी अपनी अलग राय।


गांव से शहर की दूरी यही 40 किलोमीटर थी। रिस्तेदारी में बात फैल गई, जितने रिश्तेदार शहर में रहते थे सभी ने जोर लगाया जमीन खरीद के लिए।

दीना नाथ जी के साथ बैजू भी था , दोनो शहर के लिए निकले। जमीन मालिक से बात हुई , इन्होंने जमीन देखा और फाइनल हो गया। रजिस्ट्री के बाद दीना नाथ जी को जमीन के पेपर मिल गए। रिटर्यमेंट का 40% पैसा जमीन की खरीद में लग गया। शाम को घर आते वक्त , छेनू के मिठाई की दुकान से मिठाई लाई गई गांव और टोले में बांटने के लिए।

अगले सुबह अपने टोले में मिठाई बांटी गई। पूरा परिवार खुश था चलो शहर में रहने को मिलेगा।

बड़े बेटे की बेटी की शादी तय हो गई। दहेज के साथ साथ ब्याह का खर्च भी रिटर्यमेंट के 15% पैसों से पूरा हुआ। छोटे बेटे की बेटी के नाम पर 15% का एफडी करवा दिया गया ,जिससे शादी में कोई आर्थिक रूप से अड़चन ना आए।अभी तक रिटायरमेंट का 70% से ज्यादा पैसा खर्च हो चुका था।  एक मोटा रकम दहेज का भेट चढ़ गया।

पूरा परिवार शहर में ही शिफ्ट होगा , इसके लिए एक कट्टा जगह में बहुमंजिला इमारत बनाना जरूरी था। गांव के नामी गिरामी राजमिस्त्री को बुला कर उनको ठेका दिया गया। ठेकेदार ने अपनी मजदूरी का ठेका ले लिया और मैटेरियल के लिए इस्टीमेट दे दिया। 

छः महीने में घर तैयार हो गया। सभी रिश्ते नाते , गांव के लोग को गृह प्रवेश के लिए आमंत्रित किया गाया। शहर वाले लोगो को ज्यादा तवज्जो दिया गया। जो आर्थिक रूप से कमजोर रिस्ते थे उनको इग्नोर किया गाया खातिर दारी में। परिवार के सभी सदस्य को अपने अपने कमरे मिल गए। बच्चो के लिए स्टडी रूम, बड़ों के लिए बेड रूम, दो गेस्ट रूम अलग से बना था। यह मई महीने की बात है।

अब तक रिटायरमेंट के पूरे पैसे खत्म हो चुके थे। अब घर चलने का खर्चा पेंशन के साथ साथ खेती के पैसों से चलने लगा। देखते देखते दो महीने बीत गए, पड़ोसियों से जान पहचान हो गई, रायजी, शर्मजी, सिंहजी, ठाकुरीजी….अलग अलग गांव से  अलग जिलों से। खुशी खुशी परिवार अब शहर में रह रह था।


जुलाई में खूब बारिस हुई, घर के आस पास 500 मीटर तक जल जमाव, सब्जी लाना भी बाजार से मुश्किल। दिना नाथजी शुगर और बीपी के पेसेंट थे। घर से निकलना मुश्किल हो रहा था और उनको हॉस्पिटल ले जाना जरूरी था। शुगर का लेवल अचानक से बड़ गया। बारिस छुटने का नाम नहीं ले रही थी और घर के आस पास जल जमाव। यह बरसात का पहला साल था। डॉक्टर से फोन पर बात हुई और किसी तरह दवाई का प्रबंध किया गया। साम तक दीना नाथ जी अच्छा अनुभव कर रहे थे।

लागतार पन्द्रह दिन तक वारिस हुई, हालत पूरे प्रदेश के खराब हो रहा था। कहीं कहीं सांप भी नजर आ रहे थे शहर वाले घर के आस पास।

दीना नाथजी सोचने लगे, अगर शहर नही आते और गांव में रहते तब क्या मैं हॉस्पिटल जा सकता था ? हां गाड़ी रिजर्व करके मैं जरूर जा सकता था,मुश्किल से 40 मिनट लगता। इतना खर्च करने के बाद भी जल जमाव , हॉस्पिटल जाने में घंटो देरी , अनजान पड़ोसी ….इससे बेहतर तो हमारा गांव ही था। जीवन के आखिरी पड़ाव में पीने का पानी भी गंदा, हवा भी सुध नहीं, गांव में तो किसी को बोलकर हॉस्पिटल भी साथ लेकर जा सकते थे यहां सब नए है…… दीना नाथजी अनेकों विचार से घिर कर रह गए थे।

तभी बैजू ने आवाज दी :- बाबूजी आपकी अब तबीयत कैसी है ?

चेहरे पर बनावटी हंसी लाते हुए :- अब ठीक हूं बेटा, डरने की कोई बात नही। दीना नाथ जी ने बोला।

( बिहार में जितने भी शहर है चाहे पटना हो या छपरा हो या आरा हो, या बिहटा हो, भागलपुर, मुजफ्फरपुर….सभी शहर में जमीन तो खरीद लेते है लेकिन आने वाला समस्या को नही देखते , बीस साल से ज्यादा सालो से लोग गांव से बदतर जीवन जी रहे है लेकिन गांव जाकर कहते है हम लोग शहर में रहते है। कौन सा शहर जहां आपके घर का पानी भी नही निकल सकता? सुध पानी भी नही  पी सकते ? कौन से शहर में रहते हो ? शहर का मतलब भी समझते है ? क्या बिहार के कोई शहर का नक्शा के हिसाब से बना है ? नगरपालिका कितनी कारगर है ?…ऐसे सैकड़ों दीना नाथ जी के बेटे बैजू जैसे पीढ़ी को अपने आप से पूछना होगा। )

धन्यवाद

(मेरे शब्द :- मैं किसी भी व्यक्ति के भावना को ठेस नही पहुंचना चाहता, क्षमा चाहता हू ..लेकिन जिस हिसाब से गांव से पलायन हो रहा है वह भी हम सबको मिलकर प्रयास करके रोकना है और #स्वरोजगार का बीजारोपण के बाद #आत्मनिर्भर बनाना है)

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